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Wednesday, 30 August 2017

बर्बरीक की कथा

By: Secret On: 09:48
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  • बर्बरीक महाभारत के एक महान योद्धा थे। वे घटोत्कच और अहिलावती(nagkanya mata) के पुत्र थे। बर्बरीक को उनकी माँ ने यही सिखाया था कि हमेशा हारने वाले की तरफ से लड़ना और वे इसी सिद्धांत पर लड़ते भी रहे। बर्बरीक को कुछ ऐसी सिद्धियाँ प्राप्त थीं, जिनके बल से पलक झपते ही महाभारत के युद्ध में भाग लेनेवाले समस्त वीरों को मार सकते थे। जब वे युद्ध में सहायता देने आये, तब इनकी शक्ति का परिचय प्राप्त कर श्रीकृष्ण ने अपनी कूटनीति से इन्हें रणचंडी को बलि चढ़ा दिया। महाभारत युद्ध की समाप्ति तक युद्ध देखने की इनकी कामना श्रीकृष्ण के वरदान से पूर्ण हुई और इनका कटा सिर अंत तक युद्ध देखता और वीरगर्जन करता रहा।
    कुछ कहानियों के अनुसार बर्बरीक एक यक्ष थे, जिनका पुनर्जन्म एक इंसान के रूप में हुआ था। बर्बरीक गदाधारी भीमसेन का पोता और घटोत्कच के पुत्र थे।

    बर्बरीक की कथा

    बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध-कला अपनी माँ से सीखी। MATA DURGA की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किये और 'तीन बाणधारी' का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।
    महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, अतः यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुआ तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने लीले घोड़े, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।
    सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी भी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तरकस में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी कि इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेदकर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया।
    तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए वरना ये आपके पैर को चोट पहुँचा देगा। श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराया कि वह युद्ध में उस ओर से भाग लेगा जिस ओर की सेना निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर हो। श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
    ब्राह्मण वेश में श्रीकृष्ण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिए चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और श्रीकृष्ण के बारे में सुनकर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।
    उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिए एक वीरवर क्षत्रिए के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतएव उनका शीश दान में मांगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया, जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
    युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी बहस होने लगी कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्रीकृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान कार्य किया है। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली, दुर्गा श्रीकृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।

    Thursday, 29 September 2016

    महाभारत : परशुराम ने कर्ण को श्राप क्‍यों दिया?

    By: Secret On: 10:00
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  •  महाभारत : परशुराम ने कर्ण को श्राप क्‍यों दिया?

     महाभारत कथा : परशुराम ने कर्ण को श्राप क्‍यों दिया?

       MAHABHARAT

    कर्ण ने धारण की ब्राह्मणों की वेश भूषा

    महाभारत काल में, युद्ध कला में सिर्फ मल्ल-युद्ध ही नहीं होता था, बल्कि सभी तरह के शस्त्रों को चलाना भी सिखाया जाता था। इसमें ख़ास रूप से तीरंदाजी पर जोर दिया जाता था। कर्ण जानता था कि परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करेंगे। सीखने की चाहत में उसने एक नकली जनेऊ धारण किया और एक ब्राह्मण के रूप में परशुराम के पास चला गया।
    दोहरे श्राप के साथ, कर्ण आगे बढ़ा। उसे पता नहीं था कि उसे कहां जाना चाहिए। वह धुल के एक कण पर भी अपने बाणों से निशाना साध सकता था। पर इसका फायदा क्या था? वह क्षत्रिय नहीं था 
    परशुराम ने उसे अपना शिष्य बना लिया, और वो सब कुछ सिखा दिया जो वे जानते थे। कर्ण बहुत जल्दी सीख गया। किसी भी अन्य शिष्य में उस तरह का स्वाभाविक गुण और क्षमता नहीं थी। परशुराम उससे बहुत खुश हुए।
    उन दिनों, परशुराम काफी बूढ़े हो चुके थे। एक दिन जंगल में अभ्यास करते समय, परशुराम बहुत थक गए। उन्होंने कर्ण से कहा वे लेटना चाहते हैं। कर्ण बैठ गया ताकि परशुराम कर्ण की गोद में अपना सिर रख पाएं। फिर परशुराम सो गये। तभी एक खून चूसने वाला कीड़ा कर्ण की जांघ में घुस गया और उसका खून पीने लगा। उसे भयंकर कष्ट हो रहा था, और उसके जांघ से रक्त की धार बहने लगी। वह अपने गुरु की नींद को तोड़े बिना उस कीड़े को हटा नहीं सकता था। लेकिन अपने गुरु की नींद को तोड़ना नहीं चाहता था। धीरे-धीरे रक्त की धार परशुराम के शरीर तक पहुंची और इससे उनकी नींद खुल गई। परशुराम ने आंखें खोल कर देखा कि आस पास बहुत खून था।

    परशुराम को पता चली कर्ण की असलियत

    परशुराम बोले – ‘ये किसका खून है?’ कर्ण ने बताया – ‘यह मेरा खून है।’ फिर परशुराम ने कर्ण की जांघ पर खुला घाव देखा। खून पीने वाला कीड़ा कर्ण की मांसपेशी में गहरा प्रवेश कर चुका था। फिर भी वह बिना हिले डुले वहीँ बैठा था।
    परशुराम ने उस की ओर देखकर बोले – ‘तुम ब्राह्मण नहीं हो सकते। अगर तुम ब्राह्मण होते तो एक मच्छर के काटने पर भी तुम चिल्लाने लगते।
    परशुराम अत्यधिक क्रोध से भर गए। वे बोले – ‘ तुमको क्या लगता है, तुम एक झूठा जनेऊ पहनकर यहां आ सकते हो और मुझे धोखा देकर सारी विद्या सीख सकते हो? मैं तुम्हें श्राप देता हूं।’
    इतना दर्द सहकर भी स्थिर बैठे रहना, ऐसा तो कोई क्षत्रिय ही कर सकता है।’
    कर्ण बोला – ‘हां, मैं ब्राह्मण नहीं हूं। कृपया मुझ पर क्रोधित न हों।’
    परशुराम अत्यधिक क्रोध से भर गए। वे बोले – ‘ तुमको क्या लगता है, तुम एक झूठा जनेऊ पहनकर यहां आ सकते हो और मुझे धोखा देकर सारी विद्या सीख सकते हो? मैं तुम्हें श्राप देता हूं।’
    कर्ण बोला – ‘हां मैं एक ब्राह्मण नहीं हूं। पर मैं क्षत्रिय भी नहीं हूं। मैं सूतपुत्र हूं, मैंने बस आधा झूठ बोला था।’

    परशुराम ने दिया कर्ण को श्राप

    पशुराम ने उसकी बात नहीं सुनी। उस स्थिति को देखते ही वे सत्य जान गए – कि कर्ण एक क्षत्रिय है।
    वे बोले – ‘तुमने मुझे धोखा दिया है।
    परशुराम ने उस की ओर देखकर बोले – ‘तुम ब्राह्मण नहीं हो सकते। अगर तुम ब्राह्मण होते तो एक मच्छर के काटने पर भी तुम चिल्लाने लगते।
    जो कुछ मैंने सिखाया है तुम उसका आनंद ले सकते हो, पर जब तुम्हें इसकी सचमुच जरूरत होगी, तब तुम सभी मंत्र भूल जाओगे जिनकी तुम्हें जरूरत होगी, और वही तुम्हारा अंत होगा।’
    कर्ण उनके पैरों में गिरकर दया की भीख मांगने लगा। वह बोला – ‘कृपया ऐसा मत कीजिए। मैं आपको धोखा देने की नीयत से नहीं आया था। बस मैं सीखने के लिए बैचैन था, और कोई भी सिखाने के लिए तैयार नहीं था। सिर्फ आप ही अकेले ऐसे इंसान हैं, जो किसी ऐसे को सिखाने के लिए तैयार हों, जो कि क्षत्रिय न हो।’

    बस यश प्राप्ति ही थी कर्ण की चाहत

    परशुराम का गुस्सा ठंडा हो गया। वे बोले – ‘लेकिन फिर भी, तुमने झूठ बोला। तुम्हें अपनी स्थिति मुझे बतानी चाहिए थी। तुमको मुझसे बात करनी चाहिए थी। पर तुम्हें कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए था। मैं श्राप वापस नहीं ले सकता। पर मैं देख सकता हूं कि तुम्हारी महत्वाकांक्षा राजपाट पाने या शक्तिशाली होने की नहीं है। 
    उसे तीर के निशाने पर लगने की आवाज़ सुनाई दी। वह मांस से अपनी भूख को शांत करने की कल्पना करने लगा। पर झाड़ियों में जाने के बाद उसे पता चला कि वह तो एक गाय थी।
    तुम सिर्फ यश चाहते हो, और तुम्हें यश मिलेगा। लोग हमेशा तुम्हें एक यशस्वी योद्धा की तरह याद करेंगे। पर तुम्हारे पास कभी शक्ति या साम्राज्य नहीं होगा, और तुम कभी महानतम धनुर्धर के रूप में भी नहीं जाने जाओगे। पर तुम्हारा यश हमेशा बना रहेगा, जो कि तुम्हारी चाहत भी है।’
    इस श्राप को लेकर, कर्ण भटकता रहा। वह शिक्षा पाकर खुश था। खुद के सामर्थ्य को लेकर भी बहुत खुश था। पर वह इसे कहीं प्रदर्शित नहीं कर सकता था। क्योंकि सिर्फ क्षत्रिय ही युद्ध या प्रतियोगिता में भाग ले सकते थे। वह आंखें बंद करके किसी भी चीज़ पर निशाना लगा सकता था, पर अपने कौशल को प्रदर्शित नहीं कर सकता था। उसे बस यश की चाहत थी, और उसे यश प्राप्त नहीं हो रहा था।

