Monday, 4 September 2017
चूहों पर ही ज्यादातर प्रयोग क्यों होते है जानिए adhbhut कारण
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On: 10:00
यह सच है कि विज्ञान समुदाय में चूहे निश्चित रूप से सबसे आम टेस्ट सब्जेक्ट होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में पशु शोध के करीब 95 प्रतिशत तक शोध चूहों पर आयोजित किये जाते हैं। हम यह भी जानते हैं कि यूरोपीय संघ में 79 प्रतिशत पशु परीक्षण के शोध और अध्ययन के लिए चूहों का इस्तेमाल होता है।
हालांकि हम यह पता नहीं कर सकते हैं कि स्टडीज और प्रयोगों में कितने चूहों का उपयोग किया जाता है। जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका का कृषि विभाग परीक्षण के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कई प्रजातियों का ट्रैक रखता है लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका में कोई भी अनुसंधान में इस्तेमाल किये गए सभी चूहों की एक विस्तृत सूची नहीं रखता है।
हम जानते हैं कि 1965 से चूहों से जुड़े शैक्षणिक उद्धरणों की संख्या चौगुनी हो गई है, जबकि अधिकांश अन्य विषयों (कुत्तों, बिल्लियों, गिनी सूअरों, खरगोशों) का अध्ययन काफी निरंतर गति से किया जाता है। तो आखिर लैब्स इतने चूहों और चूहों का उपयोग क्यों कर रहे हैं?
कुछ कारण व्यावहारिक हैं : वे छोटे हैं, वे नस्ल में आसान होते हैं और वे सस्ते होते हैं। जब आप कई विषयों पर परीक्षण कर रहे होते हैं और एक समय में एक से अधिक पीढ़ियों का अध्ययन करने में लाभ हो सकता है, लेकिन एक माइस या चूहे को बीट करना कठिन होता है।
इसके अलावा वे स्तनधारी होते हैं, इसलिए हम सभी एक ही परिवार के कहे जा सकते हैं। इस प्रकार ये लगभग समान आनुवांशिकी का निर्माण करते हैं, वो भी बिना किसी खराब प्रभाव के। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे स्तनधारी कृंतक मित्र प्राइमेट्स नहीं है। जबकि प्राइमेट्स आनुवंशिक रूप से हमसे बहुत करीब से जुड़े होते हैं।
अनुसंधान में प्राइमेट का उपयोग बेहद विवादास्पद होता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि चूहों के जीन को बदलना आसान होता है। इस पर विचार करें : विज्ञान पिछले काम के निर्माण के बारे में भी है। प्रयोगशाला में चूहों और चूहों का उपयोग तेजी से बढ़ गया है, यह विकास वास्तव में उनकी लोकप्रियता का कारण हो सकता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि इसका परिणाम इसके विपरीत होता है। यदि कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला परिवेश में किसी विशिष्ट जानवर का उपयोग करने का विकल्प चुनता है, तो समान या संबंधित शोधों का परीक्षण करते समय एक ही जानवर को चुनने के लिए बहुत सारी समझ चाहिए होती है।
Sunday, 3 September 2017
आज भी अनसुलझा है Patna के अगम कुएं का रहस्य
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On: 10:00
प्राचीन भारत के पाटलिपुत्र को आज पटना के नाम से जाना जाता है, जो बिहार का प्रमुख शहर होने के साथ-साथ उसकी राजधानी भी है. नन्द वंश और मौर्य वंश के शासन काल में यह शहर न केवल मगध की, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानी के रूप में विख्यात रहा है. भारत का यह ऐतिहासिक शहर आज भी अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए हैं, उन्ही रहस्यों में से एक हैं Patna का अगम कुआं.
इतिहासकार बताते हैं इस कुएं का निर्माण आज से लगभग दो हजार साल पहले हुआ था. जब से यह कुआं अपने अस्तित्व में आया है, तब से यह कभी सूखा नहीं है. यह अपने आप में एक हैरान कर देने वाला सच है.
आखिर यह कुआं अब तक सूखा क्यों नहीं यह अभी तक एक पहली बना हुआ है. इस कुएं के बारे में यह कहा जाता है कि गर्मियों के समय इसका पानी एक से डेढ़ फुट नीचे और बारिश के समय यह एक से डेढ़ फुट तक बढ़ जाता है.
सम्राट अशोक के समय में अस्तित्व में आये इस कुएं के रहस्य को जानने के लिए तीन बार कोशिश की जा चुकी है. पहली बार 1932 में, दूसरी बार 1965 में, और तीसरी बार 1995 में लेकिन अगम कुएं के रहस्य को अब तक नहीं सुलझाया जा सका है.
