Sunday, 2 October 2016

गांधीजी की मौत के रहस्य

By: Secret On: 14:58
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  •  गाँधी वध का रहस्य – कौन थे महात्मा गाँधी और गोडसे


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    गांधीजी की मौत के रहस्य का सच...

    गांधी एक महात्मा या दुरात्मा, इस प्रश्न के खड़े होते ही लोगों के मत विभिन्न धारणाओं तथा गलतफहमियों के कारण वास्तविक निष्कर्ष पर नहीं प्शुंच पाते l
    ये बात अपने आप में ही एक रहस्य लेकर सिमटी रह गयी या फिर तथ्य छुपा दिए गए, क्योंकि ये तो वो देश है जो जिसमे कुछ देशद्रोही मिल कर हराम खोर को भी हे-राम बना कर अपनी राजनीति करते हैं…
    राम को रावण और रावण को राम बना कर पढ़ाया-लिखाया गया, परन्तु उससे सत्य बदल तो नही जाता, गाँधी वध से संबंधित मूल कारणों से संबधित जितने भी तथ्य तथा सत्य हैं वे आज हम सबके सामने होते यदि उस समय सोशल मीडिया का अस्त्र समाज को उपलब्ध होता l
    हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे एक हिंदूवादी कार्यकर्ता होने के साथ साथ एक जाने माने पत्रकार भी थे, जो ‘अग्रणी’ नाम से अपना एक अखबार भी चलाते थे, आखिर एक पत्रकार को ओसो क्या आवश्यकता पड़ी कि उसने कलम छोड़ कर बंदूक उठाने का साहसिक निर्णय लिया, भारतीय पत्रकारों ने तो सदैव गोडसे के साथ पत्रकारिता के सन्दर्भ में भी सदैव भेदभाव ही किया गया l
    गांधी वध के असली तथ्य सदा छिपाए गए…..
    किसी को भी मारने के 2 मूल कारण होते हैं …
    1. किसी व्यक्ति ने अतीत में कुछ ऐसा किया हो जो आपको पसंद नहीं
    2. और कोई व्यक्ति भविष्य में कुछ ऐसा करने वाला हो जो आपको पसंद नहीं
    इन दोनों कारणों के इर्द गिर्द कारण अनेक हो सकते हैं ….
    ऐसा ही एक कारण गंधासुर वध के साथ तथा भारत के भविष्य का जुड़ा हुआ था
    गंधासुर वध 30 जनवरी को किया गया था…
    बहुत ही कम लोग इस तथ्य से अवगत हैं कि गांधी वध का एक प्रयास 20 जनवरी 1948 को भी किया गया था l
    20 जनवरी, 1948 को गाँधी के ठिकाने बिरला हाउस पर बम फेंका गया था जिसमें वो बच गया था, यह बम पाकिस्तानी पंजाब से भारत आये एक 19 वर्ष के युवा शूरवीर मदनलाल पाहवा ने फेंका था, वह दुर्भाग्यशाली रहा और गाँधी सौभाग्यशाली l
    मदन लाल पाहवा का सबसे ज्वलंत प्रश्न आज भी सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर भारतीय सत्तालोलुपों की राजनितिक विफलता के कारण जो लोग विस्थापित हुए उन्हें शरणार्थी (Refugee) क्यों कहा जाता था ?
    विभाजन की त्रासदी में जो हिन्दू पाकिस्तान से भारत आये उन्हें दुरात्मा गांधी की बद्दुआओं का कोपभाजक बनना पड़ा, दुरात्मा गांधी पाकिस्तान से आये हुए हिन्दुओं को क्रोधवश कोसते हुए कहता था कि “तुम लोग यहाँ क्यों आये हो? जाओ वापिस चले जाओ, यदि मुसलमान तुम्हारी हत्या करके खुश होते हैं, तो उन्हें खुश करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दो l”
    ऐसे अनेकों लांछनों और आलोचनाओं से क्षुब्ध एक 19 वर्षीय युवा जो निस्संदेह अभी जीवन के उतार चढ़ावों की वास्तविकता से परिचित भी न हुआ था, उसके रक्त में उबाल भरने का कार्य गांधी तथा उसके सत्तालोलुप राजनेताओं ने किया l
    क्या गांधी तथा अन्य सत्तालोलुप नेताओं द्वारा ऐसी आलोचनाएं और टिप्पणियाँ वास्तविक दोषी नही थीं, मदन लाल पाहवा जैसे युवाओं को उकसाने हेतु ?
    मदनलाल पाहवा को गिरफ्तार कर लिया गया और अन्य साथियों की भी खोज की जाने लगी l
    और ठीक 10 दिन बाद 30 जनवरी, 1948 को दुरात्मा गाँधी का वध किया जाता है, यहाँ एक आवश्यक प्रश्न उभर कर आता है कि यह 10 दिन के अंदर ही क्यों हुआ ? थोडा और समय भी लिया जा सकता था l परन्तु 10 दिन ही क्यों ? ऐसा कौन सा संकटकाल आने वाला था कि 10 दिन के अंदर अंदर ही मारना पड़ा ?
    मैं समझता हूँ जब तक प्रश्नों का कारण से कोई अवगत न हो तब तक उसे गाँधी वध के बारे में कुछ भी कहने से स्वयं को रोकना चाहिए, और एक बार सभी तथ्यों तथा साक्षों से अवगत होकर अपना वंक्त्व्य देना चाहिए l
    अंग्रेज़ जब भारत को सत्ता का हस्तांतरण सौंप कर गये तब भारत के राजकोष में 155 करोड़ रूपये छोड़ कर गये थे, जिसमे दुरात्मा गांधी की यह मांग थी कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे दिए जाएँ l
    यह 55 करोड़ और 75 करोड़ रूपये के तथ्य भी आजतक भारीयों की जानकारी से दूर रखे गये जबकि वास्तविकता यह है कि पकिस्तान को दी जाने वाली राशी जो निर्धारित हुई थी वह 55 करोड़ न होकर 75 करोड़ रूपये थी, जिसमे से 20 करोड़ का अग्रिम भुगतान पहले ही भारत सरकार द्वारा कर दिया गया था l
    परन्तु 20 करोड़ का अग्रिम भुगतान करने के तुरंत बाद ही पाकिस्तान ने कबाइली आतंकवादियों की सहायता से कश्मीर पर सैन्य हमला आरम्भ किया जिसके बाद भारत सरकार ने शेष 55 करोड़ का भुगतान रोक लिया, और यह कहा गया कि पाकिस्तान पहले कश्मीर विवाद को सुलझाए क्यूंकि यह विश्वास और संदेह सबको था कि पाकिस्तान 55 करोड़ रूपये का उपयोग सैन्य क्षमता बढाने हेतु ही करेगा l
    नेहरु और पटेल की असहमति के बाद क्रोधवश गांधी द्वारा हठपूर्वक आमरण अनशन करके नेहरु और सरदार पटेल पर जो राजनितिक दबाव की राजनीती खेल कर पाकिस्तान को हठपूर्वक 55 करोड़ दिलवाए गये, वह समूचे देश के नागरिकों के रक्त को उबाल गया था l
    गाँधी द्वारा हठपूर्वक अनशन करके 55 करोड़ की राशि प्राप्त होने के कुछ घंटों में ही पकिस्तान ने कश्मीर पर पुन: सैनिक आक्रमण आरम्भ कर दिए l
    अभी भारत सरकार कश्मीर की चुनौतियों से निपटने की रणनीति बना ही रही थी कि गांधी ने अचानक पकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया, विश्वस्त कारण यह बताये जा रहे थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच हुए विभाजन के बाद पाकिस्तान की नाजायज़ मांगों को मनवाने हेतु भारत सरकार के ऊपर दबाव बनाने हेतु गाँधी 7 फरवरी, 1948 को अनशन पर बैठने वाला है l यह अनशन लाहौर में होना था जो कि उस समय पाकिस्तान की राजधानी थी, इस्लामाबाद को पाकिस्तान की राजधानी बाद में बनाया गया l
