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Wednesday, 25 April 2018

दूसरी दुनिया के दरवाजे और वर्महोल का रहस्य

By: Secret On: 08:00
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  • दूसरी दुनिया के दरवाज़े हैं ये रहस्यमय वर्महोल




           अपनी धरती पर अब तक इस तरह के दो वर्म होल ढूँढ़े जा चुके हैं। इनमें से एक फ्लोरिडा कोस्टारिका और बरमूडा के बीच बरमूडा त्रिकोण है, जबकि दूसरे की खोज अभी २६ वर्ष पहले 18 अगस्त 1990 को हुई। जापान, ताइवान तथा गुगुआन के मध्य स्थित यह ट्रायंगल “ड्रेगन्स ट्राइएंगल” के नाम से प्रसिद्ध है | क्या होते है ये वर्म होल ? वर्म होल इस अखिल विश्व ब्रह्माण्ड के वो छिद्र हैं जहाँ पर समय (Time) और आकाश (Space) की सारी ज्यामितियाँ एक हो जाती हैं अर्थात यहाँ पर समय (Time) और आकाश (Space) का परस्पर एक-दूसरे में रूपांतर संभव है | समय (Time) और आकाश (Space) की ज्यामितियाँ एक हो जाने की वजह से, इस अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में जितनी भी विमायें (Dimensions) हैं वो सब उस ‘बिंदु’ में तिरोहित हो जाती हैं इसी वजह से इस बिंदु में प्रचंड आकर्षण शक्ति होती है |

    तो अगर आप किसी वर्म होल के मुहाने पर खड़े हैं तो उसकी अकल्पनीय आकर्षण शक्ति में फंस सकते हैं | एक बार कोई भी वस्तु उस छिद्र में फंसी तो वो स्वयं भी उस बिंदु के समान हो जाएगी लेकिन अगले ही क्षण वो इस बिंदु से बाहर किसी दूसरे लोक में होगी | जितने समय तक वो वस्तु उस बिंदु में रहेगी वो अपने आप को उस ब्रह्माण्ड की सारी विमाओं (Dimensions) में व्यक्त करेगी लेकिन ये समय इतना कम होता है कि न तो इसको किसी भी तरह से मापा जा सकता है और न ही इस मानवीय शरीर से इसका अनुभव किया जा सकता है |

    अगर आप दुर्भाग्य वश इस वर्म होल में फंस गए तो, दिक्-काल (Time-Space) की सारी ज्यामितियों के हो जाने की वजह से, आप के साथ दो संभावने हो सकती है | या तो आप किसी बिलकुल अद्भुत और अनजान लोक में पहुंचे लेकिन वहां भी उसी समय में जी रहे होंगे जिस समय में आप जीते अगर पृथ्वी लोक में होते तो | ऐसा भी हो सकता है की दूसरे लोक में भी आपको अपने आस-पास, अपने लोगो की आवाज़े आरही हों जो गायब होते वक्त आपके आस-पास थे लेकिन आप उनको देख नहीं पा रहे हों क्योकि आप उनसे इतर किसी दूसरे लोक में हैं | ऐसा इसलिए होता है की वर्म होल में फंसने की वजह आप के क्षेत्र या आकाश (Space) की ज्यामिति परिवर्तित (Change) हो गयी लेकिन आपके समय (Time) की ज्यामिति नहीं बदली |

    दूसरी सम्भावना ये है कि हो सकता है वर्म होल में फंसने के बाद आप वापस उसी जगह पर हों लेकिन आप की अपनी दुनिया के लोग वहां न हों हांलाकि हो सकता है जगह थोड़ी सी बदली-बदली सी लगे लेकिन वास्तव में आप होंगे उसी जगह पर, लेकिन आप के अपने समय के संगी-साथी वहां नहीं होंगे | ऐसा समय की ज्यामिति परिवर्तित होने से होता है | यानि आपके स्थान या आकाश (Space) की ज्यामिति तो वही रही लेकिन समय (Time) की ज्यामिति बदल गयी |आप अपने ही लोक, अपने ही ग्रह पर लेकिन किसी और समय में होंगे |

    यद्यपि वर्महोल की परिकल्पना वैज्ञानिको के लिए अभी भी चुनौती पूर्ण बनी हुई है लेकिन ब्रह्माण्ड के अद्भुत रहस्यों में से एक वर्म होल ने कई अनसुलझी गुत्थियों को सुलझा भी दिया है | पृथ्वी पर स्थित वर्म होलों के संबंध में वैज्ञानिकों के एक दल का विश्वास है कि इस प्रकार के अनेक छोटे वर्म होल्स इसके जल या स्थल भाग में स्थित हो सकते हैं पर किन्हीं कारणों से उनके मुँह बंद रहते हैं और यदा−कदा ही खुलते हैं, किन्तु जब खुलते हैं, तो इस प्रकार की घटनाएँ देखने−सुनने को मिलती हैं। ये छिद्र कभी−कभी ही क्यों खुलते हैं और अधिकाँश समय बंद क्यों रहते हैं? इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक अब पृथ्वी स्थित अपनी प्रयोगशाला में ही छोटे आकार के वर्महोल विनिर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि उनकी प्रकृति के बारे में गहराई से अध्ययन किया जा सके। यदि ऐसा हुआ, तो फिर लोक−लोकान्तरों की यात्रा बिना किसी कठिनाई के कर सकना संभव हो सकेगा और व्यक्ति इच्छानुसार किसी भी लोक का सफर किसी भी समय सरलतापूर्वक कर सकेगा।

    ऐसे गमनागमन का आर्ष साहित्यों में यत्र−तत्र वर्णन भी मिलता है। महाभारत में एक इसी तरह के प्रसंग का उल्लेख वन पर्व के तीर्थयात्रा प्रकरण में मौजूद है, जिसमें बंदी नामक एक पंडित ने यज्ञ के आयोजन के लिए विद्वान ब्राह्मणों को समुद्र मार्ग से वरुण लोक भेजा था। चर्चा यह भी है कि यज्ञ के उपराँत वे सकुशल पुनः उसी मार्ग से पृथ्वी लोक आ गये थे। इससे स्पष्ट है कि तब लोग उस विद्या में निष्णात् हुआ करते थे, जिसे आत्मिकी या उच्च स्तरीय रूप माना जाता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो उनका वापस लौट पाना एक प्रकार से अशक्य बना रहता। आज इसी अशक्त ता के कारण ऐसी घटनाओं में व्यक्ति एक लोक से दूसरे में पहुँच तो जाता है, पर फिर अपने पूर्व लोक में वापस नहीं आ पाता। इससे यह भी साबित होता है कि अन्य लोकों का सुनिश्चित अस्तित्व असंदिग्ध रूप से विद्यमान है।

    इसी का समर्थन करते हुए प्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्ड एच. ब्रायण्ट अपनी कृति “अदर वर्ल्डस” में लिखते हैं कि भौतिक आयामों से परे अपने ही जैसे किसी अन्य विश्व-ब्रह्माण्ड के लिए यह जरूरी है कि व्यक्त चार आयामों के अतिरिक्त और चार आयाम हों। यह आयाम प्रत्यक्ष आयामों को ढकेंगे नहीं, वरन् हर नया आयाम प्रत्येक दूसरे से समकोण पर स्थित होगा। वे कहते हैं कि यद्यपि इस प्रकार की विचारधारा सिद्धाँत रूप में संभव नहीं है, फिर भी गणितीय रूप से इसे दर्शाया जा सकता है। उनके अनुसार यदि भौतिक विज्ञान की पहुँच से बाहर दृश्य आयामों से परे कोई पड़ोसी अदृश्य संसार वास्तव में है, तो इसे पाँचवें, छठवें, सातवें और आठवें आयामों से बना होना चाहिए। इस प्रकार विज्ञान ने भी सूक्ष्म लोकों के अस्तित्व पर एक प्रकार से मुहर लगा दी है।


    Tuesday, 12 September 2017

    शराब से नशा क्यों होता है?

    By: Secret On: 10:00
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  • आज कल के ज्यादातर यंगस्टर्स पूरी तरह से शराब के आदी हैं। शराब पीने वाले लोग भी बहुत अलग अलग प्रकार के होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, जिन्हें 7-8 ड्रिंक्स के बाद भी कुछ फर्क नहीं पड़ता, वहीं कुछ ऐेसे भी होते हैं, जिन्हें 2 ड्रिंक्स के बाद ही इतना नशा हो जाता है कि फिर उन्हें कुछ होश नहीं रहता है।

    अक्सर आपने शराब के नशे में लोगो को मस्ती से झूमते और नाचते देखा होगा। तो आखिर ऐसा क्यों है कि अगर एक ड्रिंक आपको अच्छा महसूस कराती है, तो वहीं 5-6 ड्रिंक्स के बाद आपको नशा चढ़ने लगता है? तो बता दें कि इसका कारण है अल्कोहल, या यूं कहें कि अल्कोहल में बरसों से पाया जाने वाला में इथेनॉल।

    दरअसल जब आप अल्कोहल पीते हैं, तो आपके शरीर में पानी में घुलनशील इथेनॉल स्वतंत्र रूप से पास होता है। यह आपके पाचन तंत्र में प्रवेश करने के बाद, आपके खून में जाता है। इसके बाद सेल मैमबरेंस से गुजरता हुआ यह आपके दिल के माध्यम से स्ट्रॉल करता है।

    इसे विशेष रूप से मस्तिष्क में रहना पसंद होता है, जहां यह एक केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को अवसादग्रस्त कर देता है। मस्तिष्क में पहुंचने पर इथेनॉल भटकता रहता है और इसकी वजह से फीलगुड डोपामाइन रिलीज होते हैं और तंत्रिका रिसेप्टर्स के साथ लिंक हो जाते हैं। इन रिसेप्टर्स में से इथेनॉल विशेष रूप से ग्लूटामेट से जुड़ता है।

    यह एक न्यूरोट्रांसमीटर है, जो न्यूरॉन्स को उत्तेजित करता है। इथेनॉल ग्लूटामेट को सक्रिय बनाने की अनुमति नहीं देता है और यह उत्तेजनाओं का जवाब देने के लिए मस्तिष्क को धीमा कर देता है। इथेनॉल, गामा एमिनोब्युटिक एसिड (जीएबीए) को बांधता है। ग्लूटामेट के साथ अपनी कठोरता के विपरीत, इथेनॉल गाबा रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है।