कुएं के बारे में यह कहा जाता है कि कई बार भयंकर अकाल और सूखा पड़ने पर भी इस कुएं का पानी नहीं सूखा. यहां तक कि बाढ़ आने पर भी कुएं के पानी में कोई ख़ास बढ़ोत्तरी भी नहीं हुई. स्थानीय लोग इस कुएं के बारे में एक और रहस्यमयी बात बताते हैं हुए कहते हैं की कुएं के पानी का रंग अक्सर बदलता रहता है.
यहां के लोग इस कुएं का संबंध पश्चिम बंगाल में स्थित गंगा सागर से बताते हैं. लोगों का कहना है कि एक बार एक अंग्रेज की छड़ी गंगा सागर में गिर गयी जो बहते-बहते पाटलिपुत्र के इस कुएं में आ गयी थी.
आज भी वह छड़ी कोलकाता के एक म्यूजियम में मौजूद है. सम्राट अशोक के समय में भारत आये चीनी दार्शनिकों ने भी अपनी पुस्तक में इस अजीब कुएं का जिक्र किया था.
Saturday, 2 September 2017
एक गुड़िया की सच्ची कहानी जिस पर 4 फिल्में बन चुकी हैं
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On: 12:29
एनाबेल क्रिएशन फिल्म रिलीज हो चुकी है. जिसमें एक ऐसी गुड़िया की कहानी बताई गई है जिसमें एक शैतान की आत्मा बसती है और जो उसे अपने घर में पनाह देता है वो उसी की जान लेने की कोशिश करती है. वैसे तो लोगों के दिलों में हमेशा से ये सवाल रहा है कि क्या नाम की चीज होती है? लेकिन इस दावे को सच करती है यह फिल्म जो एक सत्य घटना पर आधारित है और ये घटना हुई थी दशकों पहले अमेरिका में.
हॉलीवुड में बनी चर्चित फिल्म ‘The Conjuring’ के चौथे पार्ट ‘एनाबेल क्रिएशन’ डरावनी फिल्मों में दिलचस्पी रखने वालों को अपनी ओर खींच रही है. ये चौथी फिल्म एक गुड़िया ‘Annabelle’ पर आधारित है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ये इस गुड़िया की कहानी सिर्फ फिल्मी नहीं है, असल में ये असल जिंदगी में भी लोगों की जिंदगी में डर और खौफ भर चुकी है.
ये गुड़िया आज भी अमेरिका के Occult विशेषज्ञ दंपति Ed और लॉरेन के म्यूजियम में रखी हुई है. आज तो ये किसी को परेशान नहीं कर रही, लेकिन आज से करीब 40 साल पहले इसने अमेरिका के कई परिवारों के जीवन में आतंक भर दिया था. देखने ये भले ही एक आम गुड़िया की तरह ही दिखती है और फिल्म की डॉल से अलग दिखती है, लेकिन इसकी कहानी फिल्म की कहानी से कहीं ज्यादा भयानक है.
Annabelle की डरावनी कहानी 1970 में शुरू हुई थी, जब एक महिला ने अपनी बेटी डोना के जन्मदिन के लिए इस डॉल को खरीदा था. डोना इस डॉल को अपने फ्लैट पर ले आई थी. डोना यहां अपनी दोस्त Angie के साथ रहती थी. जैसे ही उन्होंने फ्लैट में कदम रखा, उन्होंने इस गुड़िया में कुछ अजीबोगरीब हलचल महसूस की.
इसी घटना के बाद से ही उसकी हरकतें बढ़ने लगीं, जैसे कि इस डॉल को डोना के बेड पर बैठाया गया, लेकिन वो Angie के कमरे के बाहर बैठी मिलीं थी. लेकिन अभी तो ये शैतानी हरकतों की शुरुआत थी, अभी तो इसका असली आतंक सामने आना था. डोना का एक दोस्त लॉउ इस गुड़िया के आस-पास बेहद नर्वस हो जाता था. उसे ऐसा महसूस होता था कि इस डॉल में कोई बुरी आत्मा रहती है, लेकिन डोना और Angie ने उसकी बातों को टाल दिया. इसी के कुछ दिनों बाद ही उनके फ्लैट के आस-पास बच्चे की हेंड-राइटिंग में ‘हमें बचा लो’ और ‘लॉउ को बचा लो’ जैसे नोट्स मिलने लगे.