    कर्ण पहुंचा ओडिशा के कोणार्क मंदिर के पास

    उदास होकर वो दक्षिण पूर्व की तरफ चला गया और समुद्र के किनारे जा कर बैठ गया। वर्तमान समय के उड़ीसा राज्य में कोणार्क के पास उस स्थान पर बैठ गया, जहां सूर्य देव की कृपा सबसे अच्छे से पाई जा सकती है। शायद कर्ण की याद में ही, कोणार्क का सूर्य मंदिर बनाया गया। वह तपस्या करने लगा और कई दिनों तक ध्यान में बैठा रहा।
    आर्य गोहत्या को सबसे बुरा कर्म मानते थे। डरते हुए, उसने गाय की ओर देखा, और गाय ने उसकी ओर – कोमल नेत्रों से देखा, और फिर हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं।
    खाने के लिए कुछ नहीं था, पर वह बैठ कर ध्यान करता रहा। जब उसे बहुत भूख लगी, तो उसने कुछ केकड़े पकड़कर खा लिए। इससे उसे पोषण तो मिला, पर उसकी भूख और बढ़ गई।
    कुछ हफ्ते साधना करने के बाद, उसकी भूख बहुत ज्यादा बढ़ गयी। इस स्थिति में उसने, झाड़ियों में एक जानवर देखा। उसे लगा कि वह एक हिरन होगा, उसने अपना तीर और धनुष निकाला और आंखें बंद करके तीर चला दिया। 
    उसे तीर के निशाने पर लगने की आवाज़ सुनाई दी। वह मांस से अपनी भूख को शांत करने की कल्पना करने लगा। पर झाड़ियों में जाने के बाद उसे पता चला कि वह तो एक गाय थी। वह भयभीत हो उठा। आर्य गोहत्या को सबसे बुरा कर्म मानते थे। डरते हुए, उसने गाय की ओर देखा, और गाय ने उसकी ओर – कोमल नेत्रों से देखा, और फिर हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं। वह व्याकुल हो उठा। उसे समझ नहीं आ रहा था, कि क्या करे। तभी, एक ब्राह्मण आया, और मृत गाय को देखकर विलाप करने लगा।

    कर्ण को मिला एक और श्राप

    ब्राह्मण बोला – ‘तुमने मेरी गाय को मार डाला। मैं तुम्हें श्राप दूंगा। तुम एक योद्धा लगते हो, इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि रण भूमि में जब तुम बहुत मुश्किल स्थिति में होगे, तब तुम्हारा रथ इतना गहरा धंस जाएगा कि तुम उसे बाहर नहीं निकाल पाओगे। और तुम तब मारे जाओगे जब तुम असहाय होगे, ठीक वैसे जैसे तुमने इस असहाय गाय को मार डाला।’
    कर्ण उसके पैरों में गिर कर बोला – ‘कृपया क्षमा करें, मैं बहुत भूखा था।
    उदास होकर वो दक्षिण पूर्व की तरफ चला गया और समुद्र के किनारे जा कर बैठ गया। वर्तमान समय के उड़ीसा राज्य में कोणार्क के पास उस स्थान पर बैठ गया, जहां सूर्य देव की कृपा सबसे अच्छे से पाई जा सकती है। 
    मुझे पता नहीं था कि वह एक गाय है। अगर आप चाहें तो मैं आपको सौ गाएं इसके बदले में दे सकता हूं।’
    ब्राह्मण बोला – ‘ये गाय मेरे लिए बस एक जानवर नहीं थी। ये मुझे सबसे अधिक प्रिय थी। मेरी मृत गाय के बदले दूसरी गाएं देने के इस प्रस्ताव के लिए मैं तुम्हें और भी ज्यादा श्राप देता हूं।’
    दोहरे श्राप के साथ, कर्ण आगे बढ़ा। उसे पता नहीं था कि उसे कहां जाना चाहिए। वह धुल के एक कण पर भी अपने बाणों से निशाना साध सकता था। पर इसका फायदा क्या था? वह क्षत्रिय नहीं था – कोई भी उसे प्रतियोगिता में शामिल होने नहीं देता, युद्ध में शामिल होने देने की तो बात ही नहीं थी। वह बिना किसी लक्ष्य के यहां से वहां भटकता रहा।

     

     

    Wednesday, 28 September 2016

    आखिर क्यों खाया था पांडवों ने अपने मृत पिता के शरीर का मांस?

    By: Secret On: 09:00
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  • आखिर क्यों खाया था पांडवों ने अपने मृत पिता के शरीर का मांस?


    Why Pandavas eat dead body (Flesh) of Pandu : आज हम आपको महाभारत से जुडी एक घटना बताते है जिसमे पांचो पांडवों ने अपने मृत पिता पाण्डु का मांस खाया था उन्होंने ऐसा क्यों किया यह जानने के लिए पहले हमे पांडवो के जनम के बारे में जानना पड़ेगा। पाण्डु के पांच पुत्र युधिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव थे।  इनमे से युधिष्ठर, भीम और अर्जुन की माता कुंती तथा नकुल और सहदेव की माता माद्री थी। पाण्डु इन पाँचों पुत्रों के पिता तो थे पर इनका जनम पाण्डु के वीर्य तथा सम्भोग से नहीं हुआ था क्योंकि पाण्डु को श्राप था की जैसे ही वो सम्भोग करेगा उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसलिए पाण्डु के आग्रह पर यह पुत्र कुंती और माद्री ने भगवान का आहवान करके प्राप्त किये थे।

    Why Pandavas eat dead body (Flesh) of Pandu in Hindi
    जब पाण्डु की मृत्यु हुई तो उसके मृत शरीर का मांस पाँचों भाइयों ने मिल बाट कर खाया था। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योकिं स्वयं पाण्डु की ऐसी इच्छा थी। चुकी उसके पुत्र उसके वीर्ये से पैदा नहीं हुए थे इसलिए पाण्डु का ज्ञान, कौशल उसके बच्चों में नहीं आ पाया था।  इसलिए उसने अपनी मृत्यु पूर्व ऐसा वरदान माँगा था की उसके बच्चे उसकी मृत्यु के पश्चात उसके शरीर का मांस मिल बाँट कर खाले ताकि उसका ज्ञान बच्चों में स्थानांतरित हो जाए।
    पांडवो द्वारा पिता का मांस खाने के सम्बन्ध में दो मान्यता प्रचलित है।  प्रथम मान्यता के अनुसार मांस तो पांचो भाइयों ने खाया था पर सबसे ज्यादा हिस्सा सहदेव ने खाया था।  जबकि एक अन्य मान्यता के अनुसार सिर्फ सहदेव ने पिता की इच्छा का पालन करते हुए उनके मस्तिष्क के तीन हिस्से खाये। पहले टुकड़े को खाते ही सहदेव को इतिहास का ज्ञान हुआ, दूसरे टुकड़े को खाने पे वर्तमान का और तीसरे टुकड़े को खाते ही भविष्य का। यहीं कारण था की सहदेव पांचो भाइयों में सबसे अधिक ज्ञानी था और इससे उसे भविष्य में होने वाली घटनाओ को देखने की शक्ति मिल गई थी।
    शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण के अलावा वो एक मात्र शख्स सहदेव ही था जिसे भविष्य में होने वाले महाभारत के युद्ध के बारे में सम्पूर्ण बाते पता थी। श्री कृष्ण को डर था की कहीं सहदेव यह सब बाते औरों को न बता दे इसलिए श्री कृष्ण ने सहदेव को श्राप  दिया था की की यदि उसने ऐसा किया तो  मृत्यु हो जायेगी।
    यह भी पढ़े:


    Tuesday, 27 September 2016

    क्या आप जानते है महाभारत युद्ध के इन 18 दिनों के रहस्यों को ?

    By: Secret On: 22:00
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  • क्या आप जानते है महाभारत युद्ध के इन 18 दिनों के रहस्यों को ?