    ये रिसेप्टर्स एक व्यक्ति को शांत और निद्रा महसूस कराते हैं, जिससे मस्तिष्क की क्रिया भी आगे बढ़ती है। बेशक, किसी की शराबी की गंभीरता अन्य कारकों पर भी निर्भर है। आपको यकीन नहीं होगा लेकिन आपका लिंग, आयु, वजन, यहां तक कि आप जो खाते हैं, वो भी आपकी नशे की लत में कुछ भूमिका निभाते हैं।

    अल्कोहल को अंत में लगभग 29 मिलीलीटर प्रति घंटे की दर से लिवर में एंजाइमों द्वारा मेटाबोलाइज किया जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया से अंगों को लंबे समय तक के लिए नुकसान हो सकता है। शराब की ओवरडोज मस्तिष्क के कामों में इतनी ज्यादा कमी कर सकती है कि यह शरीर में महत्वपूर्ण सिग्नल भेजने में भी विफल रहता है।

    Saturday, 9 September 2017

    Neanderthals और आधुुनिक मानव के बीच क्या कुछ संबंध रहा, जानिए यहां

    By: Secret On: 08:24
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  • शोधकर्ताओं का कहना है कि Neanderthals  पहले की तुलना में मर चुके हैं। हाल ही के अध्ययन के निष्कर्ष में ये संकेत सामने आए हैं कि Neanderthals  आधुनिक मानवों के साथ भी  नहीं रहते थे, जैसा पहले माना गया था।

     एक अंतरराष्ट्रीय टीम के शोधकर्ताओं  ने 215 हड्डियों की जांच की है, जो पहले स्पेन में स्थित क्षेत्र में दक्षिणी इबेरिया में 11 साइटों से खुदाई की गई के दौरान मिली  थी। उनके आंकड़े बताते हैं कि आधुनिक मानव और Neanderthals वास्तव में इस क्षेत्र में पूरी तरह से अलग-अलग समय पर रहते थे, कभी भी मार्गों को पार नहीं कर सकते थे। इन निष्कर्षों में यह  सवाल भी आया कि क्या आधुनिक इंसान और Neanderthals एक बार सेक्स करते थे। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि आधुनिक मानव में प्रवेश करने से पहल ही अंतर-प्रजनन पहले हो चुका होगा।

    इंटरब्रीड से आनुवंशिक सबूत वर्तमान आधुनिक मनुष्यों में 1 से 4 प्रतिशत हैं Neanderthals के डीएनए  से पता चलता है । वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार की तकनीकों का उपयोग करके कलाकृतियों और जीवाश्मों की आयु का पता लगाया है। उदाहरण के लिए, रेडियोगारबन डेटिंग कार्बन आइसोटोप कार्बन -12 और कार्बन -14 के बीच के अनुपात के आधार पर जैविक अवशेषों की आयु निर्धारित की गई ।

      जैफ़ोरैया गुफा में एक समान परत में Neanderthals जीवाश्म के रूप में पाया गया था। हड्डियों का अनुमान पहले 33,300 वर्ष की आयु में का था। हालांकि, एक अल्ट्राफिल्टरेशन तकनीक का उपयोग करके पता चला कि ये   46,700 साल से अधिक पुरानी थी।

     हमारे परिणाम 1990 के दशक के शुरूआती दिनों से स्वीकार किए गए एक अनुमान पर संदेह करते हैं जो Neanderthals जीवित रहने के लिए अंतिम स्थान दक्षिणी Iberian प्रायद्वीप में था। वैसे ज्यादातर सबूत ने इस विचार को समर्थन दिया है। ये निष्कर्ष बताते हैं कि आधुनिक इंसानों और Neanderthals ने इस क्षेत्र में बातचीत नहीं की है। पिछले अनुसंधान ने सुझाव दिया कि आधुनिक इंसान केवल 42,000 साल पहले शुरू हुए थे।

    Wednesday, 19 October 2016

    नासा ने खोजा पृथ्वी का जुड़वां ग्रह !

    By: Secret On: 20:00
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  • नासा ने खोजा पृथ्वी का जुड़वां ग्रह !


    पृथ्वी के बाहर जीवन की चाह फिर से परवान चढ़ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था नासा ने बिलकुल पृथ्वी जैसा ग्रह खोज निकाला है. वह अपने सूर्य का चक्कर लगाता है. न बहुत ठंडा, न बहुत गर्म और पानी की पूरी संभावना.
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    कोई तीन साल पहले अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने नए ग्रहों की तलाश में केपलर नाम का टेलीस्कोप पृथ्वी से बाहर अनजान दुनिया की खोज में भेजा था. दो साल की मेहनत के बाद वैज्ञानिकों को वे तस्वीरें मिल गईं, जो अब तक की सबसे उत्साहित करने वाली बताई जा रही हैं. ऐसे ग्रह का पता चल रहा है, जो पृथ्वी से ढाई गुना बड़ा होगा. तापमान 22 डिग्री के आस पास यानी पानी न तो जमेगा और न ही खौलेगा. दिन वसंत ऋतु के किसी दिन की तरह खुशगवार होगा. उसकी स्थिति ऐसी जगह है, जहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है यानी उस ग्रह में वह सारे गुण हैं, जो पृथ्वी में हैं और जिसके आधार पर जीवन की कल्पना की जा सकती है. केपलर को सम्मान देते हुए ग्रह का नाम रखा गया है, केपलर-22बी.
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    घर के बाहर घर
    नए ग्रहों की तलाश के मामले में बड़ा योगदान देने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ज्यॉफ मार्सी का कहना है, "यह मानव इतिहास की महान खोज मानी जाएगी. यह खोज बताती है हम होमोसेपियन (मनुष्य का बायोलॉजिकल नाम) पृथ्वी के बाहर घर की तलाश कर रहे हैं और ऐसी जगह पहुंच चुके हैं, जो हमें अपने घर की याद दिला रहा है."
    नया ग्रह अपने प्रमुख सितारे की उसी तरह परिक्रमा कर रहा है, जैसा पृथ्वी सूर्य की करता है. उसका तारा सूर्य जितना ही बड़ा लग रहा है. केपलर-22बी को इसकी परिक्रमा करने में पृथ्वी से करीब 10 महीने कम लगभग 290 दिन का वक्त लगा है. बस इस ग्रह का आकार थोड़ा बड़ा है. यह पृथ्वी से करीब 2.4 गुना बड़ा है. फिर भी हमारे सौरमंडल के बाहर मिले दूसरे ग्रहों से इसका आकार छोटा है और यहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है. ग्रह पानी और पत्थरों से बना हो सकता है और इसकी बनावट पृथ्वी और गैस तथा द्रव से बने नेप्च्यून ग्रहों के बीच की बताई जा रही है.
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    कैसे कहूं, क्या है
    इस खोज से उत्साहित सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी की अंतरिक्ष विज्ञानी और नासा के केपलर अभियान की उप प्रमुख नताली बतालहा का कहना है, "हम पृथ्वी और नेप्च्यून ग्रहों के बीच के किसी ग्रह के बारे में ज्यादा नहीं बात कर सकते हैं क्योंकि हमारे सौरमंडल में ऐसा कोई ग्रह नहीं है. हम नहीं कह सकते हैं कि किस हिस्से में पानी होगा, कहां पत्थर होगा और किन इलाकों में बर्फ जमा होगी. हम जब तक इस बारे में जानकारी इकट्ठी नहीं कर लेते, तब तक कुछ नहीं बता पाएंगे."
    लेकिन जानकारी इकट्ठी करना इतना आसान नहीं होगा. यह ग्रह हमारे सौरमंडल से कोई 600 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में अनुमानित 10,000 अरब साल का वक्त लग जाता है. यानी मौजूदा वक्त की सबसे तेज उड़ान भरने वाला अंतरिक्ष यान केपलर-बी22 तक पहुंचने में कोई सवा दो करोड़ साल लगाएगा. मौजूदा वक्त में भले ही यह नामुमकिन लग रहा हो लेकिन विज्ञान अद्भुत आविष्कारों का गवाह रहा है और कब कौन सा आविष्कार कौन से दरवाजे खोल दे, कोई नहीं कह सकता.
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    मुश्किल से मिलता ग्रह
    केपलर को बेहद जटिल प्रक्रिया के बाद गोल्डीलॉक्स जोन में इस ग्रह के बारे में पता चला. यह टेलीस्कोप सिर्फ उन्हीं ग्रहों की निशानदेही करता है, जो अपने तारों का चक्कर लगा रहे हों. किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने से पहले उस ग्रह के तीन चक्कर पूरे होने जरूरी हैं यानी तीन मौका ऐसा आना चाहिए, जब वह अपने मुख्य ग्रह के सामने से गुजरे. इस खोज को अलग अलग तीन जगहों की सहमति मिलनी चाहिए. केपलर की रिसर्च में 2326 ग्रहों की स्टडी की गई, जिसमें 10 ग्रह ऐसे निकले, जो पृथ्वी के आकार के हैं और अपने तारों का चक्कर लगाते दिखे.
    केपलर की एक उड़ान ने वैज्ञानिकों को पृथ्वी के जुड़वां ग्रह तक तो पहुंचा दिया. अब कल्पना की दूसरी उड़ान उन्हें उस धरातल पर उतार भी सकती है.