    यह नाजायज़ मांगें कौन सी थीं, इन पर आज तक भारत सरकार द्वारा पर्दा डाल कर रखा गया है साथ ही न्यायालय में हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे द्वारा गांधी वध हेतु गिनवाए गये 150 कारणों को भी तत्कालीन सरकार द्वारा सार्वजनिक किये जाने पर प्रतिबन्ध लगाया गया l
    आखिर क्या भय था… और क्या कारण थे, इन पर से पर्दा हारना अत्यंत आवश्यक है ?
    जिन्ना एक हिन्दू से मुस्लिम बने परिवार की पहली पीढ़ी का एक भाटिया राजपूत था काठियावाड़ क्षेत्र का, जिसके बाप का नाम था पुन्ना (पुंजा/पुन्ज्या) लाल ठक्कर जिन्ना ने गंधासुर को आमंत्रित किया था पाकिस्तान की यात्रा के लिए l
    मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने कुछ मांगें रखी थीं, जो कि सरासर अमर्यादित और नाजायज़ थीं, और उन मांगों के पीछे इस्लामिक राष्ट्र के पैशाचिक षड्यंत्र भी थे, जिनको कि आप सबके सामने रखना अत्यंत आवश्यक है l
    इन मांगों में जो सबसे विषैली मांग थी उसका आकलन आपको अत्यंत गंभीरता से करना होगा :
    जिन्ना और मुस्लिम लीग ने मांग रखी कि हमें इस पाकिस्तान से उस पाकिस्तान जाने में समुद्री रस्ते से बहुत लम्बा मार्ग तय करना पड़ता है और पाकिस्तानी जनता अभी हवाई यात्रा करने में सक्षम नही है, इसलिए हमें भारत के बीचो बीच एक नया मार्ग (Corridor) बना कर दिया जाए… उसकी भी शर्तें थीं जो बहुत भयानक थीं l
    1. जो कि लाहोर से ढाका तक जाता हो अर्थात राष्ट्रीय राजमार्ग -1 (NH – 1 : Delhi – Amritsar) और राष्ट्रीय राजमार्ग -2 (NH – 2 : Delhi – Calcutta) को मिलाकर एक कर दिया जाए तत्पश्चात इसे बढ़ाकर लाहोर से ढाका तक कर दिया जाये l
    2. जो दिल्ली के पास से जाता हो …
    3. जिसकी चौड़ाई कम से कम 10 मील की हो अर्थात 16 किलोमीटर (10 Miles = 16.0934 KM)
    4. इस 16 किलोमीटर चौड़ाई वाले गलियारे (Corridor) में बस, ट्रेन, सडक मार्ग आदि बनाने के बाद जो भी स्थान शेष बचेंगे उनमे केवल पाकिस्तानी मुसलमानों की ही बस्तियां बसाई जाएँगी l
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    भारतीय हिन्दुओं की तो छोडिये, उस गलियारे (Corridor) में मात्र पाकिस्तानी मुसलमान ही रहेगा भारत में रहने वाला कोई मुसलमान नही रहेगा और इस मांग का यदि गंभीरता से आकलन करें आप तो यह पाएंगे कि यह सीधा सीधा इस गलियारे के ऊपर के उत्तर भारत को पाकिस्तान के दोनों हिस्सों (पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान) से जोड़ने का षड्यंत्र था जिसको कि नाम दिया गया था मुगालिस्तान l
    अमर्यादित तथा नाजायज़ मांगों की यह सूची बहुत लम्बी है, जिसका सम्पूर्ण अध्ययन करने के पश्चात आपको यह सोचने पर विवश होना पड़ेगा कि आखिर गाँधी की निष्ठा भारत के प्रति थी या पाकिस्तान के प्रति… और उसके बाद आपको भी यह कहना पड़ेगा कि दुरात्मा गांधी राष्ट्रपिता नही अपितु पाक-पिता था (पाकिस्तान का पिता ) l
    इन समस्त जानकारियों को खोजने के लिए एक लंबा समय लगा,  परन्तु इस लम्बे समय में बहुत से तथ्य भी सामने आये जिनको देखने पर प्रथम दृष्टी में ही दुरात्मा गांधी एक कुत्सित मानसिकता का व्यक्ति लगता है कि क्यों उसने मांगों को मानने हेतु भारत सरकार पर दबाव बनाया ? क्या दुरात्मा गाँधी ने इन मांगों का विस्तृत अध्ययन भी किया था या नही ?
    इसमें सबसे आश्चर्यजनक तो नगालैंड के एक दुर्गम हिस्से में नियुक्त एक जिला आयुक्त के पास जमाखुदरा रोकड़ जो कि 75 रुपए थे, उसके भी आनुपातिक विभाजन का एक रिकॉर्ड प्राप्त होता है l
    प्रत्येक देश को विरासत में मिलीं रेलगाड़ियाँ तथा रेल ट्रैक और सड़क राजमार्गों के लाभ अनुपात भी विभाजित किये गये l
    टेंकों का बंटवारा…
    हवाई जहाज़ों का बंटवारा…
    युद्ध विमानों का बंटवारा…
    रेल की पटरियों का बंटवारा…
    कोयला, तेल, गैस के प्राकृतिक संसाधनो में रायल्टी l
    कराची और ढाका बन्दरगाहों में से एक बन्दरगाह भी भारत के भाग में आना तय किया गया था, परन्तु दुरात्मा गांधी के आदेश पर एम. सी. सीतलवाड नामक एक व्यक्ति जो कि भारत के पहला Attorny General भी नियुक्त किया गया, उसने जाकर कुछ ऐसी शर्तों पर सहमती बनाई कि भारत के हिस्से में न तो कराची का बन्दरगाह आया और न ही ढाका, क्योंकि दोनों में जो भी बन्दरगाह भारत के भाग में आता, उससे पाकिस्तान के नक्शे भारी परिवर्तन होता l
    कराची जो कि पाकिस्तान का व्यावसायिक केंद्र था, और मुंबई (Bombay) भारत का, दोनों की शहरों की चल तथा अचल सम्पत्तियों में जमीन आसमान का अंतर था उसे भी गांधी ने बराबर करने को कहा, उदाहरणार्थ यदि मुंबई का मूल्यांकन 1000 रूपये हो और कराची का 25 रूपये तो कराची को 500 रूपये के लगभग दिए जायें, जिससे कि दोनों शहरों को बराबर किया जा सके l
    जबकि इसके विपरीत लाहौर के एक शीर्ष पुलिस अधिकारी ने पुलिस विभाग का विभाजन आधा आधा बाँट दिया हिन्दू अधिकारी और मुस्लिम अधिकारी के बीच, जिसमे लाठियां, राइफलें, वर्दी, जूते आदि शामिल थे l
    लाहौर स्थित पंजाब सरकार के पुस्तकालय में जो Encyclopedia Britannica की एक प्रति थी उसेधार्मिक आधार पर विभाजित कर के दोनों देशों को आधा-आधा दे दिया गया l पुस्तकालय की पुस्तकें जो भारत भेजने पर सहमती बनाई गई, उन्हें भेजते समय अधिकाँश बहुमूल्य ग्रन्थ, पुस्तकें, अभिलेख आदि नष्ट कर दिए गये l
    सबसे हास्यापद तो यह तथ्य सामने आया कि अंग्रेजी शब्दकोश की एक डिक्शनरी को फाड़ कर दो भागों में विभाजित कर दिया गया, A-K शब्दकोश भारत भेजे गये और बाकी पाकिस्तान में रखे गये l
    मुस्लिम शराब व्यापारियों को भारत में रहने को कहा गया, क्योंकि इस्लाम में शराब हराम है, परन्तु पाकिस्तान की बेशर्मी देखिये कि इन शराब कि फेक्टरियों का मुआवजा भी माँगा और भविष्य में होने वाले लाभ में हिसा भी l