डोना एक बार जब ऑफिस से घर वापस आईं तो उन्होंने पाया कि Annabelle के हाथ ‘खून’ से सने हुए थे. वो यूं तो अपने बेड पर बैठी थी, लेकिन उसके हाथों पर लाल रंग लगा हुआ था. इसके बाद जब इस फ्लैट का इतिहास खंगाला गया, तो पता चला कि अपार्टमेंट बनने से पहले ये जगह एक खाली मैदान था. यहां कई साल पहले एक 7 साल की बच्ची Annabelle Higgins की लाश पाई गई थी. जब इस डॉल को फ्लैट में लाया गया था, उस समय Annabelle की आत्मा इसी क्षेत्र में थी. ऐसा माना जाता है कि Annabelle इस डॉल की मुरीद हो गई और उसने इसके बेजान शरीर पर कब्जा कर लिया.
इस फ्लैट में अब अजीबोगरीब घटनाएं बढ़ती जा रही थीं. एक रात लॉउ एक बेहद बुरे सपने से उठा और उसे घबराहट महसूस होने लगी. उसने आस-पास देखा तो पाया कि वो डॉल धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी और अचानक सामने आकर उसका गला दबाने लगी. लॉउ अपने Senses खो चुका था और सुबह जब वो उठा तो उसे पता नहीं था कि जो भी उसके साथ हुआ वो सपना था या हकीकत.
इसी के कुछ दिनों बाद लॉउ ने देखा कि Annabelle कुर्सी पर बैठी हुई थी, लेकिन वो जानते थे कि आमतौर पर उसे वहां नहीं रखा जाता था. जैसे ही वो उस गुड़िया की तरफ बढ़े, उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि कोई उनके पीछे है. जब तक वो कुछ समझ पाता उसके पीठ पर किसी ने नाखूनों से वार कर दिए. उन्हें ऐसा लगा कि किसी ने उसकी पीठ पर कई बार हमले किए हों चुके थे. लॉउ की पीठ पर सात नाखूनों के निशान थे. लेकिन सबसे हैरानी की बात ये थी कि ये सभी निशान दो दिनों में अपने आप ही गायब हो गए.
वो सभी हादसे के बाद बेहद डर गए और उन्होंने इस मामले से निपटने के लिए एक पादरी मदद ली. लेकिन पादरी ने इस मामले में हाथ डालने से मना कर दिया और Occult विशेषज्ञों से सलाह लेने की बात कही. इसके बाद डोना ने एक Occult विशेषज्ञ दंपति से संपर्क किया और वो थे Ed और लॉरेन. ये दोनों ही पति पत्नी थे. उन्होंने बताया कि बेजान वस्तु होने के बावजूद Annabelle की आत्मा इस गुड़िया से जुड़ चुकी है. इसलिए ये डॉल एक रहस्यमयी और भयानक डॉल में तब्दील हो चुकी है.
Ed ने इस फ्लैट को अपनी पूजापाठ से ‘पवित्र’ किया और उसके बाद उस गुड़िया को लेकर अपने घर ले गए, जहां उन्होंने उसे अपने म्यूजियम में रख दिया. कुछ ही दिनों बाद एक पादरी Ed के घर आया. उसने जब इस गुड़िया के बारे में सुना, तो वो इसके पास पहुंचा और कहा कि तुम किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती और उसका मजाक बनाने लगा।
लेकिन इस घटना के बाद Ed को एहसास हो गया था कि पादरी को उस गुड़िया के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए था. पादरी के जाने के थोड़ी देर बाद ही Ed को एक फोन आया. दूसरी लाइन पर वह पादरी ही था और वो बेहद डरा हुआ था. उसने बताया कि उसकी कार का ब्रेक फेल हो गया था और लेकिन किसी तरह वो अपनी जान बचाने में कामयाब रहा. लॉरेन वॉरेंस अपने म्यूजियम में. वे कभी इस गुड़िया की तरफ नहीं देखती हैं
Ed समझ चुके था कि ये मामला बेहद गंभीर है. उन्होंने कुछ खास प्रार्थनाओं के जरिए इस डॉल को एक ग्लास बॉक्स में रख कर बंद कर दिया. उसके बाद से ही वो डॉल इस म्यूजियम में रखी हुई है लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी. Ed की पत्नी लॉरेन का मानना है कि आज भी अगर इस गुड़िया का कोई मजाक उड़ाने की कोशिश करता है, तो ये गुड़िया उन्हें जिंदा नहीं छोड़ती है.