    सुपरनोवा के रहस्य से उठेगा पर्दा

    By: Secret On: 07:00
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  • सुपरनोवा के रहस्य से उठेगा पर्दा


    अनंत अंतरिक्ष में एक सुपरनोवा के विस्फोट के कुछ ही घंटों के अंदर यह वैज्ञानिकों की पकड़ में आ गया. इसके बाद ब्रह्मांड को सबसे ज्यादा चकाचौंध कर डालने वाले चमकीले राज के बारे में बहुत कुछ बताया जा सकता है.
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    इसी साल 24 अगस्त को अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने सहस्त्रों अरब मील दूर हुए एक विस्फोट का प्रकाश लगभग 11 घंटे बाद पकड़ लिया. इस विस्फोट के कारण एसएन 2011 एफई सुपरनोवा का निर्माण हुआ, जो पिछले 25 सालों में पृथ्वी के सबसे निकट उत्पन्न हुआ सुपरनोवा था. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह जगह हमारी धरती से मात्र दो करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है. प्रकाश वर्ष को प्रकाश की गति में मापा जाता है. यानी 365 दिन में प्रकाश जितनी दूरी तय करेगी, उसे एक प्रकाश वर्ष कहा जाता है. एक प्रकाश वर्ष में अनुमानित 10,000,000,000,000 (एक हजार अरब) किलोमीटर होते हैं.
    अमेरिका के लॉरेंस बेर्केली नेशनल लेबोरेट्री के पीटर नूगेंट ने बताया, "सुपरनोवा के विस्फोट के मात्र 11 घंटे बाद हमें यह दिख गया. इस वजह से हमें 20 मिनट के अंदर ही इसके होने के वास्तविक समय का पता लग गया. इसके बाद हमें जो जानकारियां मिली हैं, कोई उसके बारे में सपने में भी नहीं सोच सकता था."
    बदलती धारणा
    1ए टाइप के सुपरनोवा से उत्पन्न ऊर्जा को ही किसी भी सुपरनोवा की दूरी मापने के लिए मानक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. सुपरनोवा के खोज से जुड़ी जानकारी जुटाने पर इस साल का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया है. वैज्ञानिकों का दावा है कि अंतरिक्ष का विस्तार हो रहा है, जबकि पहले धारणा यह थी कि अंतरिक्ष बढ़ नहीं रहा है बल्कि सिकुड़ रहा है.
    खगोल वैज्ञानिकों का दावा है कि तीन कारणों से 1ए टाइप का सुपरनोवा बन सकता है. लेकिन ये अद्भुत खगोलीय घटनाएं कोई 100-200 साल में सिर्फ एक बार होती हैं. इन तीनों ही मामलों में व्हाइट ड्वार्फ नाम का टूटता हुआ एक बुजुर्ग तारा अपने पड़ोसी तारों की ऊर्जा और द्रव्य खींचता है. इसी प्रक्रिया के दौरान एक भयंकर विस्फोट होता है और यह तारा टुकड़े टुकड़े में बंट जाता है. इस विस्फोट से जो रोशनी पैदा होती है, वह सूरज के प्रकाश से एक अरब गुना ज्यादा चमकीली होती है.
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    क्या है सुपरनोवा?
    किसी बुजुर्ग तारे के टूटने से वहां जो ऊर्जा पैदा होती है, उसे ही सुपरनोवा कहते हैं. कई बार एक तारे से जितनी ऊर्जा निकलती है, वह हमारे सौरमंडल के सबसे मजबूत सदस्य सूरज के पूरे जीवन से निकलने वाली ऊर्जा से भी ज्यादा होती है.
    सुपरनोवा की ऊर्जा इतनी बलवान होती है कि वह हमारी धरती की आकाशगंगा को कई हफ्तों तक फीका कर सकती है. व्हाइट ड्वार्फ को धरती के आकार का हीरा बताया जाता है. इसके बस एक चम्मच द्रव्य का वजन 10 टन तक हो सकता है. ज्यादातर व्हाइट ड्वार्फ गर्म होते होते पलक झपकते लोप हो जाते हैं. लेकिन कुछ गिने चुने व्हाइट ड्वार्फ दूसरे तारों से मिल कर सुपरनोवा का निर्माण करते हैं.
    राज और भी हैं
    अब सवाल यह उठता है कि वे कौन से तारे होते हैं, जो व्हाइट ड्वार्फ की मदद करते हैं. इन्हें दूसरा व्हाइट ड्वार्फ या रेड जाएंट तारा कहते हैं. हमारी सौर मंडल का प्रमुख तारा सूर्य भी एक रेड जाएंट है. ली वाइडांग की टीम ने हबल स्पेस टेलिस्कोप से कुछ तस्वीरें जमा की हैं, जिसमें विस्फोट से पहले रेड जाएंट पकड़ में आ गया है. उस वक्त उसकी ऊर्जा हमारे सूर्य से 10,000 गुना ज्यादा थी.
    नुगेंट की टीम ने इस खोज को थोड़ा आगे बढ़ाने की कोशिश की है. कैलिफोर्निया के प्रयोगशाला से उन्होंने जो जानकारी जमा की, उसके मुताबिक सुपरनोवा के विस्फोट के बाद इसका कुछ मलबा उस पड़ोसी तारे पर गिरता है, जिससे आतिशबाजी जैसा नजारा दिखता है.
    हालांकि वैज्ञानिकों को अभी इस बारे में पक्का पता नहीं लग पाया है कि इन पड़ोसी तारों का आकार क्या होता है. यहीं आकर खगोल विज्ञानियों को हाथ रोक लेना पड़ता है. अंतरिक्ष और ब्रह्मांड जितने राज खोलता है, उतने नए राज सामने भी ले आता है. अब टिकटिकी डाल कर तारे देखने वाले अंतरिक्ष विज्ञानियों को कम से कम 30 साल का इंतजार करना पड़ेगा. तब अगले सुपरनोवा विस्फोट की उम्मीद है. और अगर किस्मत अच्छी हुई, तो वह सुपरनोवा धरती के बहुत पास अपनी आकाशगंगा में भी बन सकता है.

    Tuesday, 18 October 2016

    प्रकाश की गति से तेज कुछ नहीं

    By: Secret On: 17:00
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  • प्रकाश की गति से तेज कुछ नहीं


    आइंस्टीन ने 100 साल पहले कहा था कि प्रकाश की गति से तेज कुछ नहीं हो सकता है. पिछले साल इस पर सवाल उठे और कहा गया कि न्यूट्रीनो तेज हो सकते हैं. कई परीक्षणों के बाद वैज्ञानिकों ने मान लिया कि आइंस्टीन सही थे.
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    एटम यानी परमाणु से भी छोटे इस कण पर स्विट्जरलैंड की मशहूर सेर्न प्रयोगशाला में प्रयोग किए गए. इटली की ग्रैन सासो ने पिछले साल सितंबर में यहीं दावा किया था कि गति के मामले में प्रकाश को भी मात देने वाला कोई कण पा लिया गया है. हालांकि इसे तथ्य के तौर पर नहीं रखा गया था और कहा गया था कि कुछ और प्रयोगों की जरूरत है. पिछले महीने पता चला कि मशीन में तार लगाते वक्त कहीं कुछ गड़बड़ हुई थी. उसके बाद से इस बात पर शक और गहरा गया.
    नई जानकारी इकारुस नाम के प्रयोग से सामने आई है. इसमें सर्न के वैज्ञानिकों ने एक एक कर सात न्यूट्रीनो को छोड़ा और देखा कि उनकी रफ्तार लगभग प्रकाश की गति के बराबर ही है. उससे ज्यादा कतई नहीं. इस नए प्रयोग के बारे में इससे जुड़े वैज्ञानिक सैंड्रो सेंट्रो का मानना कि इस बार सही नतीजे पा लिए गए हैं. उन्होंने कहा, "प्रकाश की गति और न्यूट्रीनो की गति बिलकुल बराबर थी."
    ये सारे प्रयोग उस महाप्रयोग के हिस्से हैं, जो 2008 में शुरू हुआ था और शुरू में जिसकी वजह से अफवाह उड़ी थी कि दुनिया खत्म हो सकती है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि वह ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिए यह प्रयोग कर रहे हैं कि आखिर पृथ्वी और इसका वातावरण कैसा बना. वे बिग बैंग थ्योरी पर काम कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे ही एक विस्फोट के बाद धरती बनी थी.
    पिछले बार के रिसर्च में कहा गया था कि न्यूट्रीनो ने सर्न से ग्रान सासो तक की 730 किलोमीटर तक की दूरी 60 नैनोसेकंड यानी सेकंड के 60 अरबवें हिस्से में पूरी कर ली थी. यह गति निश्चित तौर पर प्रकाश की गति से कहीं ज्यादा है. सर्न के रिसर्च डायरेक्टर सर्गियो बर्तेलुच्ची का कहना है, "अभी वैज्ञानिक मई में कुछ और प्रयोग करने वाले हैं. उसके बाद ही सर्न पक्के तौर पर कुछ कह सकता है."
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    कई वैज्ञानिकों ने पिछले प्रयोग के बाद से ही उस पर अंगुली उठानी शुरू कर दी थी क्योंकि उससे आइंस्टीन का बुनियादी सिद्घांत गलत साबित हो रहा था. साल 1905 में आइंस्टीन ने सापेक्षता का सिद्धांत दिया था, जिसमें कहा गया था कि इस ब्रह्मांड में कोई भी वस्तु प्रकाश की गति से तेज नहीं चल सकता है. अगर यह सिद्धांत गलत साबित हो जाए, तो आधुनिक भौतिकी के दर्जनों सिद्धांत खारिज हो जाएंगे क्योंकि वे उसी बुनियाद पर तैयार हुए हैं. इसके अलावा विज्ञान की हजारों किताबों को दोबारा लिखना होगा.
    इसी से मिलते जुलते प्रयोग पर रोम के पास की एक प्रयोगशाला में भी रिसर्च चल रहा है. यहां के वैज्ञानिक शुरू से उस बात पर सवाल उठा रहे थे, जिसमें न्यूट्रीनो की गति के बारे में बात चल रही थी. उनका सीधा सा तर्क था कि अगर न्यूट्रीनो ने प्रकाश की गति भेद दी होती, तो उसकी ऊर्जा अत्यधिक कम हो जाती जो कि नहीं हुआ.
    वैज्ञानिकों ने पहाड़ियों के बीच में सुरंगनुमा प्रयोगशाला तैयार की है, जिस पर बरसों चलने वली रिसर्च की जा रही है.