    भारत सरकार के पास एक सरकारी मुद्रा छपने की मशीन थी जिसे देने से भारत सरकार ने स्पष्ट मना कर दिया था l
    भारत के वायसराय के पास दो शाही गाड़ियां थीं जिसमे से एक सोने की थी और एक चांदी की थी, दोनों पर विवाद हुआ तो लार्ड माउन्टबेटन के सैन्यादेशवाहक (ADC means Aide-de-camp) ने सिक्का उछाल कर निर्णय किया तो सोने की गाड़ी भारत के हिस्से में आई l वायसराय की साज सज्जा के सामान, कवच, चाबुक, वर्दियां आदि सब बराबर बराबर बाँट ली गई l
    अंत में वायसराय के सामान में एक भोंपू (तुरही) शेष बची, जो कि विशेष आयोजनों में बजाने हेतु उपयोग में लाई जाती थी, अब यदि उसे आधा आधा बाँट दिया जाए तो किसी काम का नही और एक देश को देने पर विवाद होना तय था, तो अंत में उसे ADC ने ही अपने पास एक यादगार के रूप में रख लिया l
    जनसंख्या के आधार पर हुए इस विभाजन के आधार पर आकलन करें तो समस्त चल और अचलपरिसंपत्तियों में भारत की हिस्सेदारी 82.5% थी, और पाकिस्तान 17.5% की हिस्सेदारी थी, जिसमेतरल संपत्ति, मुद्रित मुद्रा भंडार, सिक्के, डाक और राजस्व टिकटें, सोने के भंडार और भारतीय रिजर्वबैंक की संपत्ति भी शामिल है।
    सभी चल और अचल संपत्ति में से भारत और पाकिस्तान के बीच का अनुपात 80-20 में निर्धारित होने की सहमती बनने का अनुमान था, पाकिस्तान ने बेशर्मी की समस्त हदें पार करते हुए मांगें रखीं जिसमे मेज, कुर्सियां, स्टेशनरी, बिजली के बल्ब, स्याही बर्तन, झाडू और सोख्ता कागज (InkPads) का भी विभाजन किया जाना था l
    उपरोक्त समस्त सन्दर्भों तथा तथ्यों का आकलन करने पर एक मूल प्रश्न खड़ा होता है कि यदि उपरोक्त वर्णित अनुपात के रूप में पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपए देने के लिए दुरात्मा गांधी दबाव बना रहा था तो उस अनुपात की दृष्टि से भारत के लिए कितना कोष बनता था… उत्तर मिलेगा 470 करोड़रुपए l
    जबकि अंग्रेज भारत के राजकोष में मात्र 155 करोड़ रूपये छोड़ कर गये थे, शेष धन गांधी ने अंग्रेजों से क्यों नही माँगा ?
    इन अमर्यादित तथा नाजायज़ मांगों के प्रति तत्कालीन भारत सरकार ने नाराजगी प्रस्तुत की और और सरदार पटेल ने मांगें मांगने से स्पष्ट मन कर दिया जिसके कारण दुरात्मा गाँधी ने पाकिस्तान जाकर हठपूर्वक आमरण अनशन करने की जिन्ना के सुझाव को स्वीकार किया जिससे कि यह विवाद अंतर्राष्ट्रीय विवाद का रूप ले तथा भारत सरकार पर दबाव बना कर अमर्यादित तथा नाजायज़ मांगों को स्वीकार करवाया जा सके l
    यहाँ मैं यह कहने में मुझे कोई झिझक नही है कि श्री मदन लाल पाहवा, श्री नथुराम गोडसे, श्री नारायण आप्टे, श्री विष्णु करकरे, श्री गोपाल गोडसे आदि ने कोई अपराध नही किया अपितु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत होकर उन अमर्यादित तथा नाजायज़ मांगों को रुकवाया जिन्हें रुकवा पाने में स्वयं नेहरु और पटेल भी असमर्थ थे l
    गांधी वध के अंतिम दिनों के बार में भी यदि हम आकलन करेंगे तो पायेंगे कि 20 जनवरी, 1948 के बम फेंकने के प्रकरण के बाद बिरला हॉउस की सुरक्षा बढाने के स्थान पर घटा दी गई थी, जिससे यह पक्ष उजागर होता है कि नेहरु सरकार उस समय गांधी वध के खतरे को समझते हुए भी इस महान कार्य को होने देना चाहती थी l
    परन्तु आखिर 10 दिन ही क्यों …
    जबकि उस समय न इंटरनेट था, न मोबाइल, न ही पेजर, न ही फैक्स आदि की सुविधायें थीं अर्थात संचार माध्यम इतने विकसित नही थे, और 20 जनवरी के असफल प्रयास के बाद छिपने के स्थान पर 10 दिन के अंदर ही अंदर ट्रेनों में घूम कर स्वयं को छिपाना, सुरक्षित रखना और नई योजना बना कर संसाधन एकत्रित करके पुन: मात्र 10 दिन में ही क्यों गांधी वध की योजना को पूर्ण किया गया… जबकि आज भी यदि ऐसा कोई प्रयास असफल हो जाये तो स्वयं को छिपाने हेतु व्यक्ति कम से कम 6 महीने से एक वर्ष का समय ले लेता है… आखिर ऐसा क्या संकटकाल था ?
    संकटकाल यही था कि 3 फरवरी, 1948 को गांधी लाहौर जा रहा था, और 7 फरवरी 1948 को वह लाहौर में हठपूर्वक आमरण अनशन भारत सरकार पर दबाव बना कर अमर्यादित तथा नाजायज़ मांगों को स्वीकार करवाने के राष्ट्रद्रोही दुष्कृत्य को रोका जा सके l
    अन्यथा चल-अचल सम्पत्ति तो जो जाती सो जाती साथ ही सम्पूर्ण उत्तर भारत के मुग्लिस्तान बनाये जाने हेतु इस्लामीकरण का खतरा भी बढ़ जाता l
    शुक्रवार, 30 जनवरी 1948, की शाम को बिरला हॉउस में जब गांधी शाम की प्रार्थना सभा हेतु जा रहा था, तो सबकी योजना यह थी कि जब गाँधी प्रार्थना सभा से लौटेगा तो उस समय उसे गोली मारी जाएगी, परन्तु इसके विपरीत हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे ने आदमी शौर्य का साहस देते हुए एक साहसिक निर्णय लिया कि बाद में न जाने अवसर प्राप्त हो या न हो, अभी अवसर है तो योजना को अभी पूर्ण कर दिया जाए, और यही सोचकर उन्होंने तुरंत आगे चल रहे गांधी को तेज़ कदमों से पार किया और आगे बढ़कर गांधी के सीने में अपनी बरेटा रिवोल्वर से गोलियां ठोंक कर एक … नर-पिशाच दुरात्मा मोहनदास करमचन्द ग़ाज़ी का वध किया l
    इसे हत्या का नाम देना मर्यादा के विपरीत होगा, इसे वध ही कहा जायेगा, The Righteous Killing,
    गांधी वध के पश्चात हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे, नारायण आप्टे तथा विष्णु करकरे वहां से भागे नही, और न ही पुलिस जांच तथा न्यायालय में कभी भी किसी ने गाँधी वध के आरोप को अस्वीकार किया जो कि एक आदमी शौर्य की वीरगाथा की अनुभूति करवाते हैं l
    आज भारत के नागरिक या सम्पूर्ण विश्व के नागरिक जो हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे तथा नारायण आप्टे को हत्यारा कह कर सम्बोधित करते हैं उन्हिएँ आवश्यकता है समस्त तथ्यों तथा सन्दर्भों से परिचित होकर इनका आकलन करने की l