इस म्यूजियम में पहुंचे किसी व्यक्ति ने भी एक बार उस गुड़िया का मजाक उड़ाया था और कुछ ही देर में उस आदमी की सड़क हादसे में मौत हो गई. साल 2006 में Ed का देहांत हुआ था, लेकिन उनकी पत्नी आज भी इस गुड़िया की तरफ़ नहीं देखती हैं क्योंकि वे इससे बेहद नफरत करती हैं.।
Wednesday, 30 August 2017
बर्बरीक की कथा
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On: 09:48
बर्बरीक महाभारत के एक महान योद्धा थे। वे घटोत्कच और अहिलावती(nagkanya mata)
के पुत्र थे। बर्बरीक को उनकी माँ ने यही सिखाया था कि हमेशा हारने वाले
की तरफ से लड़ना और वे इसी सिद्धांत पर लड़ते भी रहे। बर्बरीक को कुछ ऐसी
सिद्धियाँ प्राप्त थीं, जिनके बल से पलक झपते ही महाभारत के युद्ध में भाग
लेनेवाले समस्त वीरों को मार सकते थे। जब वे युद्ध में सहायता देने आये, तब
इनकी शक्ति का परिचय प्राप्त कर श्रीकृष्ण ने अपनी कूटनीति से इन्हें रणचंडी
को बलि चढ़ा दिया। महाभारत युद्ध की समाप्ति तक युद्ध देखने की इनकी कामना
श्रीकृष्ण के वरदान से पूर्ण हुई और इनका कटा सिर अंत तक युद्ध देखता और
वीरगर्जन करता रहा।
कुछ कहानियों के अनुसार बर्बरीक एक यक्ष थे, जिनका पुनर्जन्म एक इंसान के रूप में हुआ था। बर्बरीक गदाधारी भीमसेन का पोता और घटोत्कच के पुत्र थे।
महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, अतः यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुआ तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने लीले घोड़े, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।
सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी भी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तरकस में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी कि इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेदकर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया।
तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए वरना ये आपके पैर को चोट पहुँचा देगा। श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराया कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगा जिस ओर की सेना निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
ब्राह्मण वेश में श्रीकृष्ण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिए चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और श्रीकृष्ण के बारे में सुनकर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।
उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिए एक वीरवर क्षत्रिए के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतएव उनका शीश दान में मांगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया, जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी बहस होने लगी कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्रीकृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान कार्य किया है। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली, दुर्गा श्रीकृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।
कुछ कहानियों के अनुसार बर्बरीक एक यक्ष थे, जिनका पुनर्जन्म एक इंसान के रूप में हुआ था। बर्बरीक गदाधारी भीमसेन का पोता और घटोत्कच के पुत्र थे।
बर्बरीक की कथा
बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध-कला अपनी माँ से सीखी। MATA DURGA की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किये और 'तीन बाणधारी' का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, अतः यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुआ तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने लीले घोड़े, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।
सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी भी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तरकस में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी कि इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेदकर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया।
तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए वरना ये आपके पैर को चोट पहुँचा देगा। श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराया कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगा जिस ओर की सेना निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