    ग्रहों को निगल रहा है ब्लैक होल धनु-ए

    By: Secret On: 06:30
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  • ग्रहों को निगल रहा है ब्लैक होल धनु-ए


    धरती से 26,000 प्रकाश वर्ष दूर एक विशाल ब्लैक होल एक एक कर ग्रहों, तारों और पिंडो को निगल रहा है. ब्लैक होल हमारी आकाश गंगा के केंद्र में है. वैज्ञानिकों के मुताबिक ब्लैक होल सूर्य से चार लाख गुना बड़ा है.
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    ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेस्टर के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि यह ब्लैक होल हर दिन ब्रह्मांड में तैरती चीजों को निगलता जा रहा है. ब्लैक होल को सैजिटेरियस-A (धनु-ए) नाम दिया गया है. डॉक्टर कास्टीटिस जुबोवास के मुताबिक धनु-ए अपने सामने आने वाले गैस और धूल से बने क्षुद्र ग्रहों को तोड़ कर निगल रहा है. इस दौरान एक्स-रे किरणें और इंफ्रारेड विकीरण भी दिखाई पड़ रहा है.
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    डॉक्टर जुबोवास और उनके साथियों कहते हैं कि ब्लैक होल आकार में सूर्य से 4,00,000 गुना बड़ा है. ब्रह्मांड में तैर रहे तारों के अवशेषों को भी धनु-ए निगलता जा रहा है.
    ब्लैक होल सोलर सिस्टम
    यह जानकारी सामने आने के बाद यह बहस फिर छिड़ गई है कि क्या ब्लैक होल सौर मंडल को नए सिरे से बनाते हैं. ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के माउंट स्ट्रोम्लो ऑब्जरवेट्री के मिशेल बैनिस्टर कहती हैं, "आकाश गंगा का केंद्र एक अत्यंत ऊर्जा वाला स्थान है. बहुत कम दायरे में गतिशील रहने वाले कुछ ग्रह वहां पर बन सकते हैं."
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    एक्स रे किरणें और इंफ्रारेड विकीरण से साबित होता है कि आकाश गंगा के केंद्र के पास क्षुद्र ग्रह, पुच्छल तारे और ग्रह हो सकते हैं. मिशेल यह संभावना जताती है कि ब्लैक होल के किनारों पर ग्रहों का निर्माण हो सकता है.
    ग्रहों की मौत
    ब्रिटिश यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का तर्क है कि ब्लैक होल के किनारे भले ही ग्रहों की उपत्ति के लिए अच्छा माहौल बनाते हों लेकिन इसी इलाके में ग्रहों की मृत्यु भी होती है. इस दौरान अपार ऊर्जा निकलती है. जब कोई बड़ा ग्रह ब्लैक होल में समाता है तो कुछ ही पलों के लिए इंफ्रारेड विकीरण और एक्स रे किरणें दिखाई पड़ती हैं.
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    ब्लैक होल और उसके किनारे बनते ग्रहों के संबंध में यह जानकारी नई है. मेलबर्न की स्विनबर्न यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर एलिस्टर ग्रैहम कहते हैं, "सभी नहीं, लेकिन अधिकतर आकाशगंगाओं के केंद्र में विशाल ब्लैक होल है." ग्रैहम भी इस बात से सहमत हैं कि धनु-ए की ताकत तारों को तोड़ रही है और हर दिन उससे एक्स रे किरणें और इंफ्रारेड विकीरण देखा जा रहा है.

    Sunday, 16 October 2016

    मृत्य के बाद का अनुभव – Experience After Death

    By: Secret On: 04:30
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  • मृत्य के बाद का अनुभव – Experience After Death

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    दोस्तों, जिसने भी इस धरती पर किसी भी रूप में जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन इस शरीर को छोड़ कर मृत्यु को गले लगाना ही है, यह इस संसार का शाश्वत सत्य है। हम सभी कभी न कभी यह जरूर सोचते होंगे की आखिर मृत्यु के बाद होता क्या है। खैर, अभी तक इस प्रश्न का उत्तर किसी को नहीं मिला है, हाँ यह जरूर है की पूरी दुनिया के वैज्ञानिक अपने अपने स्तर पर इसका जवाब खोजने में लगे हुए हैं, और थोड़ी सी ही सही लेकिन कुछ जानकारी जरूर हमें प्राप्त हुयी है।
    एक सबसे बड़े medical studies में वैज्ञानिकों ने मौत से नजदीकी अनुभव (Near-death Experiences) और शरीर के बाहर का अनुभव (Out-of-body Experiences) होने की खोज की है, जिसमे उन्होंने साबित किया हैं की इन्सान के मृत्यु के बाद उसका दिमाग पूरी तरह बंद हो जाता है लेकिन तब भी उसके अन्दर की चेतना (Consciousness) और जागृतता (Awareness) जारी रहती है।  वैज्ञानिकों ने 4 साल तक 2000 जितने लोगो की जांच की है और उन्होंने देखा की इनमे से 40% लोग ऐसे थे जो मर चुके थे और थोड़े समय के बाद इनका दिल फिर से धडकने लगा था। इस जीवन और मृत्यु के समय के दौरान लोगों ने किसी तरह की जागृतता (Awareness) अनुभव करने का वर्णन किया है।
    कई लोगों ने मृत्यु के बाद अपने शरीर को पूरी तरह से छोड़ने के बाद खुद के ही शरीर को Room के किसी एक corner से देख सकने का का अनुभव किया। उन्होंने अनुभव किया की वे room में उनके शरीर से थोड़ी ऊंचाई पर स्थित हैं और doctors उनका ईलाज कर रहे हैं। वे लोग अपने आप को देख सकते थे। इलाज के वक्त कुछ लोगों ने 3-5 मिनट तक मर चुके होने के बावजूद उस वक्त के दौरान उस room में होती हुई प्रत्येक activities का वर्णन किया। उसमें उन्होंने Nursing staffs के लोगों के काम का वर्णन किया और machines की आवाजें सुनी। ज्यादातर मामले में दिल धडकना बंद हो जाने के बाद 20-30 सेकंड के अंदर दिमाग काम करना बंद कर देता है, लेकिन इन मामलों में दिल धडकना बंद हो जाने के 3-5 मिनिट तक वहाँ पर शरीर में जागृतता (Awareness) मौजूद थी।
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    कुछ लोगों ने असामान्य रूप से शांति की भावना का अनुभव किया तो कुछ लोगों ने समय बहुत धीरे से चलने का या बहुत ही तेजी से चलने का अनुभव किया। कुछ लोगों ने सूरज के जैसी सुनहरे रंग की बहुत चमकदार रोशनी को देखने की बात कही तो कुछ लोगों ने किसी अनजान डर का अनुभव किया और कुछ लोगों ने खुद को गहरे पानी में डूबने का या गहराई में घसीटे जाने का अनुभव किया। कुछ लोगों को चमकदार रौशनी की tunnel दिखती हैं जिसमे वे light की ओर तेजी से जाने लगते हैं।
    69% मामलों में लोग अपने आसपास एक असामान्य प्यार की मौजूदगी होने का अनुभव करते हैं, वहाँ पर उन्हें कुछ इन्सान के आकार के रोशनी से भरपूर कुछ प्राणी दिखते हैं, कईयों का मानना है की यह प्राणी उनके मरे हुए प्रियजन थे। कुछ लोग ऐसी जगह पर पहुँच जाते हैं जहाँ पर उन्हें बहुत सारा प्यार और ख़ुशी महसूस होती है। उन्हें पृथ्वी के जीवन से यहाँ का जीवन ज्यादा असली लगता है। उनको लगता है की मानव शरीर वाला जीवन एक सपना था लेकिन यह सच्चाई है। कुछ लोग भगवान से मिलकर वापस आने की बात करते हैं। कुछ लोगो का कहना है की उनको दिखनेवाले रोशनीवाले प्राणी उनसे कहा है की तुम्हारा अभी यहाँ पर आने का वक़्त नहीं हुआ है, तुम्हे अभी बहुत काम करने बाकी है इसलिए तुम्हे वापस जाना पड़ेगा। कुछ लोग भविष्य की झलक देखने का दावा करते हैं तो कुछ लोग असीमित ज्ञान प्राप्त कर लेने का दावा करते हैं।
    वैसे वैज्ञानिक अभी इस विषय पर पूरी तरह से सही निष्कष तक नहीं पहुँच पाए हैं। कुछ वैज्ञानिकों का दावा हैं की ऐसे अनुभव लोगों के भ्रम भी हो सकते हैं या फिर दिमाग के अन्दर होती कोई chemical reactions का परिणाम हो सकते हैं, लेकिन मौत से नजदीकी अनुभव (Near-death Experiences) करने वाले लोगों ने जो देखा उस पर पूरा भरोसा रखते हैं। खैर, सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन science एक न एक दिन इस विषय पर से पर्दा जरुर उठाएगा।

    Monday, 10 October 2016

    भास्कराचार्य का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त – न्युटन से पहले बताया था।

    By: Secret On: 07:00
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  • भास्कराचार्य का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त – न्युटन से पहले बताया था।

    अक्सर हम सभी लोग पश्चिमी लोगों को ही वैज्ञान का श्रेय देते हैं। हम यह मानते हैं कि सबसे पहले जितने भी सिद्धांत आज विज्ञान में हैं वे सभी अंग्रेजों की देन है। पर, वास्तव में ऐसा नही हैं हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत ही पहले अध्ययन करके यह सभी सिद्धांत सफलतापुर्वक खोज लिये थे। आज हम आपको  गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे न्युटन से पहले भास्कराचार्य जी ने खोज लिया था, औऱ दुनिया के समाने रखा।

    खगोल विज्ञान को वेद का नेत्र कहा गया, क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टियों में होने वाले व्यवहार का निर्धारण काल से होता है और काल का ज्ञान ग्रहीय गति से होता है। अत: प्राचीन काल से खगोल विज्ञान वेदांग का हिस्सा रहा है। ऋग्वेद, शतपथ ब्राहृण आदि ग्रथों में नक्षत्र, चान्द्रमास, सौरमास, मल मास, ऋतु परिवर्तन, उत्तरायन, दक्षिणायन, आकाशचक्र, सूर्य की महिमा, कल्प का माप आदि के संदर्भ में अनेक उद्धरण मिलते हैं। इस हेतु ऋषि प्रत्यक्ष अवलोकन करते थे। कहते हैं, ऋषि दीर्घतमस् सूर्य का अध्ययन करने में ही अंधे हुए, ऋषि गृत्स्मद ने चन्द्रमा के गर्भ पर होने वाले परिणामों के बारे में बताया। यजुर्वेद के 18वें अध्याय के चालीसवें मंत्र में यह बताया गया है कि सूर्य किरणों के कारण चन्द्रमा प्रकाशमान है। यंत्रों का उपयोग कर खगोल का निरीक्षण करने की पद्धति रही है। आर्यभट्ट के समय आज से 1500 से अधिक वर्ष पूर्व पाटलीपुत्र में वेधशाला (Observatory) थी, जिसका प्रयोग कर आर्यभट्ट ने कई निष्कर्ष निकाले।
    भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ के यंत्राध्याय प्रकरण में कहते हैं

    >>LIGO ने दूसरी बार गुरुत्वाकर्षण तरंग देखने मे सफ़लता पायी 

     “काल” के सूक्ष्म खण्डों का ज्ञान यंत्रों के बिना संभव नहीं है। इसलिए अब मैं यंत्रों के बारे में कहता हूं। वे नाड़ीवलय यंत्र, यष्टि यंत्र, घटी यंत्र, चक्र यंत्र, शंकु यंत्र, चाप, तुर्य, फलक आदि का वर्णन करते हैं।