    कम से कम उत्तर भारत के समस्त राज्यों के निवासियों को तो यह समझना चहिये कि हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे, नारायण आप्टे, मदनलाल पाहवा, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे आदि द्वारा किये गये इस पवित्र कार्य से वे सब मुस्लिम होने से बच गये, अन्यथा जिस प्रकार पकिस्तान में फंसे बड़े बड़े धनवान, बलवान हिन्दू भी मुसलमान हो गये आज उसी भाँती उत्तर भारत के राज्यों के निवासियों का भी इस्लामीकरण तलवार की नोक पर कर दिया जाना था l
    अयोध्या, काशी, मथुरा, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि की परिस्थिति आज कुछ और ही होतीं l
    गाँधी वध से संबंधित इन मूल कारणों की अज्ञानता ही प्रमुख कारण है कि आज भी हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे का चरित्र चित्रण एक हत्यारे की भांति किया जाता है l
    न्याय व्यवस्था और संविधान का गठन इस हेतु किया जाता है कि नागरिकों को कठोर कानूनों से भी उत्पन्न हो और जो उसके बावजूद भी छोटे अपराध, बड़े अपराध करे उसे उसके अनुसार दंड मिले, छोटा दंड छोड़ी सज़ा, बड़ा दंड बड़ी सज़ा l
    प्राचीन भारत की न्याय व्यवस्था तथा ऋषियों द्वारा निर्मित दंड संहिताओं का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि न्याय की मूल भावना होनी चाहिए कि…
    1. नागरिकों को अपराध प्रवृत्ति से दूर रखा जाये l
    2. अपराधी को दंड देने के बाद पुन: समाज में आम नागरिक का सम्मान प्राप्त हो l
    परन्तु गाँधी वध हेतु दोषी पाए जाने पर भारतीय न्याय व्यवस्था द्वारा जो मृत्यु दंड हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे को दिया गया उसके बाद भारतीय जनता को इस प्रकार पढ़ाया लिखाया गया कि आज तक हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे को अपराध मुक्त नही किया जा सका और उन्हें एक हत्यारे के रूप में ही लिखाया पढ़ाया गया l यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है l
    गान्धी-वध के न्यायिक अभियोग के समय न्यायमूर्ति जी.डी.खोसला से नाथूराम गोडसे ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति माँगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी। नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था।
    इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गान्धी-वध के सह-अभियुक्त गोपाल गोडसे ने कई वर्षों तक न्यायिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दी। नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के समक्ष गान्धी-वध के जो 150 कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: –
    1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाये। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से स्पष्ठ मना कर दिया।
    2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था, कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचायें, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया।
    3. 6 मई, 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को दिये गये अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
    4. मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दू मारे गये व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
    5. 1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये अहितकारी घोषित किया।
    6. गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी एवं महाराणा प्रताप को पथभ्रष्ट कहा।
    7. गान्धी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह को कश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दू बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
    8. यह गान्धी ही थे जिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
    9. कांग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिये बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गान्धी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
    10. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से काँग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टाभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पद त्याग दिया।
    11. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
    12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
    13. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे; ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
    14. पाकिस्तान से आये विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
    15. 22 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउण्टबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपये की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
    नाथूराम गोडसे को सह-अभियुक्त नारायण आप्टे के साथ 15 नवम्बर, 1949 को पंजाब की अम्बाला जेल में फाँसी पर लटका कर मार दिया गया। उन्होंने अपने अन्तिम शब्दों में कहा था:
    “यदि अपने देश के प्रति भक्तिभाव रखना कोई पाप है तो मैंने वह पाप किया है और यदि यह पुण्य है तो उसके द्वारा अर्जित पुण्य पद पर मैं अपना नम्र अधिकार व्यक्त करता हूँ l मुझे विश्वास है कि मनुष्योँ द्वारा स्थापित न्यायालय के ऊपर यदि कोई न्यायालय है, तो उसमेँ मेरे कार्य को अपराधनहीँ समझा जाएगा, मैंने देश और जाति की भलाई हेतु यह पुण्य  किया। ”
    – नाथूराम विनायक गोडसे
    हुतात्मा पंडित नथुराम गोडसे जी की अंतिम इच्छा आप सबके समक्ष रख रहा हूँ :
    “मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धु नदी में ही उस दिन प्रवाहित करना जब सिन्धु नदी एक स्वतन्त्र नदी के रूप में भारत के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमें कितने भी वर्ष लग जायें, कितनी ही पीढ़ियाँ जन्म लें, लेकिन तब तक मेरी अस्थियाँ विसर्जित न करना…”
    प्रतीक्षारत हैं एक राष्ट्रभक्त की अस्थियाँ… मुक्ति हेतु …
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    जय जय श्री राम कृष्ण परशुराम