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    Mahabharat :- 

    माना जाता ही की महाभारत ( mahabharat ) जैसे भीषण युद्ध में एक मात्र जीवित बचने वाला कौरव युतुत्सु था तथा 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गये थे. महाभारत( mahabharat )के एक पात्र शल्य , लव कुश के 50 वी पीढ़ी में हुए थे जो महाभारत ( mahabharat ) के युद्ध में कौरवों की पक्ष से लड़े थे.
    शोधानुसार यह ज्ञात किया गया है की जब महाभारत ( mahabharat ) का युद्ध हुआ था तब भगवान श्री कृष्ण की आयु 83 वर्ष थी, उन्होंने महाभारत ( mahabharat ) युद्ध के 36 वर्ष बाद अपनी देह त्यागी थी . इस से यह ज्ञात होता है भगवान श्री कृष्ण 119 वर्ष तक धरती में विद्यमान रहे. उन्होंने द्वापर युग के अंत एवं कलयुग के आरम्भ में दोनों के संधि के समय अपना मनुष्य शरीर त्यागा. ज्योतिषिय गणना के अनुसार कलियुग का आरंभ शक संवत से 3176 वर्ष पूर्व की चैत्र शुक्ल एकम (प्रतिपदा) को हुआ था. वर्तमान में 1936 शक संवत है. इस प्रकार कलियुग को आरंभ हुए 5112 वर्ष हो गए हैं.
    यह भी पढ़े:."अश्वत्थामा एक रहस्य " 


    इस प्रकार भारतीय मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण विद्यमानता या काल शक संवत पूर्व 3263 की भाद्रपद कृ. 8 बुधवार के शक संवत पूर्व 3144 तक है. भारत का सर्वाधिक प्राचीन युधिष्ठिर संवत जिसकी गणना कलियुग से 40 वर्ष पूर्व से की जाती है, उक्त मान्यता को पुष्ट करता है. कलियुग के आरंभ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत ( mahabharat )का युद्ध का आरंभ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था. आओ जानते हैं महाभारत ( mahabharat ) युद्ध के 18 दिनों के रोचक घटनाक्रम को.
    महाभारत ( mahabharat ) युद्ध से पूर्व पांडवों ने अपनी सेना का पड़ाव कुरुक्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर बसे समन्त्र तीर्थ के पास हिरण्यवती नदी के तट पर डाला. कौरवों ने कुरुक्षेत्र के दक्षिणी भाग में वहां से कुछ योजन की दुरी पर एक समतल मैदान में अपना पड़ाव डाला. पांडव और कौरवों दोनों के शिवरों में उत्तम व्यवस्था का इंतजाम किया गया था. उन के हजारो शिवरों में से अनेक शिविर में प्रचुर मात्रा में खाद्य समग्री भरी पड़ी थी, घोड़ो, हाथी एवं रथो की व्यवस्था थी. तथा कुछ शिविर अस्त्र शस्त्र, संख, तथा अन्य युद्ध में प्रयोग होने वाली वस्तुओं से भरी पड़ी थी. वध और शिल्पी भी इन शिविरों में वेतन पर रखे गए थे.
    कौरवों की ओर से ये यौद्धा लड़े थे : भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा, कलिंगराज, श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज, सुदक्षिण, बृहद्वल, दुर्योधन व उसके 99 भाई सहित अन्य हजारों यौद्धा.
    पांडवों की ओर थे ये जनपद : पांचाल, चेदि, काशी, करुष, मत्स्य, केकय, सृंजय, दक्षार्ण, सोमक, कुन्ति, आनप्त, दाशेरक, प्रभद्रक, अनूपक, किरात, पटच्चर, तित्तिर, चोल, पाण्ड्य, अग्निवेश्य, हुण्ड, दानभारि, शबर, उद्भस, वत्स, पौण्ड्र, पिशाच, पुण्ड्र, कुण्डीविष, मारुत, धेनुक, तगंण और परतगंण.
    पांडवों की ओर से लड़े थे ये यौद्धा : भीम, नकुल, सहदेव, अर्जुन, युधिष्टर, द्रौपदी के पांचों पुत्र, सात्यकि, उत्तमौजा, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, पाण्ड्यराज, घटोत्कच, शिखण्डी, युयुत्सु, कुन्तिभोज, उत्तमौजा, शैब्य और अनूपराज नील.
    तटस्थ जनपद : विदर्भ, शाल्व, चीन, लौहित्य, शोणित, नेपा, कोंकण, कर्नाटक, केरल, आन्ध्र, द्रविड़ आदि ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया.
    पितामह भीष्म की सलाह पर दोनों दलों ने एकत्र होकर युद्ध के कुछ नियम बनाए. उनके बनाए हुए नियम निम्नलिखित हैं
    1 .प्रतिदिन युद्ध सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही होगा , सूर्यास्त होते ही सब लोग अपने शिविरों की ओर लोट जायेंगे.
    2 . युद्ध समाप्त होने के पश्चात सभी लोग छल-कपट छोड़कर एक दूसरे के साथ भाइयो वाला व्यवहार करेंगे.
    3 .जो रथ पर होगा वह दूसरे रथी से ही युद्ध करेगा इसी तरह हाथी वाल हाथी वाले से और पैदल वाले पैदल वालो से.
    4 . एक वीर से केवल एक ही वीर युद्ध कर सकता है.
    5 . भय आदि से भागते हुए या शरण में आये शरणार्थियों पर कोई भी अस्त्र-शस्त्र नहीं चलाएगा.
    6 . जो भी व्यक्ति युद्ध में निहत्था हो जायेगा उस पर भी शस्त्र नहीं चलाया जायेगा.
    8 . युद्ध में जो व्यक्ति सेवक का कार्य करेगा उस पर कोई अस्त्र शस्त्र का प्रयोग नहीं करेगा.




    प्रथम दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के प्रथम दिन जब अर्जुन ने दूसरी तरफ खड़ी दुश्मन सेना में अपने ही सगे भाई बन्धुओ ,गुरु , पितामाह आदि को देखा तो उन्होंने कृष्ण से अपने ही सगे संबंधियों के विरुद्ध युद्ध नहीं करने की बात कही तब भगवान श्री कृष्ण उन्हें समझाते हुए गीता का उपदेश दिया. उसी समय भीष्म पितामह ने सभी योद्धाओं से कहा की कुछ ही देर में युद्ध आरम्भ होने वाला है अतः जो भी योद्धा अपना पक्ष बदलना चाहता है वह इसके लिए स्वतंत्र है. तभी कौरव की सेना में से युयुत्सु अपनी सेना लेते हुए पांडवो के पक्ष में हो लिया. ऐसा युधिस्ठर के क्रियाकलापों के कारण सम्भव हुआ. कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता उपदेश देने के पश्चात अर्जुन ने देवदत्त नामक संख बजाकर युद्ध का आरम्भ किया.
    महाभारत के  इस दिन युद्ध में 10 सैनिक मारे गए. भीम ने दुःशासन के साथ युद्ध करा वही अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने भीष्म के साथ युद्ध करते हुए उनके रथ का ध्वजदंड उखाड़ दिया. इस युद्ध में पांडवो को भारी नुक्सान उठाना पड़ा. पांडवो की ओर से लड़ रहे विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत क्रमश शल्य और भीष्म के हाथो मारे गए. भीष्म ने पांडवो की सेना को काफी नुकसान पहुंचाया.
    कौन मजबूत रहा :- पहले दी पांडवो की सेना को भारी नुक्सान पहुंचा तथा कौरवों के सेना उन पर भारी पड़ी.

    दूसरे दिन का युद्ध :

    कृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन तथा भीष्म, धृष्टद्युम्न तथा द्रोण के मध्य युद्ध हुआ. सात्यकि ने भीष्म के सारथी को घायल कर दिया.द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को कई बार हराया और उसके कई धनुष काट दिए, भीष्म द्वारा अर्जुन और श्रीकृष्ण को कई बार घायल किया गया. इस दिन भीम का कलिंगों और निषादों से युद्ध हुआ तथा भीम द्वारा सहस्रों कलिंग और निषाद मार गिराए गए, अर्जुन ने भी भीष्म को भीषण संहार मचाने से रोके रखा. कौरवों की ओर से लड़ने वाले कलिंगराज भानुमान, केतुमान, अन्य कलिंग वीर योद्धा मार गए.

    कौन मजबूत रहा : दूसरे दिन कौरवों को नुकसान उठाना पड़ा और पांडव पक्ष मजबूत रहा.

    तीसरे दिन का युद्ध :-

    कौरवों ने गरूड़ तथा पांडवों ने अर्धचंद्राकार जैसी सैन्य व्यूह रचना की. कौरवों की ओर से दुर्योधन तथा पांडवों की ओर से भीम व अर्जुन सुरक्षा कर रहे थे. इस दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया. यह देखकर भीष्म भीषण संहार मचा देते हैं. श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म वध करने को कहते हैं, परंतु अर्जुन उत्साह से युद्ध नहीं कर पाता जिससे श्रीकृष्ण स्वयं भीष्म को मारने के लिए उद्यत हो जाते हैं, परंतु अर्जुन उन्हें प्रतिज्ञारूपी आश्वासन देकर कौरव सेना का भीषण संहार करते हैं. वे एक दिन में ही समस्त प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव क्षत्रियगणों को मार गिराते हैं.भीम के बाण से दुर्योधन अचेत हो गया और तभी उसका सारथी रथ को भगा ले गया. भीम ने सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया. इस दिन भी कौरवों को ही अधिक क्षति उठाना पड़ती है. उनके प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव वीर योद्धा मारे जाते हैं.
    कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया.


    युद्ध का चौथा दिन :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन कौरवों की सेना को  युद्ध  भारी नुक्सान पहुंचा. इस दिन कौरवों ने अर्जुन को अपने बाणों से ढक दिया. परन्तु अर्जुन ने अपने सामर्थ्य से सभी को मार भगाया. भीम ने इस दिन कौरवों के सेना में खलबली मचा के रख दी थी. दुर्योधन ने अपनी गज सेना को भीम को मारने के लिए भेजा परन्तु भीम ने अपने पुत्र घटोत्कच की सहायता से सभी का नाश कर दिया. इस युद्ध में 14 कौरव भी मारे गए. परन्तु राजा भगदत्त द्वारा जल्द ही भीम पर नियंत्रण पा लिया गया. भीम और अर्जुन ने मिलकर भीष्म को कभी कड़ी चुनौती दी.
    कौन मजबूत रहा :- इस दिन कौरवों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा और पांडवो का पक्ष भारी रहा

    पांचवें दिन का युद्ध :-

    श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद युद्ध की शुरुआत हुई और फिर भयंकर मार-काट मची. दोनों ही पक्षों के सैनिकों का भारी संख्या में वध हुआ. इस दिन भीष्म ने पांडव सेना को अपने बाणों से ढंक दिया. उन पर रोक लगाने के लिए क्रमशः अर्जुन और भीम ने उनसे भयंकर युद्ध किया. सात्यकि ने द्रोणाचार्य को भीषण संहार करने से रोके रखा. भीष्म द्वारा सात्यकि को युद्ध क्षेत्र से भगा दिया गया. सात्यकि के 10 पुत्र मारे गए.

    कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया.

    छठे दिन का युद्ध :-

    कौरवों ने क्रोंचव्यूह तथा पांडवों ने मकरव्यूह के आकार की सेना कुरुक्षे‍त्र में उतारी. भयंकर युद्ध के बाद द्रोण का सारथी मारा गया. युद्ध में बार-बार अपनी हार से दुर्योधन क्रोधित होता रहा, परंतु भीष्म उसे ढांढस बंधाते रहे. अंत में भीष्म द्वारा पांचाल सेना का भयंकर संहार किया गया.
    कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया.

    सातवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत   ( mahabharat ) के  सातवें दिन कौरवों ने मण्डलाकर व्यूह की रचना करी और पांडवो ने व्रज व्यूह की रचना बनाई मंडलाकार में एक हाथी के पास सात रथ, एक रथ की रक्षार्थ सात अश्‍वारोही, एक अश्‍वारोही की रक्षार्थ सात धनुर्धर तथा एक धनुर्धर की रक्षार्थ दस सैनिक लगाए गए थे. सेना के मध्य दुर्योधन था. वज्राकार में दसों मोर्चों पर घमासान युद्ध हुआ.




    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन अर्जुन अपनी युक्ति से कौरव सेना में भगदड़ मचा देता है. धृष्टद्युम्न दुर्योधन को युद्ध में हरा देता है. अर्जुन पुत्र इरावान द्वारा विन्द और अनुविन्द को हरा दिया जाता है, भगदत्त घटोत्कच को और नकुल सहदेव मिलकर शल्य को युद्ध क्षेत्र से भगा देते हैं. यह देखकर एकभार भीष्म फिर से पांडव सेना का भयंकर संहार करते हैं.विराट पुत्र शंख के मारे जाने से इस दिन कौरव पक्ष की क्षति होती है.
    कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया.

    आठवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के  इस दिन कौरवों ने कछुआ व्यूह तो पांडवो ने तीन शिखरों वाल व्यूह रचा. पांडवो द्वारा इस दिन धृष्ट्राज के आठो पुत्रों का वध हो जाता है वही अर्जुन की दूसरी पत्नी उल्पी के पुत्र इरावन का बकासुर के पुत्र दवारा वध कर दिया जाता है. घटोत्कच द्वारा दुर्योधन पर शक्ति का प्रयोग परंतु बंगनरेश ने दुर्योधन को हटाकर शक्ति का प्रहार स्वयं के ऊपर ले लिया तथा बंगनरेश की मृत्यु हो जाती है. इस घटना से दुर्योधन के मन में मायावी घटोत्कच के प्रति भय व्याप्त हो जाता है.
    तब भीष्म की आज्ञा से भगदत्त घटोत्कच को हराकर भीम, युधिष्ठिर व अन्य पांडव सैनिकों को पीछे ढकेल देता है. दिन के अंत तक भीमसेन धृतराष्ट्र के नौ और पुत्रों का वध कर देता है.
    पांडव पक्ष की क्षति : अर्जुन पुत्र इरावान का अम्बलुष द्वारा वध.
    कौरव पक्ष की क्षति : धृतराष्ट्र के 17 पुत्रों का भीम द्वारा वध.
    कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट किया और दोनों की पक्ष को नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि कौरवों को ज्यादा क्षति पहुंची.

    नौवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन के युद्ध में कृष्ण के उपदेश के चलते भयंकर युद्ध हुआ जिसमे भीष्म ने अपनी ताकत दिखाते हुए अर्जुन के रथ को जर्जर कर दिया और अर्जुन को घायल. भीष्म के इस भयंकर संहार और अपने रथ को जर्जर अवस्था में देख कृष्ण से रहा नहीं जाता और वे अपने रथ का पहिया लेकर भीष्म की ओर बढ़ते है परन्तु बाद में उन्हें जब अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान आता है तो वे शांत हो जाते है. परन्तु इस दिन भीष्म ने पांडवो की सेना को बहुत नुक्सान पहुंचाते है.
    कौन मजबूत रहा :- इस दिन कौरवों का पक्ष मजबूत रहता है.

    दसवां दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  भीष्म द्वारा बड़े पैमाने पर पांडवों की सेना को मार देने से घबराए पांडव पक्ष में भय फैल जाता है, तब श्रीकृष्ण के कहने पर पांडव भीष्म के सामने हाथ जोड़कर उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं. भीष्म कुछ देर सोचने पर उपाय बता देते हैं.इसके बाद भीष्म पांचाल तथा मत्स्य सेना का भयंकर संहार कर देते हैं. फिर पांडव पक्ष युद्ध क्षे‍त्र में भीष्म के सामने शिखंडी को युद्ध करने के लिए लगा देते हैं. युद्ध क्षेत्र में शिखंडी को सामने डटा देखकर भीष्म ने अपने अस्त्र त्याग दिए. इस दौरान बड़े ही बेमन से अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म को छेद दिया. भीष्म बाणों की शरशय्या पर लेट गए. भीष्म ने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही शरीर छोड़ेंगे, क्योंकि उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त है.यह भी पढ़े:भीष्म पितामह के 16 रहस्य,


    पांडव पक्ष की क्षति : शतानीक
    कौरव पक्ष की क्षति : भीष्म
    कौन मजबूत रहा : पांडव

    ग्याहरवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  भीष्म के शरशय्या में लेटें पर गुरु द्रोण को कौरवों द्वारा सेनापति नियुक्त किया जाता है ग्यारहवें दिन सुशर्मा तथा अर्जुन, शल्य तथा भीम, सात्यकि तथा कर्ण और सहदेव तथा शकुनि के मध्य युद्ध हुआ. कर्ण भी इस दिन पांडव सेना का भारी संहार करता है. दुर्योधन और शकुनि गुरु द्रोण से कहते है की यदि युधिस्ठर को युद्ध में हराकर बंदी बना लिया जाए तो युद्ध अपने आप समाप्त हो जाएगा उन दोनों के कहने पर गुरु द्रोण युधिस्ठर के साथ युद्ध कर उन्हें हरा देते है परन्तु जब वे उन्हें बंदी बना कर ले जाते है तभी अर्जुन वहां आकर अपनी बनो के वर्षा द्वारा उन्हें रोक देते है. नकुल भी युधिस्ठर के साथ तथा अर्जुन के साथ हो जाने से कौरव उन्हें बंधी नहीं बना पाते.
    पांडव पक्ष की क्षति : विराट का वध
    कौन मजबूत रहा : कौरव

    बारहवें दिन का युद्ध :-

    कल के युद्ध में अर्जुन के कारण युधिष्ठिर को बंदी न बना पाने के कारण शकुनि व दुर्योधन अर्जुन को युधिष्ठिर से काफी दूर भेजने के लिए त्रिगर्त देश के राजा को उससे युद्ध कर उसे वहीं युद्ध में व्यस्त बनाए रखने को कहते हैं, वे ऐसा करते भी हैं, परंतु एक बार फिर अर्जुन समय पर पहुंच जाता है और द्रोण असफल हो जाते हैं.होता यह है कि जब त्रिगर्त, अर्जुन को दूर ले जाते हैं तब सात्यकि, युधिष्ठिर के रक्षक थे. वापस लौटने पर अर्जुन ने प्राग्ज्योतिषपुर (पूर्वोत्तर का कोई राज्य) के राजा भगदत्त को अर्धचंद्र को बाण से मार डाला. सात्यकि ने द्रोण के रथ का पहिया काटा और उसके घोड़े मार डाले. द्रोण ने अर्धचंद्र बाण द्वारा सात्यकि का सिर काट ‍लिया.
    सात्यकि ने कौरवों के अनेक उच्च कोटि के योद्धाओं को मार डाला जिनमें से प्रमुख जलसंधि, त्रिगर्तों की गजसेना, सुदर्शन, म्लेच्छों की सेना, भूरिश्रवा, कर्णपुत्र प्रसन थे. युद्ध भूमि में सात्यकि को भूरिश्रवा से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी. हर बार सात्यकि को कृष्ण और अर्जुन ने बचाया.

    पांडव पक्ष की क्षति : द्रुपद
    कौरव पक्ष की क्षति : त्रिगर्त नरेश

    तेरहवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  कौरवों ने चक्रव्यूह की रचना की. इस दिन दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन को व्यस्त बनाए रखने को कहते हैं. भगदत्त युद्ध में एक बार फिर से पांडव वीरों को भगाकर भीम को एक बार फिर हरा देते हैं फिर अर्जुन के साथ भयंकर युद्ध करते हैं. श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर ले उससे अर्जुन की रक्षा करते हैं.अंततः अर्जुन भगदत्त की आंखों की पट्टी को तोड़ देता है जिससे उसे दिखना बंद हो जाता है और अर्जुन इस अवस्था में ही छल से उनका वध कर देता है. इसी दिन द्रोण युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह रचते हैं जिसे केवल अभिमन्यु तोड़ना जानता था, परंतु निकलना नहीं जानता था. अतः अर्जुन युधिष्ठिर, भीम आदि को उसके साथ भेजता है, परंतु चक्रव्यूह के द्वार पर वे सबके सब जयद्रथ द्वारा शिव के वरदान के कारण रोक दिए जाते हैं और केवल अभिमन्यु ही प्रवेश कर पाता है.