    प्रत्यक्ष निरीक्षण एवं अचूक ग्रहीय व कालगणना का 6000 वर्ष से अधिक पुराना इतिहास :-
    श्री धर्मपाल ने “Indian Science and Technology in the Eighteenth Century” नामक पुस्तक लिखी है। उसमें प्रख्यात खगोलज्ञ जॉन प्लेफेयर का एक लेख “Remarks on the Astronomy of the brahmins” (1790 से प्रकाशित) दिया है। यह लेख सिद्ध करता है कि 6000 से अधिक वर्ष पूर्व में भारत में खगोल का ज्ञान था और यहां की गणनाएं दुनिया में प्रयुक्त होती थीं। उनके लेख का सार यह है कि सन् 1667 में एम.लॉ. लाबेट, जो स्याम के दूतावास में थे, जब वापस आये तो अपने साथ एक पंचांग लाए। दो पंचांग मिशनरियों ने भारत से भेजे, जो एक दक्षिण भारत से था और एक वाराणसी से। एक और पंचांग एम.डी. लिस्ले ने भेजा, जो दक्षिण भारत के नरसापुर से था। वह पंचांग जब उस समय के फ्रेंच गणितज्ञों की समझ में न आया तो उन्होंने वह जॉन प्लेफेयर के पास भेज दिया, जो उस समय रॉयल एस्ट्रोनोमर थे। उन्होंने जब एक और विचित्र बात प्लेफेयर के ध्यान में आई कि स्याम के पंचांग में दी गई यामोत्तर रेखा-दी मेरिडियन (आकाश में उच्च काल्पनिक बिन्दु से निकलती रेखा) 180-15″। पश्चिम में है और स्याम इस पर स्थित नहीं है। आश्चर्य कि यह बनारस के मेरिडियन से मिलती है। इसका अर्थ है कि स्याम के पंचांग का मूल हिन्दुस्तान है।

    दूसरी बात वह लिखता है, “एक आश्चर्य की बात यह है कि सभी पंचांग एक संवत् का उल्लेख करते हैं, जिसे वे कलियुग का प्रारंभ मानते हैं। और कलियुग के प्रारंभ के दिन जो नक्षत्रों की स्थिति थी, उसका वर्णन अपने पंचांग में करते हैं तथा वहीं से काल की गणना करते हैं। उस समय ग्रहों की क्या स्थिति थी, यह बताते हैं। तो यह बड़ी विचित्र बात लगती है। क्योंकि कलियुग का प्रारंभ यानि ईसा से 3000 वर्ष पुरानी बात।


    (1) ब्राहृणों ने गिनती की निर्दोष और अचूक पद्धति विकसित की होगी तथा ब्रह्मांड में दूर और पास के ग्रहों को आकर्षित करने के लिए कारणीभूत गुरुत्वाकर्षण के नियम से ब्राहृण परिचित थे। (2) ब्राहृणों ने आकाश का निरीक्षण वैज्ञानिक ढंग से किया।
    प्लेफेयर के निष्कर्ष

    अंत में प्लेफेयर दो बातें कहते हैं-
    (1) यह सिद्ध होता है कि भारत वर्ष में एस्ट्रोनॉमी ईसा से 3000 वर्ष पूर्व से थी तथा कलियुगारम्भ पर सूर्य और चन्द्र की वर्णित स्थिति वास्तविक निरीक्षण पर आधारित थी।
    (2) एक तटस्थ विदेशी का यह विश्लेषण हमें आगे कुछ करने की प्रेरणा देता है।
    श्री धर्मपाल ने अपनी इसी पुस्तक में लिखा है कि तत्कालीन बंगाल की ब्रिाटिश सेना के सेनापति, जो बाद में ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य बने, सर रॉबर्ट बारकर ने 1777 में लिखे एक लेख Bramins observatory at Banaras (बनारस की वेधशाला) पर प्रकाश डाला है। सन् 1772 में उन्होंने वेधशाला का निरीक्षण किया था। उस समय इसकी हालत खराब थी क्योंकि लंबे समय से उसका कोई उपयोग नहीं हुआ था। इसके बाद भी उस वेधशाला में जो यंत्र व साधन बचे थे , उनका श्री बारकर ने बारीकी से अध्ययन किया। उनके निरीक्षण में एक महत्वपूर्ण बात यह ध्यान में आई कि ये साधन लगभग 400 वर्ष पूर्व तैयार किए गए थे।

    प्राचीन खगोल विज्ञान की कुछ झलकियां 

     

    (1) प्रकाश की गति :- क्या हमारे पूर्वजों को प्रकाश की गति का ज्ञान था? उपर्युक्त प्रश्न एक बार गुजरात के राज्यपाल रहे श्री के.के.शाह ने मैसूर विश्वविद्यालय के भौतिकी के प्राध्यापक प्रो. एल. शिवय्या से पूछा। श्री शिवय्या संस्कृत और विज्ञान दोनों के जानकार थे। उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, “हां जानते थे।” प्रमाण में उन्होंने बताया कि ऋग्वेद के प्रथम मंडल में दो ऋचाएं है- मनो न योऽध्वन: सद्य एत्येक: सत्रा सूरो वस्व ईशे अर्थात् मन की तरह शीघ्रगामी जो सूर्य स्वर्गीय पथ पर अकेले जाते हैं। ( 1-71-9) (“तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिकृदसि सूर्य विश्वमाभासिरोचनम्” अर्थात् हे सूर्य, तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो। ( 1.50.9)
    योजनानां सहस्रे द्वे द्वेशते द्वे च योजने।
    एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते।।
    अर्थात् आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है। इसमें 1 योजन- 9 मील 160 गज
    अर्थात् 1 योजन- 9.11 मील
    1 दिन रात में- 810000 अर्ध निषेष
    अत: 1 सेकेंड में – 9.41 अर्ध निमेष
    इस प्रकार 2202 x 9.11- 20060.22 मील प्रति अर्ध निमेष तथा 20060.22 x 9.41- 188766.67 मील प्रति सेकण्ड। आधुनिक विज्ञान को मान्य प्रकाश गति के यह अत्यधिक निकट है।


    (2) गुरुत्वाकर्षण: “पिताजी, यह पृथ्वी, जिस पर हम निवास करते हैं, किस पर टिकी हुई है?” लीलावती ने शताब्दियों पूर्व यह प्रश्न अपने पिता भास्कराचार्य से पूछा था। इसके उत्तर में भास्कराचार्य ने कहा, “बाले लीलावती, कुछ लोग जो यह कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कछुआ या हाथी या अन्य किसी वस्तु पर आधारित है तो वे गलत कहते हैं। यदि यह मान भी लिया जाए कि यह किसी वस्तु पर टिकी हुई है तो भी प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी हुई है और इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण… यह क्रम चलता रहा, तो न्याय शास्त्र में इसे अनवस्था दोष कहते हैं।
    लीलावती ने कहा फिर भी यह प्रश्न बना रहता है पिताजी कि पृथ्वी किस चीज पर टिकी है?
    तब भास्कराचार्य ने कहा,क्यों हम यह नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी भी वस्तु पर आधारित नहीं है।….. यदि हम यह कहें कि पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है और इसे धारणात्मिका शक्ति कह दें तो क्या दोष है? इस पर लीलावती ने पूछा यह कैसे संभव है।
    तब भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।
    मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो
    विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।
    सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश (5) 
    आगे कहते हैं-
    आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं
    गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या। 
    आकृष्यते तत्पततीव भाति
    समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।
    सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश- (6) 
    अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियां संतुलन बनाए रखती हैं।
    आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने यह बता दिया था।

    Friday, 30 September 2016

    दुनिया के टॉप 10 आविष्कार जो भारत ने किए

    By: Secret On: 20:00
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  •  दुनिया के टॉप 10 आविष्कार जो भारत ने किए


    बहुत से लोग यह मानते या कहते पाए गए हैं कि पश्चिम ने विश्व को विज्ञान दिया और पूर्व ने धर्म। दूसरी ओर हमारे ही भारतीय लोग यह कहते हुए भी पाए गए हैं कि भारत में कोई वैज्ञानिक सोच कभी नहीं रही। ऐसे लोग अपने अधूरे ज्ञान का परिचय देते हैं या फिर वे भारत विरोधी हैं।
    भारत के बगैर न धर्म की कल्पना की जा सकती है और न विज्ञान की। हमारे भारतीय ऋषि-मुनियों और वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे आविष्कार किए और सिद्धांत गढ़े हैं कि जिनके बल पर ही आज के आध‍ुनिक विज्ञान और दुनिया का चेहरा बदल गया है। सोचिए 0 (शून्य) नहीं होता तो क्या हम गणित की कल्पना कर सकते थे? दशमलव (.) नहीं होता तो क्या होता? इसी तरह भारत ने कई मूल: आविष्कार और सिद्धांतों की रचना की। आइए जानते हैं, उनमें से खास 10 आविष्कार जिन्होंने बदल दी दुनिया।
    1. विमान :
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    इतिहास की किताबों और स्कूलों के कोर्स में पढ़ाया जाता है कि विमान का आविष्कार राइट ब्रदर्स ने किया, लेकिन यह गलत है। हां, यह ठीक है कि आज के आधुनिक विमान की शुरुआत ओरविल और विल्बुर राइट बंधुओं ने 1903 में की थी। लेकिन उनसे हजारों वर्ष पूर्व ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र लिखा था जिसमें हवाई जहाज बनाने की तकनीक का वर्णन मिलता है।चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित ‘वैमानिक शास्त्र’ में एक उड़ने वाले यंत्र ‘विमान’ के कई प्रकारों का वर्णन किया गया था तथा हवाई युद्ध के कई नियम व प्रकार बताए गए थे।
    यह भी पढ़े>> क्या द्रोपदी थी अभिमन्यु के वध का कारण ? जाने महाभारत की अनसुनी कहानी !
    ‘गोधा’ ऐसा विमान था, जो अदृश्य हो सकता था। ‘परोक्ष’ दुश्मन के विमान को पंगु कर सकता था। ‘प्रलय’ एक प्रकार की विद्युत ऊर्जा का शस्त्र था जिससे विमान चालक भयंकर तबाही मचा सकता था। ‘जलद रूप’ एक ऐसा विमान था, जो देखने में बादल की भांति दिखता था।
    स्कंद पुराण के खंड 3 अध्याय 23 में उल्लेख मिलता है कि ऋषि कर्दम ने अपनी पत्नी के लिए एक विमान की रचना की थी जिसके द्वारा कहीं भी आया-जाया सकता था। रामायण में भी पुष्पक विमान का उल्लेख मिलता है जिसमें बैठकर रावण सीताजी को हर ले गया था।