    महान सम्राट अशोक के 9 रहस्यमय रत्न, जानिए उनका रहस्य

    By: Secret On: 14:20
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  • महान सम्राट अशोक के 9 रहस्यमय रत्न, जानिए उनका रहस्य


    अशोक महान (304 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व) : अशोक महान पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय)। पिता का नाम बिंदुसार। दादा का नाम चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (शासनकाल : 322 से 298 ईपू तक)। माता का नाम सुभद्रांगी था जिन्हें रानी धर्मा भी कहते थे।


    पत्नियों का नाम देवी (वेदिस-महादेवी शाक्यकुमारी), कारुवाकी (द्वितीय देवी तीवलमाता), असंधिमित्रा (अग्रमहिषी), पद्मावती और तिष्यरक्षित। पुत्रों का नाम- देवी से पुत्र महेन्द्र, पुत्री संघमित्रा और पुत्री चारुमती, कारुवाकी से पुत्र तीवर, पद्मावती से पुत्र कुणाल (धर्मविवर्धन) और भी कई पुत्रों का उल्लेख है। धर्म- हिन्दू और बौद्ध। राजधानी पाटलीपुत्र। 
     
     
    सम्राट अशोक को 'देवानांप्रिय' अशोक मौर्य सम्राट कहा जाता था। देवानांप्रिय का अर्थ देवताओं का प्रिय। ऐसी उपाधि भारत के किसी अन्य सम्राट के नाम के आगे नहीं लगाई गई।
     
    सम्राट अशोक का नाम संसार के महानतम व्यक्तियों में गिना जाता है। ऐसा माना जाता हैं कि ईरान से लेकर बर्मा तक अशोक का साम्राज्य था। अंत में कलिंग युद्ध ने अशोक को धर्म की ओर मोड़ दिया। अशोक ने जहां-जहां भी अपना साम्राज्य स्थापित किया, वहां-वहां अशोक स्तंभ बनवाए। उनके हजारों स्तंभों को मध्यकाल के मुस्लिमों ने ध्वस्त कर दिया।
     
    अशोक के समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दूकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर, कर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफगानिस्तान तक पहुंच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। 
     
    अशोक महान ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। बिंदुसार की कई पटरानियों और पुत्रों का उल्लेख मिलता है। उनमें से  अशोक का सबसे बड़ा भाई सुसीम था। तिष्य अशोक का सहोदर भाई और सबसे छोटा था। श्यामक अशोक का भाई नहीं था। कहते हैं कि भाइयों के साथ गृहयुद्ध के बाद अशोक को राजगद्दी मिली थी।
     
    आओ हम जानते हैं महान सम्राट अशोक के जीवन से जुड़े उनके 9 रहस्यमय रत्नों के बारे में...

    • सम्राट अशोक के 9 रहस्यमयी सलाहकार : 9 रत्न रखने की परंपरा की शुरुआत सम्राट अशोक और उज्जैन सम्राट प्रथम राजा विक्रमादित्य से मानी जाती है। उनके ही अनुसार बाद के राजाओं ने भी इस परंपरा को निभाया। अकबर ने अपने दरबार में 9 रत्नों की नियुक्ति सम्राट अशोक के जीवन से प्रेरित होकर ही की थी।
     
    अकबर ने अशोक की लगभग सभी नीतियां अपनाई थीं जिसके चलते उन्हें महान घोषित किया जा सकता था। इतिहासकारों ने ऐसा किया भी। हालांकि अकबर ने किसी अन्य धर्म को अपनाने के बजाए खुद ही एक नया धर्म चलाने का प्रयास किया और वे उसके संस्थापक बन बैठे।
     
    कुछ लोग कहते हैं कि अशोक के साथ ऐसे 9 लोग थे, जो उनको निर्देश देते थे जिनके निर्देश और सहयोग के बल पर ही अशोक ने महान कार्यों को अंजाम दिया। ये 9 लोग कौन थे इसका रहस्य आज भी बरकरार है। क्या वे मनुष्य थे या देवता?