ब्राह्मण वेश में श्रीकृष्ण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिए चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और श्रीकृष्ण के बारे में सुनकर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।
उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिए एक वीरवर क्षत्रिए के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतएव उनका शीश दान में मांगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया, जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी बहस होने लगी कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्रीकृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान कार्य किया है। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली, दुर्गा श्रीकृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।
Tuesday, 29 August 2017
जब भगवान विष्णु ने छीन लिया था भगवान शिव और पार्वती का घर
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On: 08:01
क्यों भगवान विष्णु ने छीन लिया था भगवान शिव और पार्वती का घर
हिंदुओं के चार धामों में एक धाम बद्रीनाथ भी है। बद्रीनाथ धाम को लेकर लोगों के बीच मान्यता है कि यहां कभी भगवान शिव और देवी पार्वती का वास हुआ करता था। उत्तराखंड राज्य में स्थित अलकनंदा नदी के किनारे बद्रीनाथ धाम है। इसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक एक बार भगवान विष्णु काफी लंबे समय से शेषनाग की शैया पर विश्राम कर रहे थे।
ऐसे में उधर से गुजरते हुए नारद जी ने उन्हें जगा दिया। इसके बाद नारद जी उन्हें प्रणाम करते हुए बोले कि प्रभु आप लंबे समय से विश्राम कर रहे हैं। इससे लोगों के बीच आपका उदाहरण आलस के लिए दिया जाने लगा है। यह बात ठीक नही है। नारद जी की ऐसी बातें सुनकर भगवान विष्णु ने शेषनाग की शैया को छोड़ दिया और तपस्या के लिए एक शांत स्थान ढूंढने निकल पड़े।
विष्णु जी हिमालय की ओर चल पड़े। इस दौरान उनकी नजर पहाड़ों पर बने बद्रीनाथ पर पड़ी। विष्णु जी को लगा कि यह तपस्या के लिए अच्छा स्थान साबित हो सकता है। तभी विष्णु जी उस कुटिया की ओर गए तो देखा कि वहां पर भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान थीं। यह कुटिया उनका घर था। इसके बाद विष्णु जी इस सोच में पड़ गए कि अगर वह इस स्थान को तपस्या के लिए चुनते हैं तो भगवान शिव क्रोधित हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने उस स्थान को ग्रहण करने का एक उपाय सोचा। विष्णु जी ने एक शिशु का अवतार लिया और बद्रीनाथ के दरवाजे पर रोने लगे।
इस दौरान बच्चे के रोने की आवाज सुनकर माता पार्वती का ह्दय द्रवित हो गया और वह उस बालक को गोद में उठाने के लिए बढ़ने लगी। तभी शिव जी ने उन्हें मना किया कि वह इस शिशु को गोद न लें लेकिन वह नहीं मानी। वह शिव जी से कहने लगी कि आप कितने निर्दयी हैं और एक बच्चे को कैसे रोता हुए देख सकते हैं। इसके बाद पार्वती जी ने उस बच्चे को गोद में उठा लिया और उसे लेकर घर के अंदर आ गईं। उन्होंने शिशु को दूध पिलाया और उसे चुप कराया। बच्चे को नींद आने लगी तो पार्वती जी ने उसे घर में सुला दिया। इसके बाद शिव जी और पार्वती जी पास के एक कुंड में स्नान करने के लिए चले गए।
जब वे लोग वापस आए तो देखा कि घर का दरवाजा अंदर से बंद था। इस पर पार्वती जी ने उस बच्चे को जगाने की कोशिश करने लगी तो शिव जी ने मना कर दिया। उन्होंने कहा अब उनके पास दो ही विकल्प है या तो यहां कि हर चीज को वो जला दें या फिर यहां से कहीं और चले जाएं।
शिव जी ने पार्वती जी से यह भी कहा कि वह इस भवन को जला नहीं सकते हैं क्योंकि यह शिशु उन्हें बहुत पसंद था और प्यार से उसे अंदर सुलाया था। इसके बाद शिव जी और पार्वती जी उस स्थान से चल पड़े और केदारनाथ पहुंचे। वहां पर उन्होंने अपना स्थान बनाया। वहीं तब से यह बद्रीनाथ धाम विष्णु जी का स्थान बन गया।
हिंदुओं के चार धामों में एक धाम बद्रीनाथ भी है। बद्रीनाथ धाम को लेकर लोगों के बीच मान्यता है कि यहां कभी भगवान शिव और देवी पार्वती का वास हुआ करता था। उत्तराखंड राज्य में स्थित अलकनंदा नदी के किनारे बद्रीनाथ धाम है। इसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं। हिंदू शास्त्रों के मुताबिक एक बार भगवान विष्णु काफी लंबे समय से शेषनाग की शैया पर विश्राम कर रहे थे।