    2.अस्त्र-शस्त्र :
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    धनुष-बाण, भाला या तलवार की बात नहीं कर रहे हैं। इसका आविष्कार तो भारत में हुआ ही है लेकिन हम आग्नेय अस्त्रों की बात कर रहे हैं। आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पाशुपतास्त्र, सर्पास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि अनेक ऐसे अस्त्र हैं जिसका आधुनिक रूप बंदूक, मशीनगन, तोप, मिसाइल, विषैली गैस तथा परमाणु अस्त्र हैं।
    वेद और पुराणों में निम्न अस्त्रों का वर्णन मिलता है:- इन्द्र अस्त्र, आग्नेय अस्त्र, वरुण अस्त्र, नाग अस्त्र, नाग पाशा, वायु अस्त्र, सूर्य अस्त्र, चतुर्दिश अस्त्र, वज्र अस्त्र, मोहिनी अस्त्र, त्वाश्तर अस्त्र, सम्मोहन/ प्रमोहना अस्त्र, पर्वता अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मसिर्षा अस्त्र, नारायणा अस्त्र, वैष्णव अस्त्र, पाशुपत अस्त्र आदि।
    महाभारत के युद्ध में कई प्रलयकारी अस्त्रों का प्रयोग हुआ है। उसमें से एक था ब्रह्मास्त्र। आधुनिक काल में परमाणु बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर ने गीता और महाभारत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने महाभारत में बताए गए ब्रह्मास्त्र की संहारक क्षमता पर शोध किया और अपने मिशन को नाम दिया ट्रिनिटी (त्रिदेव)। रॉबर्ट के नेतृत्व में 1939 से 1945 के बीच वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह कार्य किया। 16 जुलाई 1945 को इसका पहला परमाणु परीक्षण किया गया।
    यह भी पढ़े:क्या आप जानते है महाभारत युद्ध के इन 18 दिनों के रहस्यों को ? 
    परमाणु सिद्धांत और अस्त्र के जनक जॉन डाल्टन को माना जाता है, लेकिन उनसे भी 2,500 वर्ष पूर्व ऋषि कणाद ने वेदों में लिखे सूत्रों के आधार पर परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। भारतीय इतिहास में ऋषि कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना जाता है। आचार्य कणाद ने बताया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। कणाद प्रभास तीर्थ में रहते थे। विख्यात इतिहासज्ञ टीएन कोलेबु्रक ने लिखा है कि अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ यूरोपीय वैज्ञानिकों की तुलना में विश्वविख्यात थे।

    3.पहिए का आविष्कार :
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    आज से 5,000 और कुछ 100 वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें रथों के उपयोग का वर्णन है। जरा सोचिए पहिए नहीं होते तो क्या रथ चल पाता? इससे सिद्ध होता है कि पहिए 5,000 वर्ष पूर्व थे।
    पहिए का आविष्कार मानव विज्ञान के इतिहास में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। पहिए के आविष्कार के बाद ही साइकल और फिर कार तक का सफर पूरा हुआ। इससे मानव को गति मिली। गति से जीवन में परिवर्तन आया। हमारे पश्‍चिमी विद्वान पहिए के आविष्कार का श्रेय इराक को देते हैं, जहां रेतीले मैदान हैं, जबकि इराक के लोग 19वीं सदी तक रेगिस्तान में ऊंटों की सवारी करते रहे।
    हालांकि रामायण और महाभारतकाल से पहले ही पहिए का चमत्कारी आविष्कार भारत में हो चुका था और रथों में पहियों का प्रयोग किया जाता था। विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता सिन्धु घाटी के अवशेषों से प्राप्त (ईसा से 3000-1500 वर्ष पूर्व की बनी) खिलौना हाथीगाड़ी भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रमाणस्वरूप रखी है। सिर्फ यह हाथीगाड़ी ही प्रमाणित करती है कि विश्व में पहिए का निर्माण इराक में नहीं, बल्कि भारत में ही हुआ था।

    4.प्लास्टिक सर्जरी :
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    जी हां, प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कार से दुनिया में क्रांति आ गई। पश्चिम के लोगों के अनुसार प्लास्टिक सर्जरी आधुनिक विज्ञान की देन है। प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है- ‘शरीर के किसी हिस्से को ठीक करना।’ भारत में सुश्रुत को पहला शल्य चिकित्सक माना जाता है। आज से करीब 3,000 साल पहले सुश्रुत युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनके अंग-भंग हो जाते थे या नाक खराब हो जाती थी, तो उन्हें ठीक करने का काम वे करते थे।
     >> नागमण‌ि (Nagmani) : वृहत्ससंह‌िता में लिखी है इससे जुडी कई रोचक बातें 
    सुश्रुत ने 1,000 ईसापूर्व अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किए थे। हालांकि कुछ लोग सुश्रुत का काल 800 ईसापूर्व का मानते हैं। सुश्रुत से पहले धन्वंतरि हुए थे।

    5.बिजली का आविष्कार :
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    महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ॠषि थे। निश्चित ही बिजली का आविष्कार थॉमस एडिसन ने किया लेकिन एडिसन अपनी एक किताब में लिखते हैं कि एक रात मैं संस्कृत का एक वाक्य पढ़ते-पढ़ते सो गया। उस रात मुझे स्वप्न में संस्कृत के उस वचन का अर्थ और रहस्य समझ में आया जिससे मुझे मदद मिली।
    महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। ऋषि अगस्त्य ने ‘अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ की रचना की। आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं-
    संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
    ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
    छादयेच्छिखिग्रीवेन
    चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
    दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
    संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
    -अगस्त्य संहिता
    अर्थात : एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।
    अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।
     >> देखें भारत के 10 अदभुत Expressways, करें हवा से बातें 
    6.बटन :
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    आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शर्ट के बटन का आविष्कार भारत में हुआ। इसका सबसे पहला प्रमाण मोहन जोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हुआ। खुदाई में बटनें पाई गई हैं। सिन्धु नदी के पास आज से 2500 से 3000 पहले यह सभ्यता अपने अस्तित्व में थी।

    7.ज्यामिति :
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    बौधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ और शुल्व सूत्र तथा श्रौतसूत्र के रचयिता हैं। पाइथागोरस के सिद्धांत से पूर्व ही बौधायन ने ज्यामिति के सूत्र रचे थे लेकिन आज विश्व में यूनानी ज्या‍मितिशास्त्री पाइथागोरस और यूक्लिड के सिद्धांत ही पढ़ाए जाते हैं।
    दरअसल, 2800 वर्ष (800 ईसापूर्व) बौधायन ने रेखागणित, ज्यामिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज की थी। उस समय भारत में रेखागणित, ज्यामिति या त्रिकोणमिति को शुल्व शास्त्र कहा जाता था।
    शुल्व शास्त्र के आधार पर विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाई जाती थीं। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में परिवर्तन करना, इस प्रकार के अनेक कठिन प्रश्नों को बौधायन ने सुलझाया।
     >>जिससे डरता था रावण रावण के: जानिये  रहस्य
    8.रेडियो :
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    इतिहास की किताब में बताया जाता है कि रेडियो का आविष्कार जी. मार्कोनी ने किया था, लेकिन यह सरासर गलत है। अंग्रेज काल में मार्कोनी को भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु के लाल डायरी के नोट मिले जिसके आधार पर उन्होंने रेडियो का आविष्कार किया। मार्कोनी को 1909 में वायरलेस टेलीग्राफी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। लेकिन संचार के लिए रेडियो तरंगों का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन मिलीमीटर तरंगें और क्रेस्कोग्राफ सिद्धांत के खोजकर्ता जगदीश चंद्र बसु ने 1895 में किया था।
    इसके 2 साल बाद ही मार्कोनी ने प्रदर्शन किया और सारा श्रेय वे ले गए। चूंकि भारत उस समय एक गुलाम देश था इसलिए जगदीश चंद्र बसु को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। दूसरी ओर वे अपने आविष्कार का पेटेंट कराने में असफल रहे जिसके चलते मार्कोनी को रेडियो का आविष्कारक माना जाने लगा। संचार की दुनिया में रेडियो का आविष्कार सबसे बड़ी सफलता है। आज इसके आविष्कार के बाद ही टेलीविजन और मोबाइल क्रांति संभव हो पाई है।

    9.गुरुत्वाकर्षन का नियम :
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    हलांकि वेदों में गुरुत्वाकर्षन के नियम का स्पष्ट उल्लेख है लेकिन प्राचीन भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य ने इस पर एक ग्रंथ लिखा ‘सिद्धांतशिरोमणि’ इस ग्रंथ का अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और यह सिद्धांत यूरोप में प्रचारित हुआ।
    >>अभिशप्त कोहिनूर हीरा – जिस के पास भी गया वो हो गया बर्बाद 
    न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के नियम को जानकर विस्तार से लिखा था और उन्होंने अपने दूसरे ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ में इसका उल्लेख भी किया है।
    गुरुत्वाकर्षण के नियम के संबंध में उन्होंने लिखा है, ‘पृथ्वी अपने आकाश का पदार्थ स्वशक्ति से अपनी ओर खींच लेती है। इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है।’ इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी में गुत्वाकर्षण की शक्ति है।
    भास्कराचार्य द्वारा ग्रंथ ‘लीलावती’ में गणित और खगोल विज्ञान संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला गया है। सन् 1163 ई. में उन्होंने ‘करण कुतूहल’ नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में बताया गया है कि जब चन्द्रमा सूर्य को ढंक लेता है तो सूर्यग्रहण तथा जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा को ढंक लेती है तो चन्द्रग्रहण होता है। यह पहला लिखित प्रमाण था जबकि लोगों को गुरुत्वाकर्षण, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण की सटीक जानकारी थी।