    • 9 रत्नों की गुप्त पुस्तक : अब सवाल यह उठता है कि सम्राट अशोक के साथ वे कौन 9 लोग थे जिनके बारे में कहा जाता है कि उनमें से प्रत्येक के पास अपने-अपने ज्ञान की विशेषता थी अर्थात उनमें से प्रत्येक विशेष ज्ञान से युक्त था और अंत में सम्राट अशोक ने उनके ज्ञान को दुनिया से छुपाकर रखा।
     
    वे ही लोग थे जिन्होंने बड़े-बड़े स्तूप बनवाए और जिन्होंने विज्ञान और टेक्नोलॉजी में भी भारत को समृद्ध बनाया। कहा जाता है कि उनके ज्ञान को एक पुस्तक के रूप से संग्रहीत किया गया था। जिस पुस्तक को किसी विशेष व्यक्ति को सुपुर्द किया गया, उसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस पुस्तक या उसके ज्ञान को आगे फैलाया। हालांकि यह रहस्य आज भी बरकरार है।

    • नौ रत्नों का कार्य : ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोक ने प्रमुख 9 लोगों की एक ऐसी संस्था बनाई हुई थी जिन्हें कभी सार्वजनिक तौर पर उपस्थित नहीं किया गया और उनके बारे में लोगों को कम ही जानकारी थी। यह कहना चाहिए कि आमजन महज यही जानता था कि सम्राट के 9 रत्न हैं जिनके कारण ही सम्राट शक्तिशाली है।
     
    इन रहस्यमय 9 लोगों का कार्य ऐसी जानकारियों की विद्या को बचाकर रखना था, जो अगर किसी के हाथ लग जाए तो सृष्टि का विनाश कर सकती है।
     
    बहुत से लोगों का मानना था कि सम्राट अशोक की यह रहस्यमय संस्था धरती पर मौजूद अन्य किसी भी संस्था से ज्यादा शक्तिशाली थी जिसमें बेहतरीन वैज्ञानिक और विचारक शामिल थे।




    • अशोक का निधन कहां हुआ? : यह तो पता चलता है कि सम्राट अशोक का निधन 232 ईसा पूर्व हुआ था लेकिन उनका निधन कहां और कैसे हुआ यह थोड़ा कठिन है।
     
    तिब्बती परंपरा के अनुसार उसका देहावसान तक्षशिला में हुआ। उनके एक शिलालेख के अनुसार अशोक का अंतिम कार्य भिक्षु संघ में फूट डालने की निंदा करना था। संभवत: यह घटना बौद्धों की तीसरी संगीति के बाद की है। सिंहली इतिहास ग्रंथों के अनुसार तीसरी संगीति अशोक के राज्यकाल में पाटलिपुत्र में हुई थी।

    • भारत की अर्थव्यवस्था : नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन के अनुसार 'सम्राट अशोक के काल में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 35% थी और सम्राट अशोक के काल में भारत जागतिक (ग्लोबल) महाशक्ति था।' जब मुगल और अंग्रेज आए, तब तक भारत की भागीदारी 23% थी और जब 1947 में अंग्रेज देश छोड़कर गए तब 4 फीसदी थी। दोनों ने ही भारत को लूटकर अरब और यूरोप को समृद्ध बनाया और आज भारत में अफ्रीका के बाद सबसे ज्यादा गरीब लोग रहते हैं।
    औपनि‍वेशि‍क युग (1773-1947) के दौरान ब्रि‍टि‍श भारत से सस्‍ती दरों पर कच्‍ची सामग्री खरीदा करते थे और तैयार माल भारतीय बाजारों में सामान्‍य मूल्‍य से कहीं अधि‍क उच्‍चतर कीमत पर बेचते थे जि‍सके परि‍णामस्‍वरूप स्रोतों का द्धि‍मार्गी ह्रास होता था। इस अवधि‍ के दौरान वि‍श्‍व की आय में भारत का हि‍स्‍सा 1700 ई. के 22.3 प्रति‍शत से गि‍रकर 1952 में 3.8 प्रति‍शत रह गया।
     
    अशोक के काल में भारत में जातिवाद नहीं था। उस काल में जनसंख्या भी कम थी तो जातिविहीन शील- संपन्न गुणों से उच्च आदर्श विचारों का समाज था। गुप्तकाल में इस तरह के समाज को और बढ़ावा मिला। हर्षवर्धन के काल तक यह सिलसिला चला। फिर भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में युद्ध, घुसपैठ और आक्रमण के लंबे दौर के बाद संपूर्ण भारत को तुर्क, अरब, ईरानी आदि लोगों ने रणक्षेत्र बना दिया और 7वीं सदी से ही भारत का पतन होना शुरू होने लगा, जो आज तक जारी है।  
     
    सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। अशोक के काल में बौद्ध धर्म की जड़ें मिस्र, सऊदी अरब, इराक, यूनान से लेकर श्रीलंका और बर्मा, थाईलैंड, चीन आदि क्षेत्र में गहरी जम गई थीं। लेकिन इस्लाम के उदय के बाद हिंसक दौर में सबसे ज्यादा नुकसान बौद्ध धर्म को ही झेलना पड़ा।

    • अशोक के होने पर एक नजर : चूंकि भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग पर मुगलों और संपूर्ण भारत पर अंग्रेजों ने राज किया था। इस दौरान कुछ मुस्लिम राजाओं ने यहां की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करने का भरपूर प्रयास किया। बाद में अंग्रेजों ने यहां के इतिहास के तथ्‍यों के साथ छेड़खानी की और भारतीय इतिहास को जान-बूझकर भ्रमपूर्ण इसलिए बनाया ताकि आने वाली पीढ़ियों को असली इतिहास की जानकारी न मिले और वह इसे असत्य मानने लगे।
    हालांकि इतिहास के साथ छेड़खानी करने वालों ने ज्यादातर मौकों पर हिन्दू धर्मग्रंथों और स्मारकों को ही क्षतिग्रस्त किया। उसमें भी उनका ध्यान मथुरा, काशी, अयोध्या और प्रमुख तीर्थस्थलों पर ही ज्यादा रहा जिसके चलते जैन और बौद्ध धर्मग्रंथों में इतिहास सुरक्षित ही नहीं रहा बल्कि आज भी कई ऐसे स्मारक हैं, जो भारतीय गौरव को उजागर करते हैं।
     