ऐसे में उधर से गुजरते हुए नारद जी ने उन्हें जगा दिया। इसके बाद नारद जी उन्हें प्रणाम करते हुए बोले कि प्रभु आप लंबे समय से विश्राम कर रहे हैं। इससे लोगों के बीच आपका उदाहरण आलस के लिए दिया जाने लगा है। यह बात ठीक नही है। नारद जी की ऐसी बातें सुनकर भगवान विष्णु ने शेषनाग की शैया को छोड़ दिया और तपस्या के लिए एक शांत स्थान ढूंढने निकल पड़े।
विष्णु जी हिमालय की ओर चल पड़े। इस दौरान उनकी नजर पहाड़ों पर बने बद्रीनाथ पर पड़ी। विष्णु जी को लगा कि यह तपस्या के लिए अच्छा स्थान साबित हो सकता है। तभी विष्णु जी उस कुटिया की ओर गए तो देखा कि वहां पर भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान थीं। यह कुटिया उनका घर था। इसके बाद विष्णु जी इस सोच में पड़ गए कि अगर वह इस स्थान को तपस्या के लिए चुनते हैं तो भगवान शिव क्रोधित हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने उस स्थान को ग्रहण करने का एक उपाय सोचा। विष्णु जी ने एक शिशु का अवतार लिया और बद्रीनाथ के दरवाजे पर रोने लगे।
इस दौरान बच्चे के रोने की आवाज सुनकर माता पार्वती का ह्दय द्रवित हो गया और वह उस बालक को गोद में उठाने के लिए बढ़ने लगी। तभी शिव जी ने उन्हें मना किया कि वह इस शिशु को गोद न लें लेकिन वह नहीं मानी। वह शिव जी से कहने लगी कि आप कितने निर्दयी हैं और एक बच्चे को कैसे रोता हुए देख सकते हैं। इसके बाद पार्वती जी ने उस बच्चे को गोद में उठा लिया और उसे लेकर घर के अंदर आ गईं। उन्होंने शिशु को दूध पिलाया और उसे चुप कराया। बच्चे को नींद आने लगी तो पार्वती जी ने उसे घर में सुला दिया। इसके बाद शिव जी और पार्वती जी पास के एक कुंड में स्नान करने के लिए चले गए।
जब वे लोग वापस आए तो देखा कि घर का दरवाजा अंदर से बंद था। इस पर पार्वती जी ने उस बच्चे को जगाने की कोशिश करने लगी तो शिव जी ने मना कर दिया। उन्होंने कहा अब उनके पास दो ही विकल्प है या तो यहां कि हर चीज को वो जला दें या फिर यहां से कहीं और चले जाएं।
शिव जी ने पार्वती जी से यह भी कहा कि वह इस भवन को जला नहीं सकते हैं क्योंकि यह शिशु उन्हें बहुत पसंद था और प्यार से उसे अंदर सुलाया था। इसके बाद शिव जी और पार्वती जी उस स्थान से चल पड़े और केदारनाथ पहुंचे। वहां पर उन्होंने अपना स्थान बनाया। वहीं तब से यह बद्रीनाथ धाम विष्णु जी का स्थान बन गया।
कोई नहीं खोल पाया बृहदेश्वर मंदिर के ग्रेनाइट का रहस्य
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Om Tiwari
On: 07:47
कोई नहीं खोल पाया बृहदेश्वर मंदिर के ग्रेनाइट का रहस्य
तमिलनाडु के तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाइट निर्मित है। विश्व में यह अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है। बृहदेश्वर मंदिर अपनी भव्यता, वास्तुशिल्प और केन्द्रीय गुम्बद से लोगों को आकर्षित करता है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है।
बृहदेश्वर मंदिर का रहस्य

राजाराज चोल - I इस मंदिर के प्रवर्तक थे। यह मंदिर उनके शासनकाल की गरिमा का श्रेष्ठ उदाहरण है। चोल वंश के शासन के समय की वास्तुकला की यह एक श्रेष्ठतम उपलब्धि है। राजाराज चोल- I के शासनकाल में यानि 1010 एडी में यह मंदिर पूरी तरह तैयार हुआ और वर्ष 2010 में इसके निर्माण के एक हजार वर्ष पूरे हो गए हैं।
अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए यह मंदिर जाना जाता है। 1,30,000 टन ग्रेनाइट से इसका निर्माण किया गया। ग्रेनाइट इस इलाके के आसपास नहीं पाया जाता और यह रहस्य अब तक रहस्य ही है कि इतनी भारी मात्रा में ग्रेनाइट कहां से लाया गया। इसके दुर्ग की ऊंचाई विश्व में सर्वाधिक है और दक्षिण भारत की वास्तुकला की अनोखी मिसाल इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घेषित किया है।

मंदिर में सांड की मूर्ति
तंजावुर का "पेरिया कोविल" (बड़ा मंदिर) विशाल दीवारों से घिरा हुआ है। संभवतः इनकी नींव 16वीं शताब्दी में रखी गई। मंदिर की ऊंचाई 216 फुट (66 मी.) है और संभवत: यह विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर है। मंदिर का कुंभम् (कलश) जोकि सबसे ऊपर स्थापित है केवल एक पत्थर को तराश कर बनाया गया है और इसका वज़न 80 टन का है। केवल एक पत्थर से तराशी गई नंदी सांड की मूर्ति प्रवेश द्वार के पास स्थित है जो कि 16 फुट लंबी और 13 फुट ऊंची है।