    10.भाषा का व्याकरण :
    बोलना, पढ़ना और लिखना
    दुनिया का पहला व्याकरण पाणिनी ने लिखा। 500 ईसा पूर्व पाणिनी ने भाषा के शुद्ध प्रयोगों की सीमा का निर्धारण किया। उन्होंने भाषा को सबसे सुव्यवस्थित रूप दिया और संस्कृत भाषा का व्याकरणबद्ध किया। इनके व्याकरण का नाम है अष्टाध्यायी जिसमें 8 अध्याय और लगभग 4 सहस्र सूत्र हैं। व्याकरण के इस महनीय ग्रंथ में पाणिनी ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संग्रहीत किए हैं।
    अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। उस समय के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, खान-पान, रहन-सहन आदि के प्रसंग स्थान-स्थान पर अंकित हैं।
    इनका जन्म पंजाब के शालातुला में हुआ था, जो आधुनिक पेशावर (पाकिस्तान) के करीब तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। हालांकि पाणिनी के पूर्व भी विद्वानों ने संस्कृत भाषा को नियमों में बांधने का प्रयास किया लेकिन पाणिनी का शास्त्र सबसे प्रसिद्ध हुआ।
    19वीं सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी फ्रेंज बॉप (14 सितंबर 1791- 23 अक्टूबर 1867) ने पाणिनी के कार्यों पर शोध किया। उन्हें पाणिनी के लिखे हुए ग्रंथों तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के सूत्र मिले। आधुनिक भाषा विज्ञान को पाणिनी के लिखे ग्रंथ से बहुत मदद मिली। दुनिया की सभी भाषाओं के विकास में पाणिनी के ग्रंथ का योगदान है।
    >> मोहनजोदड़ो से जुड़े रोचक तथ्य | Mohenjo-daro Facts in Hindi   
    इस तरह ऐसे सैंकड़ों आविष्कार है जो भारत के लोगों ने किए लेकिन चूंकि पश्‍चिम ने विश्व पर राज किया इसलिए इतिहास उन्होंने ही लिखा और उन्होंने साजिश के तहत खुद के दार्शनिक और वैज्ञानिकों को महिमामंडित किया। 

    Tuesday, 16 August 2016

    हस्त रेखा ज्योतिष 15 बातें जो जीवन रेखा देखकर मालूम हो सकती हैं |

    By: Secret On: 09:41
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  • हस्त रेखा ज्योतिष 15 बातें जो जीवन रेखा देखकर मालूम हो सकती हैं | Hast Rekha Jyotish 15 baatein jo jeevan rekha dekh kar maloom ho sakti hai





    हस्त रेखा ज्योतिष- 15 बातें जो जीवन रेखा देखकर मालूम हो सकती हैं | Hast Rekha Jyotish 15 baatein jo jeevan rekha dekh kar maloom ho sakti hai
    हथेली में सामान्यत: तीन रेखाएं मुख्य रूप से दिखाई देती हैं। ये तीन रेखाएं जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा है। इनमें से जो रेखा अंगूठे के ठीक नीचे शुक्र पर्वत को घेरे रहती है, वही जीवन रेखा कहलाती है। यह रेखा इंडेक्स फिंगर के नीचे स्थित गुरु पर्वत के आसपास से प्रारंभ होकर हथेली के अंत मणिबंध की ओर जाती है। छोटी जीवन रेखा कम उम्र और लंबी जीवन रेखा लंबी उम्र की ओर इशारा करती है। यदि जीवन रेखा टूटी हुई हो तो यह अशुभ होती है, लेकिन उसके साथ ही कोई अन्य रेखा समानांतर रूप से चल रही हो तो इसका अशुभ प्रभाव नष्ट हो सकता है।
    1. हस्तरेखा ज्योतिष (astrology) में बताया गया है कि लंबी, गहरी, पतली और साफ जीवन रेखा शुभ होती है। जीवन रेखा पर क्रॉस का चिह्न (cross sign) अशुभ होता है। यदि जीवन रेखा शुभ है तो व्यक्ति की आयु लंबी होती है और उसका स्वास्थ्य (health) भी अच्छा रहता है।
    2. यदि मस्तिष्क रेखा (मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा लगभग एक ही स्थान से प्रारंभ होती है) और जीवन रेखा के मध्य थोड़ा अंतर हो तो व्यक्ति स्वतंत्र विचारों (open minded) वाला होता है।
    3. यदि मस्तिष्क रेखा (brain line) और जीवन रेखा के मध्य अधिक अंतर हो तो व्यक्ति बिना सोच-विचार के कार्य करने वाला होता है।
    4. यदि दोनों हाथों में जीवन रेखा टूटी हुई हो, तो व्यक्ति को असमय मृत्यु समान कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। यदि एक हाथ में जीवन रेखा टूटी हो और दूसरे हाथ में यह रेखा ठीक हो, तो यह किसी गंभीर बीमारी (serious diseases) की ओर इशारा करती है।
    5. यदि किसी व्यक्ति के हाथ में जीवन रेखा श्रृंखलाकार या अलग-अलग टुकड़ों से जुड़ी हुई या बनी हुई हो तो व्यक्ति निर्बल हो सकता है। ऐसे लोग स्वास्थ्य की दृष्टि से भी परेशानियों का सामना करते हैं। ऐसा विशेषत: तब होता है, जब हाथ बहुत कोमल हो। जब जीवन रेखा के दोष दूर हो जाते हैं तो व्यक्ति का जीवन सामान्य (normal life)  हो जाता है।
    6. यदि जीवन रेखा से कोई शाखा गुरु पर्वत क्षेत्र (इंडेक्स फिंगर के नीचे वाले भाग को गुरु पर्वत कहते हैं।) की ओर उठती दिखाई दे या गुरु पर्वत में जा मिले तो इसका अर्थ यह समझना चाहिए कि व्यक्ति को कोई बड़ा पद या व्यापार-व्यवसाय में तरक्की (growth in business) प्राप्त होती है।
    7. यदि जीवन रेखा से कोई शाखा शनि पर्वत क्षेत्र (मिडिल फिंगर के नीचे वाले भाग को शनि पर्वत कहते हैं।) की ओर उठकर भाग्य रेखा के साथ-साथ चलती दिखाई दे तो इसका अर्थ यह होता है कि व्यक्ति को धन-संपत्ति का लाभ (gain in money/assets) मिल सकता है। ऐसी रेखा के प्रभाव से व्यक्ति को सुख-सुविधाओं की वस्तुएं भी प्राप्त हो सकती हैं।
    8. यदि जीवन रेखा, हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा तीनों प्रारंभ में मिली हुई हो तो व्यक्ति भाग्यहीन, दुर्बल और परेशानियों से घिरा होता है। (हृदय रेखा इंडेक्स फिंगर और मिडिल फिंगर के आसपास से प्रारंभ होकर सबसे छोटी उंगली की ओर जाती है।)
    9. यदि जीवन रेखा को कई छोटी-छोटी रेखाएं काटती हुई नीचे की ओर जाती हो तो ये रेखाएं व्यक्ति के जीवन में परेशानियों को दर्शाती हैं। यदि इस तरह की रेखाएं ऊपर की ओर जा रही हों तो व्यक्ति को सफलता प्राप्त होती है।
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    10. यदि जीवन रेखा गुरु पर्वत से प्रारंभ हुई हो तो व्यक्ति अति महत्वाकांक्षी होता है। ये लोग अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
    11. जब टूटी हुई जीवन रेखा शुक्र पर्वत के भीतर की ओर मुड़ती दिखाई देती है तो यह अशुभ लक्षण होता है। ऐसी जीवन रेखा बताती है कि व्यक्ति को किसी बड़े संकट का सामना (going to face huge problems in life) करना पड़ सकता है।
    12. यदि जीवन रेखा अंत में दो भागों में विभाजित हो गई हो तो व्यक्ति की मृत्यु जन्म स्थान से दूर होती है।
    13. जीवन रेखा पर वर्ग का चिह्न हो तो यह व्यक्ति के जीवन की रक्षा करता है। आयु के संबंध में जीवन रेखा के साथ ही स्वास्थ्य रेखा, हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा और अन्य छोटी-छोटी रेखाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
    14. यदि दोनों हाथों में जीवन रेखा बहुत छोटी हो तो वह व्यक्ति अल्पायु हो सकता है। जीवन रेखा जहां-जहां श्रृंखलाकार होगी, उस आयु में व्यक्ति किसी बीमारी से ग्रसित हो सकता है।
    15. यदि किसी व्यक्ति के हाथ में जीवन रेखा चंद्र पर्वत तक चली जाए तो व्यक्ति का जीवन अस्थिर हो सकता है। अंगूठे के नीचे वाले भाग को शुक्र पर्वत कहते हैं और शुक्र के दूसरी ओर चंद्र पर्वत स्थित होता है। यदि इस प्रकार की जीवन रेखा कोमल हाथों में हो और मस्तिष्क रेखा भी ढलान लिए हुए हो, तो व्यक्ति का स्वभाव स्थिर होता है। इस प्रकार के लोग साहस भरे और उत्तेजना से पूर्ण कार्य करना चाहते हैं।
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    ध्यान रखें- हस्तरेखा में दोनों हाथों की बनावट और रेखाओं का पूरा अध्ययन (research) करना बहुत जरूरी है। यहां बताए गए फल हथेली की अन्य स्थितियों से बदल भी सकते हैं। इसी वजह से किसी व्यक्ति के बारे में सटीक भविष्यवाणी करना हो तो दोनों हथेलियों का अध्ययन करना चाहिए।
    रेखाओं और पर्वतों के हिन्दी नाम और इंग्लिश नाम
    जीवन रेखा- Life Line
    हृदय रेखा- Heart Line
    मस्तिष्क रेखा- Head Line
    सूर्य रेखा- Sun Line or Fame Line
    भाग्य रेखा- Fate Line
    शुक्र पर्वत- Venus Mount
    चंद्र पर्वत- Moon Mount
    गुरु पर्वत- Jupiter Mount
    मंगल पर्वत- Mars Mount
    शनि पर्वत- Saturn Mount
    सूर्य पर्वत- Sun Mount
    बुध पर्वत- Mercury Mount
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    Friday, 12 August 2016

    LIGO ने दूसरी बार गुरुत्वाकर्षण तरंग देखने मे सफ़लता पायी

    By: Secret On: 19:33
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  • LIGO ने दूसरी बार गुरुत्वाकर्षण तरंग देखने मे सफ़लता पायी

                