    ये लोग करते हैं अभिमन्यु का वध : कर्ण के कहने पर सातों महारथियों कर्ण, जयद्रथ, द्रोण, अश्वत्थामा, दुर्योधन, लक्ष्मण तथा शकुनि ने एकसाथ अभिमन्यु पर आक्रमण किया. लक्ष्मण ने जो गदा अभिमन्यु के सिर पर मारी वही गदा अभिमन्यु ने लक्ष्मण को फेंककर मारी. इससे दोनों की उसी समय मृत्यु हो गई.अभिमन्यु के मारे जाने का समाचार सुनकर जयद्रथ को कल सूर्यास्त से पूर्व मारने की अर्जुन ने प्रतिज्ञा की अन्यथा अग्नि समाधि ले लेने का वचन दिया.
    पांडव पक्ष की क्षति : अभिमन्यु
    कौन मजबूत रहा : पांडव

    चौदहवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  अर्जुन की अग्नि समाधि वाली बात सुनकर कौरव पक्ष में हर्ष व्याप्त हो जाता है और फिर वे यह योजना बनाते हैं कि आज युद्ध में जयद्रथ को बचाने के लिए सब कौरव योद्धा अपनी जान की बाजी लगा देंगे. द्रोण जयद्रथ को बचाने का पूर्ण आश्वासन देते हैं और उसे सेना के पिछले भाग में छिपा देते हैं.युद्ध शुरू होता है भूरिश्रवा, सात्यकि को मारना चाहता था तभी अर्जुन ने भूरिश्रवा के हाथ काट दिए, वह धरती पर गिर पड़ा तभी सात्यकि ने उसका सिर काट दिया. द्रोण द्रुपद और विराट को मार देते हैं.

    तब कृष्ण अपनी माया से सूर्यास्त कर देते हैं. सूर्यास्त होते देख अर्जुन अग्नि समाधि की तैयारी करने लगे जाते हैं. छिपा हुआ जयद्रथ जिज्ञासावश अर्जुन को अग्नि समाधि लेते देखने के लिए बाहर आकर हंसने लगता है, उसी समय श्रीकृष्ण की कृपा से सूर्य पुन: निकल आता है और तुरंत ही अर्जुन सबको रौंदते हुए कृष्ण द्वारा किए गए क्षद्म सूर्यास्त के कारण बाहर आए जयद्रथ को मारकर उसका मस्तक उसके पिता के गोद में गिरा देते हैं.
    पांडव पक्ष की क्षति : द्रुपद, विराट
    कौरव पक्ष की क्षति : जयद्रथ, भगदत्त

    पन्द्रहवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  द्रोण के संहारक शक्ति के बढ़ते जाने से पांडव सेना में हाहाकार मच गया. पिता पुत्र ने मिलकर महाभारत युद्ध में पांडवो की हार सुनिश्चित कर दी. गुरु द्रोण के इस तरह पांडवो की सेना को अति शीघ्र नष्ट करते देख अर्जुन ने श्री कृष्ण से उपाय माँगा. तब श्री कृष्ण ने उपाय सुझाते हुए अर्जुन से कहा की गुरु द्रोण को यह सुचना दो की आश्व्थामा मारा गया. गुरु द्रोण यह सुनते ही स्वयं अस्त्र शस्त्र झोड़ देंगे. इसके बाद भीम ने आश्व्थामा नामक हाथी को मार दिया. तथा यह सुचना गुरु द्रोण के कानो तक पहुंचाई . जब यह बात गुरु द्रोण को पता चली तो वे सर्वप्रथम युधिस्ठर के पास गए और उनसे सच जानना चाहा. युधिस्ठर ने कहा हां आश्व्थामा मारा गया है परन्तु ……. युधिस्ठर की पूरी बात कहने से पूर्व ही श्री कृष्ण ने संख इतनी जोर से बजाय की गुरु द्रोण सिर्फ यह सुन पाया की आश्व्थामा मारा गया. गुरु द्रोण के हथियार जमीन पर गेरते ही श्री कृष्ण ने उन पर अर्जुन से बाण चलने को कहा तथा कुछ पलो में है अर्जुन ने गुरु द्रोण को अपने बाणों से भेद डाला और इस तरह गुरु द्रोण का वध हो गया.



    कौरव पक्ष की क्षति : द्रोण

    कौन मजबूत रहा : पांडव

    सोलहवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  द्रोण के छल से वध किए जाने के बाद कौरवों की ओर से कर्ण को सेनापति बनाया जाता है. कर्ण पांडव सेना का भयंकर संहार करता है और वह नकुल व सहदेव को युद्ध में हरा देता है, परंतु कुंती को दिए वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लेता. फिर अर्जुन के साथ भी भयंकर संग्राम करता है.
    दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने अमोघ शक्ति द्वारा घटोत्कच का वध कर दिया. यह अमोघ शक्ति कर्ण ने अर्जुन के लिए बचाकर रखी थी लेकिन घटोत्कच से घबराए दुर्योधन ने कर्ण से इस शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए कहा. यह ऐसी शक्ति थी जिसका वार कभी खाली नहीं जा सकता था. कर्ण ने इसे अर्जुन का वध करने के लिए बचाकर रखी थी.
    इस बीच भीम का युद्ध दुःशासन के साथ होता है और वह दु:शासन का वध कर उसकी छाती का रक्त पीता है और अंत में सूर्यास्त हो जाता है.

    कौरव पक्ष की क्षति : दुःशासन
    कौन मजबूत रहा : दोनो

    सत्रहवें दिन का युद्ध :-

    महाभारत ( mahabharat ) के इस दिन  शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया. इस दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को हराकर कुंती को दिए वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लेता. बाद में वह अर्जुन से युद्ध करने लग जाता है. कर्ण तथा अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है. कर्ण के रथ का पहिया धंसने पर श्रीकृष्ण के इशारे पर अर्जुन द्वारा असहाय अवस्था में कर्ण का वध कर दिया जाता है.
    इसके बाद कौरव अपना उत्साह हार बैठते हैं. उनका मनोबल टूट जाता है. फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए गए, परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत में मार देते हैं.
    कौरव पक्ष की क्षति : कर्ण, शल्य और दुर्योधन के 22 भाई मारे जाते हैं.
    कौन मजबूत रहा : पांडव

    अठारहवें दिन का युद्ध :-

    अठारहवें दिन कौरवों के तीन योद्धा शेष बचे- अश्‍वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा. इसी दिन अश्वथामा द्वारा पांडवों के वध की प्रतिज्ञा ली गई. सेनापति अश्‍वत्थामा तथा कृपाचार्य के कृतवर्मा द्वारा रात्रि में पांडव शिविर पर हमला किया गया. अश्‍वत्थामा ने सभी पांचालों, द्रौपदी के पांचों पुत्रों, धृष्टद्युम्न तथा शिखंडी आदि का वध किया.
    पिता को छलपूर्वक मारे जाने का जानकर अश्वत्थामा दुखी होकर क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया जिससे युद्ध भूमि श्मशान भूमि में बदल गई. यह देख कृष्ण ने उन्हें कलियुग के अंत तक कोढ़ी के रूप में जीवित रहने का शाप दे डाला.
    इस दिन भीम दुर्योधन के बचे हुए भाइयों को मार देता है, सहदेव शकुनि को मार देता है और अपनी पराजय हुई जान दुर्योधन भागकर सरोवर के स्तंभ में जा छुपता है. इसी दौरान बलराम तीर्थयात्रा से वापस आ गए और दुर्योधन को निर्भय रहने का आशीर्वाद दिया.



    छिपे हुए दुर्योधन को पांडवों द्वारा ललकारे जाने पर वह भीम से गदा युद्ध करता है और छल से जंघा पर प्रहार किए जाने से उसकी मृत्यु हो जाती है. इस तरह पांडव विजयी होते हैं.
    पांडव पक्ष की क्षति : द्रौपदी के पांच पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखंडी
    कौरव पक्ष की क्षति : दुर्योधन
    कुछ यादव युद्ध में और बाद में गांधारी के शाप के चलते आपसी युद्ध में मारे गए. पांडव पक्ष के विराट और विराट के पुत्र उत्तर, शंख और श्वेत, सात्यकि के दस पुत्र, अर्जुन पुत्र इरावान, द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखंडी, कौरव पक्ष के कलिंगराज भानुमान, केतुमान, अन्य कलिंग वीर, प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव वीर.
    कौरवों की ओर से धृतराष्ट्र के दुर्योधन सहित सभी पुत्र, भीष्म, त्रिगर्त नरेश, जयद्रथ, भगदत्त, द्रौण, दुःशासन, कर्ण, शल्य आदि सभी युद्ध में मारे गए थे.

    युधिष्ठिर ने महाभारत ( mahabharat ) युद्ध की समाप्ति पर बचे हुए मृत सैनिकों का (चाहे वे शत्रु वर्ग के हों अथवा मित्र वर्ग के) दाह-संस्कार एवं तर्पण किया था. इस युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राज्य, धन, वैभव से वैराग्य हो गया.
    कहते हैं कि महाभारत ( mahabharat ) युद्ध के बाद अर्जुन अपने भाइयों के साथ हिमालय चले गए और वहीं उनका देहांत हुआ.