हर महीने जब भी सताभिषम का सितारा बुलंदी पर हो, तो मंदिर में उत्सव मनाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि राजाराज के जन्म के समय यही सितारा अपनी बुलंदी पर था। एक दूसरा उत्सव कार्तिक के महीने में मनाया जाता है जिसका नाम है कृत्तिका। एक नौ दिवसीय उत्सव वैशाख (मई) महीने में मनाया जाता है और इस दौरान राजा राजेश्वर के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन किया जाता था।
ग्रेनाइट की खदान मंदिर के सौ किलोमीटर की दूरी के क्षेत्र में नहीं है; यह भी हैरानी की बात है कि ग्रेनाइट पर नक्काशी करना बहुत कठिन है। लेकिन फिर भी चोल राजाओं ने ग्रेनाइट पत्थर पर बारीक नक्काशी का कार्य खूबसूरती के साथ करवाया।
जब पूरे हुए थे एक हजार साल
रिजर्व बैंक ने 01 अप्रैल 1954 को एक हजार रुपये का नोट जारी किया था। जिस पर बृहदेश्वर मंदिर की भव्य तस्वीर है। संग्राहकों में यह नोट लोकप्रिय हुआ। इस मंदिर के एक हजार साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित मिलेनियम उत्सव के दौरान एक हजार रुपये का स्मारक सिक्का भारत सरकार ने जारी किया। 35 ग्राम वज़न का यह सिक्का 80 प्रतिशत चाँदी और 20 प्रतिशत तांबे से बना है।
और भी हैं मंदिर के नाम
बृहदेश्वर मंदिर पेरूवुदईयार कोविल, तंजई पेरिया कोविल, राजाराजेश्वरम् तथा राजाराजेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह एक हिंदू मंदिर है।
जमीन पर नहीं पड़ती गोपुरम की छाया
इस मंदिर की एक और विशेषता है कि गोपुरम (पिरामिड की आकृति जो दक्षिण भारत के मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थित होता है) की छाया जमीन पर नहीं पड़ती। मंदिर के गर्भ गृह में चारों ओर दीवारों पर भित्ती चित्र बने हुए हैं, जिनमें भगवान शिव की विभिन्न मुद्राओं को दर्शाया गया है।
पुरातात्व विभाग ने पहले जैसा बनाया
अंदर भित्ती चित्रों में एक भित्तिचित्र जिसमें भगवान शिव असुरों के किलों का विनाश करके नृत्य कर रहे हैं और एक श्रद्धालु को स्वर्ग पहुंचाने के लिए एक सफेद हाथी भेज रहे है। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने चित्रों को डी-स्टक्को विधि का प्रयोग करके एक हजार वर्ष पुरानी चोल भित्तिचित्रों को पुन: पहले जैसा बना दिया है।
Friday, 13 January 2017
इस मंदिर में स्वयं सूर्य देव करते है शिवलिंग पर तिलक,अनोखा प्राचीन मंदिर !
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On: 16:56
इस मंदिर में स्वयं सूर्य देव करते है शिवलिंग पर तिलक,अनोखा प्राचीन मंदिर !
Story of Gavi Gangadhareshwara Temple:
भारत में भगवान शिव के अनेको अद्भुत एवं अत्यंत प्रचीन मंदिर है जो भक्तो के लिए हमेशा से श्रद्धा के केंद्र बने हुए है. इन्ही मंदिरो में से एक भगवान शिव का अनोखा मंदिर दक्षिण बेंगलूर के गवीपुरम में स्थित है जहा स्वयं सूर्य देव की किरणे महादेव के शिवलिंग पर तिलक करती है. इस अद्भुत महिमा को देखने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु इस मंदिर में आते है तथा यह अत्यंत प्राचीन मंदिर माना जाता है. भगवान शिव के इस मंदिर को गवीपुरम गुफा तथा गवि गंगाधरेश्वर मंदिर के नामो से पुकार जाता है. इस मंदिर का वास्तुशिल्प देखने लायक है तथा यह इंडियन रॉक-कट आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन नमूना माना जाता है. इस मंदिर का निर्माण 9वि शताब्दी में हुआ था तथा इसे मनोलिथिक रॉक से बनाया गया था. इस मंदिर को इस प्रकार से बनाया गया है की प्रत्येक वर्ष एक खास मोके पर सूर्य की रौशनी मंदिर के गर्भ गृह में रखे शिवलिंग पर पड़ती है.
मकर सक्रांति के अवसर पर इस मंदिर में भक्तो के जमावड़ा लगा रहता है क्योकि यही वह दिन होता जब सूर्य देव अपनी किरणे द्वारा महादेव के शिवलिंग पर तिलक करते है. सूर्य की रौशनी भगवान शिव की सवारी नंदीबेल के सींगो से होकर सीधे शिवलिंग पर पड़ती है, यह रौशनी शिवलिंग पर करीब एक घंटे तक पड़ती है. इस दिन सूर्य उत्तरायण दिशा की ओर होता है. यह दुर्लभ नजारा प्रतिवर्ष मकर सक्रांति को ही देखा जा सकता है इस अद्भुत दृश्य को देख हम यह अनुमान लगा सकते है की हमारे प्राचीन मूर्तिकार खगोल विद्या व वास्तुशिल्प के ज्ञाता कितने अधिक जानकार थे.