    LIGO_GravityWaves_वैज्ञानिको ने दूसरी बार गुरुत्वाकर्षण तरंगो को पकड़ने मे सफ़लता पायी है। गुरुत्वाकर्षण तरंगे काल-अंतराल(space-time) मे उत्पन्न हुयी लहरे है, ये लहरे दूर ब्रह्माण्ड मे किसी भीषण प्रलय़ंकारी घटना से उत्पन्न होती है। वैज्ञानिको ने पाया है कि ये तरंगे पृथ्वी से 1.4 अरब प्रकाशवर्ष दूर दो श्याम विवरो(black hole) के अर्धप्रकाशगति से टकराने से उत्पन्न हुयी है।
    वैज्ञानिको ने इन गुरुत्वाकर्षण तरंगो को युग्म लेजर इन्टरफ़ेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव आबजर्वेटोरी(LIGO) ने पकड़ी है जोकि लिंविंगस्टोन लुसियाना तथा हैफ़र्ड वाशिंगटन मे 3000 किमी की दूरी पर स्थित है। 26 दिसंबर 2015 3:38 UTC को दोनो जांच यंत्रो ने गुरुत्वाकर्षण तरंगो का एक सूक्ष्म संकेत पकड़ा।
    लिगो द्वारा पकड़े गये प्रथम संकेत की घोषणा 11 फ़रवरी 2016 को की गयी थी, यह आंकड़ो मे गुरुत्वाकर्षण तरंग का स्पष्ट संकेत था। लेकिन यह दूसरा संकेत पहले संकेत की तुलना मे महीन है, इस तरंग का शिर्ष कमजोर है जिससे यह आंकड़ो मे दब गया था। आंकड़ो मे गहन विश्लेषण से शोधकर्ताओं ने पाया कि यह एक गुरुत्वाकर्षण तरंग का ही संकेत था।
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    शोधकर्ताओं ने गणना की कि यह गुरुत्वाकर्षण तरंग दो श्याम विवरो के टकराने से उत्पन्न हुयी है जिनका द्रव्यमान सूर्य से क्रमश: 14.5 तथा 7.5 गुना है। लिगो द्वारा पकड़े गये गुरुत्वाकर्षण तरंग के संकेत इन श्याम विवरो के विलय से पहले के अंतिम क्षणो को दर्शाते है। जब इन संकेतो को लिगो द्वारा ग्रहण किया जा रहा था तब ये श्याम विवरो ने एक दूसरे की 55 बार परिक्रमा की और इस दौरान उनकी परिक्रमा गति प्रकाश गति के आधे तक पहुंच गयी थी, उसके पश्चात दोनो एक दूसरे से टकराकर एक दूसरे मे विलिन हो गये जिससे गुरुत्वाकर्षण तरंगो के रूप मे भारी मात्रा मे ऊर्जा मुक्त हुयी, इस मूक्त हुयी ऊर्जा की मात्रा सूर्य के द्रव्यमान के तुल्य है। यह प्रलयंकारी घटना 1.4 अरब प्रकाशवर्ष पहले हुयी जिसके परिणाम स्वरूप सूर्य के द्रव्यमान से 20.8 गुणा बड़ा श्याम विवर निर्मित हुआ। ध्यान दिजिये कि इस श्याम विवर का निर्माण करने वाले श्याम विवरो के संयुक्त द्रव्यमान की तुलना मे नवनिर्मित श्याम विवर का द्रव्यमान कम है, दोनो के द्रव्यमान का अंतर गुरुत्वाकर्षण तरंग ऊर्जा के रूप मे मुक्त हुआ है।
    गुरुत्वाकर्षण तरंग को दूसरी बार पकड़ा जाना आइंस्टाइन के साधारण सापेक्षतावाद सिद्धांत की पुष्टि तो कर ही रहा है, लिगो द्वारा अत्यंत सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण तरंगो की जांच की क्षमता को भी प्रमाणित कर रहा है।
    MIT के कावली इंस्टीट्युट आफ़ अस्ट्रोफिजिक्स एन्ड स्पेस रिसर्च(Kavli Institute for Astrophysics and Space Research) के शोध वैज्ञानिक तथा लिगो शोधकर्ता सल्वाटोर विटाले(Salvatore Vitale) कहते है
    ” हमने यह दोबारा किया है। पहली घटना इतनी अद्भूत थी कि हम विश्वास नही कर पा रहे थे। अब हमने गुरुत्वाकर्षण तरंगो को दोवारा देखा है जो यह दर्शाता है कि ब्रह्मांड मे श्याम विवर युग्म मे एक अच्छी संख्या मे है। हम जानते है कि निकट भविष्य मे हम ऐसी अनेक घटनाये देख पायेंगे और उससे हमे रोचक ज्ञान प्राप्ति होगी।”
    लिगो के शोधकर्ताओं ने इस खोज को “फिजिकल रिव्यु लेटर्स(Physical Review Letters)” मे प्रकाशित किया है।(यह भी पढ़े>>अदभुत - एक इंसान जो लाशों को बदल देता है डायमंड में:   )

    गुरुत्वाकर्षण तरंगो को पकड़ना

    LIGO_GravityWaves_2लिगो के दो इंटरफ़ेरोमिटर जो कि 4-4 किमी लंबे है; इस तरह निर्मित है कि जब भी उनसे कोई गुरुत्वाकर्षण तरंग गुजरती है तब वे काल-अंतरिक्ष(space-time) मे आये एक लघु विस्तार/संकुचन की जांच सफ़लतापुर्वक कर लेते है। 14 सितंबर 2015 को इन उपकरणो ने पहली बार गुरुत्वाकर्षण तरंगो के संकेत को ग्रहण किया था, उस समय इन दोनो उपकरणो की लंबाई मे प्रोटान के व्यास से भी कम खिंचाव आया था। इस घटना के चार महिने पश्चात 26 दिसंबर 2016 को लिगो ने दूसरी बार गुरुत्वाकर्षण तरंग के संकेत पकड़े जोकि प्रथम संकेत से भी सूक्ष्म थे।
    विटाले कहते है
    “जब हमने पहली बार संकेत पकड़े थे तब वे छोटे लेकिन इतने मजबूत थे कि हम उन्हे आंकड़ो मे स्पष्ट देख सकते थे। लेकिन इन दूसरी घटना के संकेत इतने स्पष्ट नही थे। इन संकेतो को आंकड़ो मे त्रुटि से अलग करना कठिन था।”
    इस संकेत को अलग करना और यह तय करना कि यह गुरुत्वाकर्षण तरंग का ही परिणाम है, उपकरण द्वारा पकड़ा गया कोई शोर या त्रुटि नही है कठीन था। इसके लिये वैज्ञानिको मे संकेत विश्लेषण की एक विशिष्ट तकनीक “मैच फ़िल्टरींग(match filtering”) अपनायी जोकि शोधकर्ताओं को ज्ञात तरंगो या शोर के पैटर्नो से गुरुत्वाकर्षण तरंगो के पैटर्न से अलग करने मे सहायक थी।
    यह भी पढ़े>> क्या प्रकाशगति से तेज संचार संभव है?
     

    इस मामले मे शोधकर्ताओं ने लाखों की संख्या मे ज्ञात तरंगो के आंकड़े जमा किये जोकि भिन्न भिन्न द्रव्यमान और स्पिन के श्याम विवरो से संबधित थे। उसके बाद वैज्ञानिको ने पकड़े गये संकेतो को इन जमा किये गये आंकड़ो से मिलान प्रारंभ किया कि उन्हे कोई जोड़ मिल जाये।
    एक अन्य विश्लेषण तकनीक “मानदंड आकलन (parameter estimation)” वैज्ञानिको ने पाया कि इस तरह के संकेत दो 14.2 तथा 7.5 सौर द्रव्यमान के श्याम विवरो के 1.4 अरब प्रकाश वर्ष दूर विलय से उत्पन्न हो सकते है। ये टकराने वाले श्याम विवर प्रथम संकेत के दौरान टकराने वाले श्याम विवरो से कम द्रव्यमान के है जिससे गुरुत्वाकर्षण तरंगे अपेक्षाकृत रूप से कमजोर है। लेकिन कम द्रव्यमान वाले श्याम विवरो की संख्या ब्रह्माण्ड मे खगोल शास्त्रीयों द्वारा निरीक्षित श्याम विवरो मे अधिक है।
    शोधकर्ताओं के समूह की वैज्ञानिक लिसा बार्सोट्टी कहती है कि
    यह एक अच्छा संकेत है, इसका अर्थ है कि हम भविष्य मे ऐसी अनेक घटनाये पारंपरिक खगोलशास्त्र के प्रयोग से भी देख पायेंगे क्योंकि ऐसे श्याम विवरो की बहुतायत है।

    भूतकाल की समययात्रा

    पहले चार महिनो मे ही लिगो जांचयंत्रो ने दो भिन्न प्रकार के युग्म श्याम विवरो के टकराने से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंगो के संकेत दो बार पकड़े है। वर्तमान मे लिगो प्रयोगशाला बंद है और इसके उपकरणो का अद्यतन किया जा रहा है जिससे इनकी संवेदनशीलता बढ़ जायेगी। आने वाले कुछ महिनो मे इसके पुनः प्रारंभ होने की संभावना है, वैज्ञानिक मानकर चल रहे है कि उन्हे निकट भविष्य मे कई बार गुरुत्वाकर्षण तरंग जांच करने मे सफ़लता मिलेगी।
    इस तरह की अनेक घटनाओ से वैज्ञानिक श्याम विवर के विलय से संबधित अनसुलझे प्रश्नो के उत्तर पाने की आशा रखते है। वैज्ञानिको के अनुसार यह दो तरह से संभव है। श्याम विवर महाकाय तारो के मृत्यु के समय होने वाले सुपरनोवा विस्फ़ोट के पश्चात बनते है। एक अवधारणा के अनुसार दो ऐसे तारे एक दूसरे की परिक्रमा करते रहे होंगे और सुपरनोवा विस्फोटो के पश्चात बने दोनो श्याम विवर भी एक दूसरे की परिक्रमा करते रहे होंगे, इस परिक्रमा मे दोनो एक दूसरे के निकट आते गये होंगे और अंतत: एक दूसरे मे विलिन हो गये होंगे। दूसरी अवधारणा के अनुसार ये दोनो स्वतंत्र श्याम विवर रहे होंगे जोकि श्याम विवरो की घनी जनसंख्या वाले क्षेत्र मे रहने से एक दूसरे के गुरुत्वाकर्षण मे बंध गये और अंतत: एक दूसरे मे विलिन हो गये।
    विटाले के अनुसार ये दोनो एक दूसरे से एकदम भिन्न तरह की संभावनायें है, हम भविष्य मे जानना चाहते है कि इन दोनो मे से कौनसी घटना अधिक घटती है। हमे ऐसी और घटनाओ का इंतजार है जिससे खगोलभौतिकी मे नयी रोचक खोजे होने की संभवानाये है।
    जब लिगो पुन: प्रारंभ होगा उसे एक तीसरे इंटरफ़ेरोमिटर वर्गो(Virgo) की सहायता भी मिलेगी जोकि पिसा इटली मे स्थित है और 3 किमी लंबा है।

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