    बच गए योद्धा : महाभारत ( mahabharat ) के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे जिनके नाम हैं- कौरव के : कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा, जबकि पांडवों की ओर से युयुत्सु, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, कृष्ण, सात्यकि आदि.

    उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ?

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  • उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ?

    Hindi Mahabaharta Story- Why Urvashi cursed Arjuna?  यह प्रसंग पांडवों के वनवास के समय का है। अपने वनवास के समय एक बार पांडव वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचे और उन्हें अपना दुःख बताया।  युधिष्ठर ने वेदव्यास जी से प्रार्थना करी की वो उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त करने का कोई उपाय बताए। तब वेदव्यास जी ने कहा की पुनः अपना राज्य प्राप्त करने के लिए तुम्हे दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता पड़ेगी क्योंकि कौरवो के पास भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महारथी है। अतः बिना दिव्य अस्त्र प्राप्त किये तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। युधिष्ठर के यह पूँछने पर की वो देवताओं से यह दिव्य अस्त्र कैसे प्राप्त करे, वेदव्यास जी ने कहा की आप सब में केवल अर्जुन ही देवताओं को प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त कर सकते है। अतः अर्जुन को देवताओं को तपस्या करके प्रसन्न करना चाहिए।

    Urvashi Cursed Arjun
    अर्जुन गए तपस्या करने
    वेदव्यास जी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन तपस्या करने के लिए आगे अकेले ही रवाना हो गए। अर्जुन उत्तराखंड के पर्वतों को पार करते हुये एक अपूर्व सुन्दर वन में जा पहुँचे। वहाँ के शान्त वातावरण में वे भगवान की शंकर की तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या की परीक्षा लेने के लिये भगवान शंकर एक भील का वेष धारण कर उस वन में आये। वहाँ पर आने पर भील रूपी शिव जी ने देखा कि एक दैत्य शूकर का रूप धारण कर तपस्यारत अर्जुन की घात में है। शिव जी ने उस दैत्य पर अपना बाण छोड़ दिया। जिस समय शंकर भगवान ने दैत्य को देखकर बाण छोड़ा उसी समय अर्जुन की तपस्या टूटी और दैत्य पर उनकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने भी अपना गाण्डीव धनुष उठा कर उस पर बाण छोड़ दिया। शूकर को दोनों बाण एक साथ लगे और उसके प्राण निकल गये।
    शूकर के मर जाने पर भीलरूपी शिव जी और अर्जुन दोनों ही शूकर को अपने बाण से मरा होने का दावा करने लगे। दोनों के मध्य विवाद बढ़ता गया और विवाद ने युद्ध का रूप धारण कर लिया। अर्जुन निरन्तर भील पर गाण्डीव से बाणों की वर्षा करते रहे किन्तु उनके बाण भील के शरीर से टकरा-टकरा कर टूटते रहे और भील शान्त खड़े हुये मुस्कुराता रहा। अन्त में उनकी तरकश के सारे बाण समाप्त हो गये। इस पर अर्जुन ने भील पर अपनी तलवार से आक्रमण कर दिया। अर्जुन की तलवार भी भील के शरीर से टकरा कर दो टुकड़े हो गई। अब अर्जुन क्रोधित होकर भील से मल्ल युद्ध करने लगे। मल्ल युद्ध में भी अर्जुन भील के प्रहार से मूर्छित हो गये।

    देवताओं ने दिए अर्जुन को दिव्यास्त्र
    थोड़ी देर पश्चात् जब अर्जुन की मूर्छा टूटी तो उन्होंने देखा कि भील अब भी वहीं खड़े मुस्कुरा रहा है। भील की शक्ति देख कर अर्जुन को अत्यन्त आश्चर्य हुआ और उन्होंने भील को मारने की शक्ति प्राप्त करने के लिये शिव मूर्ति पर पुष्पमाला डाली, किन्तु अर्जुन ने देखा कि वह माला शिव मूर्ति पर पड़ने के स्थान पर भील के कण्ठ में चली गई। इससे अर्जुन समझ गये कि भगवान शंकर ही भील का रूप धारण करके वहाँ उपस्थित हुये हैं। अर्जुन शंकर जी के चरणों में गिर पड़े। भगवान शंकर ने अपना असली रूप धारण कर लिया और अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन! मैं तुम्हारी तपस्या और पराक्रम से अति प्रसन्न हूँ और तुम्हें पशुपत्यास्त्र प्रदान करता हूँ।” भगवान शंकर अर्जुन को पशुपत्यास्त्र प्रदान कर अन्तर्ध्यान हो गये। उसके पश्चात् वहाँ पर वरुण, यम, कुबेर, गन्धर्व और इन्द्र अपने-अपने वाहनों पर सवार हो कर आ गये। अर्जुन ने सभी देवताओं की विधिवत पूजा की। यह देख कर यमराज ने कहा, “अर्जुन! तुम नर के अवतार हो तथा श्री कृष्ण नारायण के अवतार हैं। तुम दोनों मिल कर अब पृथ्वी का भार हल्का करो।” इस प्रकार सभी देवताओं ने अर्जुन को आशीर्वाद और विभिन्न प्रकार के दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्रदान कर अपने-अपने लोकों को चले गये।
    Hindi Mahabaharta Story- Why Urvashi cursed Arjuna?
    अर्जुन पहुंचे स्वर्ग
    अर्जुन के पास से अपने लोक को वापस जाते समय देवराज इन्द्र ने कहा, “हे अर्जुन! अभी तुम्हें देवताओं के अनेक कार्य सम्पन्न करने हैं, अतः तुमको लेने के लिये मेरा सारथि आयेगा।” इसलिये अर्जुन उसी वन में रह कर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ काल पश्चात् उन्हें लेने के लिये इन्द्र के सारथि मातलि वहाँ पहुँचे और अर्जुन को विमान में बिठाकर देवराज की नगरी अमरावती ले गये। इन्द्र के पास पहुँच कर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया। देवराज इन्द्र ने अर्जुन को आशीर्वाद देकर अपने निकट आसन प्रदान किया।
    अमरावती में रहकर अर्जुन ने देवताओं से प्राप्त हुये दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों की प्रयोग विधि सीखा और उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करके उन पर महारत प्राप्त कर लिया। फिर एक दिन इन्द्र अर्जुन से बोले, “वत्स! तुम चित्रसेन नामक गन्धर्व से संगीत और नृत्य की कला सीख लो।” चित्रसेन ने इन्द्र का आदेश पाकर अर्जुन को संगीत और नृत्य की कला में निपुण कर दिया।

    उर्वशी का अर्जुन को श्राप
    एक दिन जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, वहाँ पर इन्द्र की अप्सरा उर्वशी आई और अर्जुन पर मोहित हो गई। अवसर पाकर उर्वशी ने अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन! आपको देखकर मेरी काम-वासना जागृत हो गई है, अतः आप कृपया मेरे साथ विहार करके मेरी काम-वासना को शांत करें।” उर्वशी के वचन सुनकर अर्जुन बोले, “हे देवि! हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता के तुल्य हैं। देवि! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।” अर्जुन की बातों से उर्वशी के मन में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और उसने अर्जुन से कहा, “तुमने नपुंसकों जैसे वचन कहे हैं, अतः मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम एक वर्ष तक पुंसत्वहीन रहोगे।” इतना कहकर उर्वशी वहाँ से चली गई।
    जब इन्द्र को इस घटना के विषय में ज्ञात हुआ तो वे अर्जुन से बोले, “वत्स! तुमने जो व्यवहार किया है, वह तुम्हारे योग्य ही था। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की इच्छा थी, यह शाप तुम्हारे अज्ञातवास के समय काम आयेगा। अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के समय ही तुम पुंसत्वहीन रहोगे और अज्ञातवास पूर्ण होने पर तुम्हें पुनः पुंसत्व की प्राप्ति हो जायेगी।”
    अर्जुन बने बृहन्नला
    इस शाप के कारण ही अर्जुन एक वर्ष के अज्ञात वास के दौरान बृहन्नला बने थे। इस बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने उत्तरा को एक वर्ष नृत्य सिखाया था। उत्तरा विराट नगर के राजा विराट की पुत्री थी। अज्ञातवास के बाद उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था।

     Hindi Mahabaharta Story- Why Urvashi cursed Arjuna?

    Monday, 26 September 2016

    महभारत युद्ध में यह योद्धा अपने हर शत्रु से था अधिक बलवान, जाने अभिमन्यु से जुड़े रहस्य !