यह केवल भगवान शिव के तीर्थ स्थल के लिए ही प्रसिद्ध नही बल्कि यहा अग्नि के देवता की भी एक दुलभ प्रतिमा स्थापित है जिसे देखने भी भक्त यहा आते है. भगवान शिव का मंदिर गवी गंगाधरेश्वर गुफा एक स्मारक है जो पुरातत्विक स्थल, अवशेष अधिनियम 1951 तथा कर्नाटक प्राचीन व ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित है. गवीपुरम गुफा मंदिर भगवान शंकर और गवी गंगाधरेश्वर को समर्पित है तथा सूर्य की किरणों का शिवलिंग पर पड़ने वाले अद्भुत दृश्य के कारण बेंगलूर शहर में आकर्षण का कारण बना हुआ है. मंडप और गुफा के खिड़कियों से आती हुई सूर्य की रौशनी इस अनूठे और अद्भुत दृश्य का निर्माण करती है जो ऐसा प्रतीत होता है की सूर्यदेव शिवलिंग पर तिलक कर रहे हो !
Story of Gavi Gangadhareshwara Temple:
भारत में भगवान शिव के अनेको अद्भुत एवं अत्यंत प्रचीन मंदिर है जो भक्तो के लिए हमेशा से श्रद्धा के केंद्र बने हुए है. इन्ही मंदिरो में से एक भगवान शिव का अनोखा मंदिर दक्षिण बेंगलूर के गवीपुरम में स्थित है जहा स्वयं सूर्य देव की किरणे महादेव के शिवलिंग पर तिलक करती है. इस अद्भुत महिमा को देखने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु इस मंदिर में आते है तथा यह अत्यंत प्राचीन मंदिर माना जाता है. भगवान शिव के इस मंदिर को गवीपुरम गुफा तथा गवि गंगाधरेश्वर मंदिर के नामो से पुकार जाता है. इस मंदिर का वास्तुशिल्प देखने लायक है तथा यह इंडियन रॉक-कट आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन नमूना माना जाता है. इस मंदिर का निर्माण 9वि शताब्दी में हुआ था तथा इसे मनोलिथिक रॉक से बनाया गया था. इस मंदिर को इस प्रकार से बनाया गया है की प्रत्येक वर्ष एक खास मोके पर सूर्य की रौशनी मंदिर के गर्भ गृह में रखे शिवलिंग पर पड़ती है.
मकर सक्रांति के अवसर पर इस मंदिर में भक्तो के जमावड़ा लगा रहता है क्योकि यही वह दिन होता जब सूर्य देव अपनी किरणे द्वारा महादेव के शिवलिंग पर तिलक करते है. सूर्य की रौशनी भगवान शिव की सवारी नंदीबेल के सींगो से होकर सीधे शिवलिंग पर पड़ती है, यह रौशनी शिवलिंग पर करीब एक घंटे तक पड़ती है. इस दिन सूर्य उत्तरायण दिशा की ओर होता है. यह दुर्लभ नजारा प्रतिवर्ष मकर सक्रांति को ही देखा जा सकता है इस अद्भुत दृश्य को देख हम यह अनुमान लगा सकते है की हमारे प्राचीन मूर्तिकार खगोल विद्या व वास्तुशिल्प के ज्ञाता कितने अधिक जानकार थे.
यह केवल भगवान शिव के तीर्थ स्थल के लिए ही प्रसिद्ध नही बल्कि यहा अग्नि के देवता की भी एक दुलभ प्रतिमा स्थापित है जिसे देखने भी भक्त यहा आते है. भगवान शिव का मंदिर गवी गंगाधरेश्वर गुफा एक स्मारक है जो पुरातत्विक स्थल, अवशेष अधिनियम 1951 तथा कर्नाटक प्राचीन व ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित है. गवीपुरम गुफा मंदिर भगवान शंकर और गवी गंगाधरेश्वर को समर्पित है तथा सूर्य की किरणों का शिवलिंग पर पड़ने वाले अद्भुत दृश्य के कारण बेंगलूर शहर में आकर्षण का कारण बना हुआ है. मंडप और गुफा के खिड़कियों से आती हुई सूर्य की रौशनी इस अनूठे और अद्भुत दृश्य का निर्माण करती है जो ऐसा प्रतीत होता है की सूर्यदेव शिवलिंग पर तिलक कर रहे हो !
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