    बौद्ध ग्रंथों में यद्यपि महान सम्राट अशोक के संबंध में बड़े विस्तार से उल्लेख मिलता है, लेकिन उनके वर्णन भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। माना जाता है कि लेखकों ने अशोकादित्य (समुद्रगुप्त) और गोनंदी अशोक (कश्मीर का राजा) दोनों को मिलाकर एक चक्रवर्ती अशोक की कल्पना कर ली है। इस स्थिति में यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि बौद्ध धर्म का प्रचारक देवानांप्रिय अशोक कौन था? सम्राट अशोक को देवानांप्रिय भी कहा जाता था इसीलिए ज्यादातर विद्वानों ने मान लिया कि सम्राट अशोक का काल (269-232) ईस्वी पूर्व गद्दी पर बैठा था जबकि यह गलत है।
     
    अशोक सीरिया के राजा 'एण्टियोकस द्वितीय' और कुछ अन्य यवन राजाओं का समसामयिक था जिनका उल्लेख 'शिलालेख संख्या 8' में है। इससे विदित होता है कि अशोक ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में राज्य किया, किंतु उसके राज्याभिषेक की सही तारीख का पता नहीं चलता है। अशोक ने 40 वर्ष राज्य किया इसलिए राज्याभिषेक के समय वह युवक ही रहा होगा। 
     
    चीनी विवरण के आधार पर अशोक का काल 850 ईसा पूर्व, सीलोनी विवरण के आधार पर 315 ईसा पूर्व और राजतरंगिणी के अनुसार 1260 ईसा पूर्व।
     
    पौराणिक कालगणना के अनुसार अशोक के राज्य के लिए निकाले गए 1472 से 1436 ईसा पूर्व के काल में और राजतरंगिणी के आधार पर धर्माशोक के लिए निकले राज्यकाल 1448 से 1400 ईसा पूर्व में कुछ-कुछ समानता है जबकि भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले इतिहासकारों द्वारा निकाले गए 265 ईसा पूर्व के काल से कोई समानता ही नहीं है।
     
    उक्त के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान इतिहासकारों द्वारा अशोक के संबंध में निर्धारित कालनिर्णय बहुत ही उलझा और अपुष्ट है जबकि भारत पौराणिक आधार पर कालगणना करने वालों और इतिहासकारों के बीच लगभग 1200 वर्ष का अंतर आ जाता है।
     
    चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक और कनिष्क की जोन्स आदि पाश्‍चात्य विद्वानों द्वारा निर्धारित तिथियों के संदर्भ में एबी त्यागराज अय्यर की 'इंडियन आर्किटेक्चर' का निम्नलिखित उद्धरण भी ध्यान देने योग्य है- 
     
    'एथेंस में कुछ समय पूर्व एक समाधि मिली थी, उस पर लिखा था कि- 'यहां बौधगया के एक श्रवणाचार्य लेटे हुए हैं। एक शाक्य मुनि को उनके यूनानी शिष्य द्वारा ग्रीक देश ले जाया गया था। समाधि में स्थित शाक्य मुनि की मृत्यु 1000 ईसा पूर्व अंकित है। यदि शाक्य साधु को 1000 ईसा पूर्व के आसपास यूनान ले जाया गया था तो कनिष्क की तिथि कम से कम 1100 ईसा पूर्व और अशोक की 1250 ईसा पूर्व और चंद्रगुप्त मौर्य की 1300 ईसा पूर्व होनी चाहिए और इस मान से भगवान बुद्ध उनके भी पूर्व हुए थे। यदि यह मान लिया जाए तो संपूर्ण इतिहास ही बदल जाएगा। यूनानी साहित्य का सेड्रोकोट्टस चंद्रगुप्त मौर्य सेल्यूकस निकेटर का समकालीन था जिसने 303 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण किया था, एकदम निराधार और अनर्गल है।' (दि प्लाट इन इंडियन क्रोनोलॉजी पृ. 9)
     
    अंग्रेज काल में नए सिरे से लिखे गए भारतीय इतिहास के कारण ही यह भ्रम की स्थिति उत्पन्न हई है कि भारतीय इतिहास में ठीक-ठीक तिथि निर्धारण नहीं है। भारत में अब तक जो भी सरकार सत्ता में रही उसने भी इसकी कभी चिंता नहीं ‍की कि भारत के इतिहास को खोजा जाए। ज्यादातर भारतीय इतिहासकारों ने विदेशी इतिहासकारों का अनुसरण ही किया है।

    पहला अशोक : कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार कश्मीर के राजवंशों की लिस्ट में 48वें राजा का नाम अशोक था, जो कि कनिष्क से तीन पीढ़ी पहले था। वह कश्मीर के गोनंद राजवंश का राजा था। इस राजा को धर्माशोक भी कहते थे। अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे लेकर भी बहुत भ्रम फैलाने का प्रयास किया। 
     
    दूसरा अशोक : हिन्दू पुराणों के अनुसार मौर्य वंश का तीसरा राजा अशोकवर्धन था, जो चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र और बिंदुसार का पुत्र था। इसी अशोक को महान सम्राट अशोक कहा गया था और इसी ने अशोक स्तंभ बनवाए और इसी ने कलिंग का युद्ध किया था। कलिंग के युद्ध के बाद यही अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था।
     
    तीसरा अशोक : गुप्त वंश के दूसरे राजा समुद्रगुप्त का उपनाम अशोकादित्य था। समुद्रगुप्त को अनेक स्थानों पर अशोक ही कहा गया जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। समुद्रगुप्त बड़ा ही साहसी और बुद्धिमान राजा था। उसने संपूर्ण भारतवर्ष में बड़े व्यापक स्तर पर विजयी अभियान चलाए थे। अधिकतर इतिहासकार इसे ही महान सम्राट अशोक मानकर भ्रम की स्थिति निर्मित करते हैं।
     