    By: Secret On: 18:33
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    महाभारत युद्ध में सर्वश्रेष्ठ धनुधर कहलाने वाले अर्जुन का पुत्र था वीर अभिमन्यु. अभिमन्यु ने महाभारत में अपनी वीरता, बुद्धिमानी, कौशल एवं पौरुष का एक महान उदाहरण पेश किया था. अर्जुन की भाँती ही अभिमन्यु भी अपने पिता के समान आकर्षक एवं युद्ध कौशल में निपुण थे या यह कहे की वह अपने पिता अर्जुन की छाया लेकर उतपन्न हुए थे.
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    बचपन से ही अपने माता पिता एवं अन्य पांडवो का आदर करने वाला अभिमन्यु, भगवान श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा एवं अर्जुन का पुत्र था. अभिमन्यु के जन्म से ही वह अपने मामा श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका में रहते थे. भगवान श्री कृष्ण से अभिमन्यु को अनेक विद्याओं की प्राप्ति हुई.
    शास्त्रों का आरंभिक ज्ञान अभिमन्यु को भगवान श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युमन ने दिया था. अपने पिता से वे धनुरविद्या के ज्ञान में कुशल हुए थे. अभिमन्यु के संबंध में यह बहुत ही रोचक बात पुराण में बताई गई है की उन्होंने न केवल अपने जीवन काल में बल्कि जब वह अपनी माता सुभद्रा के कोख में थे तभी उन्होंने युद्ध का ज्ञान सीख लिया था.
    यह तब की बात है जब अर्जुन एक दिन अपनी पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह कला की तकनीक समझा रहे थे उस समय अभिमन्यु सुभद्रा के गर्भ से ही अपने पिता अर्जुन की बातो को सुन रहा था. अर्जुन ने चक्रव्यूह की कला के संबंध में सुभद्रा को बताया की कैसे चक्रव्यूह के भीतर घुसना है, उसे भेदना है तथा उससे बाहर निकलना है.
    अर्जुन एक के बाद एक सुभद्रा को व्यूह में प्रवेश करने और शत्रुओं को कैसे पराजित किया जाए, उसका वर्णन कर रहे थे. अर्जुन द्वारा सुभद्रा को मकरव्यूह, कर्मव्यूह और सर्पव्यूह की जानकारी दी गई. यह सब पार करने के बाद किस तरह से चक्रव्यूह से बाहर आया जा सकता है, यह अर्जुन बताने ही वाले थे कि उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी सो गई है.
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    सुभद्रा को सोये देख अर्जुन ने उन्हें आगे परेशान न करने की सोची और वहां से चले गए. इस प्रकार सुभद्रा के गर्भ में अभिमन्यु ने चक्रव्यूह से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण ज्ञान ले लिया. परन्तु जो महत्वपूर्ण एवं अंतिम जानकारी चक्रव्यूह के संबंध में थी वह अभिमन्यु सीख न सके.
    सम्पूर्ण महाभारत में यदि अर्जुन के आल्वा किसी व्यक्ति में चक्रव्यूह भेदने का साहस था तो वह केवल अभिमन्यु ही थे.
    गुरु द्रोण ने अर्जुन को चक्रव्यूह की कला को सिखाई थी यह कला द्रोण ने खुद अपने पुत्र अश्वथामा को भी नहीं सिखाई थी. अभिमन्यु अपने पिता की भाति ही चक्रव्यूह को तोड़ने तथा उसके भीतर घुसने में कुशल थे परन्तु वे चक्रव्यूह से बहार निकलने का ज्ञान नहीं जानते थे. और इसी का फायदा उनके शत्रुओ ने उठाया.
    शस्त्र विद्या के अलावा भी अभिमन्यु से संबंधित अनेक ऐसे रहस्य थे जो बहुत ही रोचक थे. अभिमन्यु ने कभी अपने बड़ो का अनादर नहीं किया तथा वे सदैव श्री कृष्ण की आज्ञा का पालन करते थे.
    एक पौराणिक कथा के अनुसार अभिमन्यु के पिता अर्जुन ने उनकी माता सुभद्रा को द्वारका से भगाकर विवाह किया था. सुभद्रा के ज्येष्ठ भ्राता बलराम सुभुद्रा का विवाह कौरवों में ज्येष्ठ दुर्योधन से करना कहते थे. परन्तु भगवान श्री कृष्ण ने तो कुछ और ही सोच रखा था. भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को सुभद्रा को साथ में भगा ले जाने का इशारा किया और इस में वे सफल भी हुए. एक पीढ़ी के बाद जब बलराम की पुत्री वत्स्ला पैदा हुई तो उसका विवाह बलराम ने दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण से करने की ठानी.
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    यह बात जब श्रीकृष्ण को पता लगी तो उन्होंने बरसों पहले अपनाई गई उस योजना को दोहराने का निश्चय किया. उन्होंने अभिमन्यु को घटोत्कच की मदद लेने को कहा.घटोत्कच ने आज्ञा अनुसार वत्सला का हरण किया और अंत में अभिमन्यु और वत्सला का विवाह हुआ.
    अभिमन्यु का वास्तविक कौशल सभी ने महाभारत युद्ध के 13 वे दिन देखा वे यह देख जब अभिमन्यु एक के बाद एक कौरवों के महारथियों को पराजित कर रहे थे. कौरव सेना भयभीत हो गई.वह समझ नहीं पा रहे थे कि किस प्रकार से अभिमन्यु को रोका जाए.
    कहते हैं कि अभिमन्यु द्वंद्व युद्ध में इतने माहिर थे कि कौरवों में शायद ही कोई ऐसा योद्धा था जो उन्हें पराजित कर सके.इसीलिए उन्हें पराजित करने के लिए कौरवों ने छ्ल का सहारा लिया. गुरु द्रोण द्वारा पाण्डवों को हराने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गई. वे जानते थे कि चक्रव्यूह को भेदने की कला केवल अर्जुन को आती है, लेकिन अर्जुन-पुत्र की क्षमता से अनजान थे गुरु द्रोण.
    गुरु द्रोण ने पांडवो को युद्ध के लिए चुनौती दी तथा उन्हें घेरने के चक्रव्यूह का निर्माण किया उधर उन्होंने अर्जुन को भी किसी कार्य में उलझाकर रणभूमि से बाहर कर दिया.
    अर्जुन इस बात से अंजान थे की गुरु द्रोण पांडवो के लिए चक्र व्यूह की रचना कर रखी है.
    अर्जुन की अनुपस्थिति में द्रोणाचार्य ने एक विशाल चक्रव्यूह की रचना की. इस चक्रव्यूह को यदि अर्जुन के बाद कोई भेद सकता था, तो वह था उनका पुत्र अभिमन्यु. तब शेष पाण्डवों ने यह योजना बनाई कि अब वे पीछे नहीं हट सकते, लेकिन अभिमन्यु को सहारा देने के लिए चक्रव्यूह के भीतर जाएंगे.
    अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह को भेदने के लिए उसके भीतर घुस गए. उन्होंने बड़ी कुशलता से चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए. तथा साथ दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का भी वध कर दिया. अपने पुत्र के मृत्यु की सुचना पाकर दुर्योधन अत्यधिक क्रोधित हो गया तथा उसने युद्ध के सभी नियम तोड़ डाले व फिर ऐसा हुआ जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था.
    छह चरण पार करने के बाद अभिमन्यु जैसे ही सातवें और आखिरी चरण पर पहुंचा, तो उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया. अपने सामने इतने सारे महारथी देख कर भी अभिमन्यु ने साहस ना छोड़ा. उन्होंने अभिमन्यु के रथ को घेर लिया और उसके घोड़ों को मार दिया.
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    तब अभिमन्यु ने अपने रथ के पहिए को ही अपना सुरक्षाकवच बना लिया तथा अपने दाए हाथ से तलवार बाजी करने लगे. घायल अवस्था में भी उन्होंने कौरवों के अनेको कुशल योद्धाओं के साथ अकेले ही सामना किया तथा उनके लिए मुश्किल घड़ी करने लगे.
    इसके बाद कौरवों द्वारा अभिमन्यु का तलवार भी तोड़ दिया गया व उसके उसके हाथ में स्थित रथ के पहिए को चकनाचूर कर दिया. अब अभिमन्यु पूरी तरह से निहत्थे हो गए थे इस पर भी उन्होंने हार नहीं मानी और वे कौरवों को समाना करते रहे.
    तभी जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर ज़ोरदार प्रहार किया. उस वार की मार अभिमन्यु सह ना सका और वीरगति को प्राप्त हो गया. अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार जब अर्जुन को मिला तो वह बेहद क्रोधित हो उठे और अपने पुत्र की मृत्यु के लिए शत्रुओं का सर्वनाश करने का फैसला किया.




    कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए ?

    By: Secret On: 11:57
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  • कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए ?


    Why Mahabharata war held at Kurukshetra in Hindi : महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया। कुरुक्षेत्र में युद्ध लड़े जाने का फैसला भगवान श्री कृष्ण का था। लेकिन उन्होंने कुरुक्षेत्र को ही महाभारत युद्ध के लिए क्यों चुना इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है।
    Mahabharat Yuddh
    जब महाभारत युद्ध होने का निश्चय हो गया तो उसके लिये जमीन तलाश की जाने लगी। श्रीकृष्ण जी बढ़ी हुई असुरता से ग्रसित व्यक्तियों को उस युद्ध के द्वारा नष्ट कराना चाहते थे। पर भय यह था कि यह भाई-भाइयों का, गुरु शिष्य का, सम्बन्धी कुटुम्बियों का युद्ध है। एक दूसरे को मरते देखकर कहीं सन्धि न कर बैठें इसलिए ऐसी भूमि युद्ध के लिए चुननी चाहिए जहाँ क्रोध और द्वेष के संस्कार पर्याप्त मात्रा में हों। उन्होंने अनेकों दूत अनेकों दिशाओं में भेजे कि वहाँ की घटनाओं का वर्णन आकर उन्हें सुनायें।
    एक दूत ने सुनाया कि अमुक जगह बड़े भाई ने छोटे भाई को खेत की मेंड़ से बहते हुए वर्षा के पानी को रोकने के लिए कहा। पर उसने स्पष्ट इनकार कर दिया और उलाहना देते हुए कहा-तू ही क्यों न बन्द कर आवे? मैं कोई तेरा गुलाम हूँ। इस पर बड़ा भाई आग बबूला हो गया। उसने छोटे भाई को छुरे से गोद डाला और उसकी लाश को पैर पकड़कर घसीटता हुआ उस मेंड़ के पास ले गया और जहाँ से पानी निकल रहा था वहाँ उस लाश को पैर से कुचल कर लगा दिया।
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    इस नृशंसता को सुनकर श्रीकृष्ण ने निश्चय किया यह भूमि भाई-भाई के युद्ध के लिए उपयुक्त है। यहाँ पहुँचने पर उनके मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ेगा उससे परस्पर प्रेम उत्पन्न होने या सन्धि चर्चा चलने की सम्भावना न रहेगी। वह स्थान कुरुक्षेत्र था वहीं युद्ध रचा गया।
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    महाभारत की यह कथा इंगित करती है की शुभ और अशुभ विचारों एवं कर्मों के संस्कार भूमि में देर तक समाये रहते हैं। इसीलिए ऐसी भूमि में ही निवास करना चाहिए जहाँ शुभ विचारों और शुभ कार्यों का समावेश रहा हो।
    हम आपको ऐसी ही एक कहानी और सुनाते है जो की श्रवण कुमार के जीवन से सम्बंधित है।
    जब श्रवणकुमार ने अपने माता-पिता को कांवर से उतारकर चलाया पैदल :
    shravan kumar
    श्रवणकुमार के माता-पिता अंधे थे। वे उनकी सेवा पूरी तत्परता से करते, किसी प्रकार का कष्ट न होने देते। एक बार माता-पिता ने तीर्थ यात्रा की इच्छा की। श्रवण कुमार ने काँवर बनाकर दोनों को उसमें बिठाया और उन्हें लेकर तीर्थ यात्रा को चल दिया। बहुत से तीर्थ करा लेने पर एक दिन अचानक उसके मन में यह भाव आये कि पिता-माता को पैदल क्यों न चलाया जाय? उसने काँवर जमीन पर रख दी और उन्हें पैदल चलने को कहा। वे चलने तो लगे पर उन्होंने साथ ही यह भी कहा-इस भूमि को जितनी जल्दी हो सके पार कर लेना चाहिए। वे तेजी से चलने लगे जब वह भूमि निकल गई तो श्रवणकुमार को माता-पिता की अवज्ञा करने का बड़ा पश्चाताप हुआ और उसने पैरों पड़ कर क्षमा माँगी तथा फिर काँवर में बिठा लिया।
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    उसके पिता ने कहा-पुत्र इसमें तुम्हारा दोष नहीं। उस भूमि पर किसी समय मय नामक एक असुर रहता था उसने जन्मते ही अपने ही पिता-माता को मार डाला था, उसी के संस्कार उस भूमि में अभी तक बने हुए हैं इसी से उस क्षेत्र में गुजरते हुए तुम्हें ऐसी बुद्धि उपजी।

    Saturday, 24 September 2016

    जाने आखिर क्यों भगवान श्री कृष्ण ने “एकलव्य” का किया था वध ?

    By: Secret On: 00:34
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  • जाने आखिर क्यों भगवान श्री कृष्ण ने “एकलव्य” का किया था वध ?

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    Ekalavya:- प्रयाग जो इलहाबाद में स्थित है, महाभारत काल में श्रंगवेरपुर राज्य के नाम से प्रसिद्ध था तथा यह राज्य ( ekalavya ) एकलव्य  के पिता और निषादराज हिरण्यधनु का था. उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मथुरा, हस्तिनापुर, मगध, चेदि और चंदेरी आदि साम्राज्यों के समान थी. निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरीबीर की वीरता विख्यात थी.
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    श्रृंगवेरपुर के राजा हिरण्यधनु और उनकी रानी सुलेखा के स्नेहांचल में वहां की जनता सुखी और सम्पन्न थी. राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्री) परिषद की सहायता से करता था. निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने “अभिद्युमन” रखा. जब अभिद्युमन थोड़ा बड़ा हुआ तो वह अभय के नाम श्रृंगवेरपुर में जाना जाने लगा. पांच वर्ष की आयु में अभिद्युमन की शिक्षा-दीक्षा कुलिय गुरुकुल में की गयी.
    बालपन में ही अस्त्र शस्त्र की विद्या में बालक अभिद्युमन की लगन और एकनिष्ठा को देखते हुए उनके कुलिय गुरु ने उनका नाम एकलव्य ( ekalavya )  सम्बोधित किया. एकलव्य ( ekalavya )  के युवा अवस्था में आने पर उनका विवाह उनके पिता हिरण्यधनु ने अपने ही निषाद मित्र की कन्या सुनीता से करा दी. एकलव्य ( ekalavya )  धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था तथा उस समय धनुर्विद्या में गुरु द्रोण की ख्याति हर जगह थी परन्तु राजकीय वेतन भोगी होने के कारण वे केवल राजकुमारों को ही शिक्षा देते थे.
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    एकलव्य ( ekalavya )  ने अपने पिता को मनाया की उसकी धनुर्विद्या को देखकर स्वयं गुरु दोणाचार्य उन्हें शिक्षा देंगे. पर एकलव्य ( ekalavya )  की सोच गलत थी क्योकि गुरु द्रोणाचार्य राजकीय मर्यादाओ एवं सीमाओं के बाहर जाकर एकलव्य को शिक्षा नहीं दे सकते थे.
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    एकलव्य ( ekalavya )  भी इतनी जल्दी हार मानने वाले में से न था अतः उसने आश्रम से ही कुछ दुरी पर जाकर गुरु द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा बनाई तथा वह उनके प्रतिमा के सामने अपने धनु-विद्या का अभ्यास करने लगे .एकलव्य ( ekalavya )  के साथ उनका एक कुत्ता भी रहने लगा. तभी कुछो दिनों के बाद स्वयं गुरु द्रोण अपने शिष्यों के साथ उस स्थान पर आये जहाँ एकलव्य उनकी प्रतिमा के सामने अपने धनु-विद्या का अभ्यास कर रहा था. गुरु द्रोण और उनके शिष्यों को देख वह कुत्ता भोकने लगा जिस कारण एकलव्य ( ekalavya )  की साधना में बाधा आने लगी. उसने अपने बाणों को दूर से ही इस प्रकार चलाया की वे सभी बाण उस कुत्ते के मुंह में इस प्रकार से जा लगे की उसे कोई नुकसान पहुंचे बिना उसका पूरा मुंह उन बाणों से भर गया. जब गुरु द्रोण ने इस अद्भुत धनुर विद्या का प्रदर्शन देखा तो वे एकलव्य ( ekalavya )  पर बहुत प्रसन्न हुए. तभी गुरु द्रोण को अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुधर बनाने की अपनी प्रतिज्ञा के बारे में याद आया.
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    गुरु द्रोण ने एकलव्य ( ekalavya )  से पूछा की उसने यह धनुर्विद्या किस से सीखी तब एकलव्य ( ekalavya )  ने उन्हें उनकी मिटटी की बनी प्रतिमा की और इशारा किया.
    गुरु द्रोण ने कहाँ क्योकि तुमने मेरी प्रतिमा को गुरु मानकर धनु विद्या सीखी है अतः में तुम्हार गुरु हु और तुम्हे मुझे गुरु दक्षिणा देनी होगी इसके बाद गुरु द्रोण ने एकलव्य ( ekalavya )  से दक्षिणा में उसके दाएं हाथ का अंगूठा मांग लिया. एकलव्य ( ekalavya )  ने अपने गुरु के प्रति अपनी पूरी निष्ठा दिखाते हुए उन्हें अपना दाया अंगूठा काटकर दे दिया.
    कुमार एकलव्य ( ekalavya )  अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आता है. एकलव्य ( ekalavya )  अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता है. आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य ( ekalavya )  को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगा.
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    पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता है. अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित करता है और अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार करता है.
    विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लिखित है कि निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ( ekalavya )  ने जरासंध की सेना की तरफ से मिलकर मथुरा के सेना पर आक्रमण कर यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था. यादव वंश में हाहाकार मचने के बाद जब भगवान श्री कृष्ण ने दाहिने हाथ के महज चार उंगलियों से तीरंदाजी करते हुए एकलव्य ( ekalavya )  को देखा तो उन्हें अपने आँखो पर विश्वाश नहीं हो रहा था.
    अपने धनुर विद्या से पुरे यादव वंश की सेना पर भारी पड़ते एकलव्य ( ekalavya )  को रोकने के लिए भगवान श्री कृष्ण को उसका वध करना पड़ा. तथा एकलव्य  का पुत्र केतुमान भी महाभारत के युद्ध में भीम के हाथो मारा गया.
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    जब पांडव युद्ध जितने के बाद अपनी-अपनी वीरता का बखान कर रहे थे तब भगवान श्री कृष्ण ने यह बात कबूली थी की हे ! अर्जुन तुम्हे महान सिद्ध करने के लिए मुझे क्या-क्या नहीं करना पड़ा, तुम्हे धनुर्विद्या में कोई ना परास्त कर सके इसके लिए मेने छल से गुरु द्रोणाचार्य का वध करवाया, कर्ण को कमजोर किया तथा तुम्हे बगैर अवगत करें मेने एक युद्ध में भील पुत्र एकलव्य को वीरगति प्राप्त करवाई.