    चौथा अशोक : पुराणों में शिशुनाग वंश के दूसरे राजा का नाम भी अशोक था। वह शिशुनाग का पुत्र था। उसका काला रंग होने के कारण उसे 'काकवर्णा' कहते थे, हालांकि उसे कालाशोक नाम से भी पुकारा जाता था।

     



    Saturday, 1 October 2016

    नवरात्र में शक्ति के 9 रूपों का रहस्य व पूजन

    By: Secret On: 08:51
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  • नवरात्र में शक्ति के 9 रूपों का रहस्य व पूजन

             
     Navtratri me Maa Durga Poojan evam Rahasya
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    नवरात्री का शाब्दिक अर्थ नव + रात्री अर्थात नौं रात्रियां है | आश्विन शुक्ल पक्ष के प्रथम नौ दिनों तक माता दुर्गा के नौ रुपों की पूजा-आराधना की जाती है | यह पर्व उतर भारत में विशेष रूप से उत्साह और श्राद्ध के साथ मनाया जाता है|”
    “नवरात्रि के नौ दिनों में जप करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती है, और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है, एक वर्ष में चार नवरात्रों का वर्णन मिलता है, दो गुप्त तथा दो प्रत्यक्ष|”
    “प्रत्यक्ष नवरात्रों में एक को शारदीय व दूसरे को वासंतिक नवरात्र कहा जाता है, देवी शक्ति और उसके विभिन्न रुपों की पूजा के लिए भारत विश्वभर में प्रसिद्द है | नवरात्रि गुजरात और पश्चिम बंगाल में विशेष पर्व के रूप में मनाई जाती है, नवरात्रे पर उपवास कर रात्रि में माता की आराधना करना कल्याणकारी माना गया है|
      1. प्रथम नवरात्रा – माता शैलपुत्री
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    प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है, शैलपुत्री के पूजा से उपवास शुरू होकर नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा के साथ समाप्त होते है | प्रथम दिन व्रत संकल्प, कलश स्थापना का दिन होता है तथा भक्त जन प्रथम दिन देवी सती के रूप शैलपुत्री का विधि-विधान से पूजन करते है | देवी की पूजा में लाल रंग की वस्तुओं का विशेष महत्व है | व्रत के दिन फल, दूध, साबूदाना व्यंजन, आलू व्यंजन और सेंधा नमक का प्रयोग सेवन के लिए किया जाता है |
    प्रथम नवरात्रे के दिन भक्त उपवास करने के बाद, दुर्गा जी की आरती करके, तांबे का शैलपुत्री माता का चित्रयुक्त बीसा यंत्र भक्तों में बांटे पर विशेष पुण्य फल प्राप्त कर सकते है|
    लाभ : माता शैलपुत्री की उपासना से शत्रुओं पर पूर्ण विजय, राज्य बाधा निवारण, सभी प्रकार के भय दूर व रोगों की समाप्ति होती है |
    2.  द्वितीय नवरात्रा – माता ब्रह्माचारिणी
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    दूसरे नवरात्रे के दिन माता ब्रह्माचारिणी की पूजा की जाती है | माँ दुर्गा का दूसरा स्वरूप उनके भक्तों को अनंत फल देने वाला है | इस दिन मंदिरों में ब्रह्मचारिणी देवी के दर्शनों के लिए भक्तों में विशेष उत्साह देखा जाता है |
    लाभ : अतुलनीय उन्नति, बुद्धि, ज्ञान, शक्ति, विजय, अकाल मृत्यु- दुर्घटना के निवारण हेतू, आकस्मिक धन प्राप्ति व अतुलनीय व्यापार वृद्धि |
    3.  तृतीय नवरात्रा – माता चंद्रघंटा
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    नव दुर्गा पूजन के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा के शरणागत होकर उपासना, आराधना में तत्पर हों, तो समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त हो कर, सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते है |
    लाभ : पुरूषार्थ, सौन्दर्य, पराक्रम, आरोग्य, वशीकरण शक्ति, दीर्घायु व ग्रहस्थ सुख |
    4.  चौथा नवरात्रा – माता कूष्मांडा
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    माँ दुर्गा पूजन के चोथे दिन माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप कूष्मांडा की उपासना की जाती है | कूष्मांडा देवी का ध्यान करने से अपनी लौकिक-पारलौकिक उन्नति चाहने वालों पर इनकी विशेष कृपा होती है |
    लाभ : धन संपदा, ऐश्वर्य, सौभाग्य, आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति |
    5.  पांचवा नवरात्रा – स्कन्द माता
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    पंचम नव रात्री को स्कन्द माता की पूजा की जाती है | नव दुर्गा पूजन के पांचवे दिन माँ दुर्गा के पांचवे स्वरूप-स्कंदमाता की उपासना करनी चाहिए | स्कंदमाता का ध्यान करने से साधक, इस भवसागर के दु: खों से मुक्त होकर, मोक्ष को प्राप्त करता है |
    लाभ : पापों का नाश, कष्टों का निवारण, नौकरी बाधा समाप्त राजनैतिक स्तर पर सफलता, लौहे के समान दृढ़ता व वाक् सिद्धि |
     6.  षष्ट नवरात्रा – कात्यायनी माता
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    छठे नव रात्रि को कात्यायनी माता की पूजा की जाती है | कात्यायनी माता के द्वारा बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति है जाती हो |
    लाभ : भय, शारीरिक दुर्बलता, भूत प्रेत बाधा, शत्रुओं के निवारण हेतु, आत्मविश्वास, बल, वीर्य व पुरूषार्थ में वृद्धि |

    7.  सप्तम नवरात्रा – कालरात्रि माता
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    सप्तम नवरात्रि को कालरात्रि माता की पूजा की जाती है | माता कालरात्रि का ध्यान करने से साधक को इनकी उपासना से होने वाले फलों की गणना नहीं की जा सकती | माता काल-रात्रि का पूजन करने से साधक को मृत्यु का भय नहीं रहता है |
    लाभ : सुरक्षा कवच प्रदान करती है तथा सन्तान, व्यापार रक्षा प्रदान करती है |
    8.  अष्टम नव रात्रि – महागौरी माता
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    माता सती का आठवां रूप महागौरी है | अष्टम नवरात्रि को महागौरी माता की पूजा की जाती है | महागौरी माता का ध्यान करने वाले साधक के लिए असंभव कार्य भी संभव हो जाते है |
    लाभ : लक्ष्मी, धन की देवी, दरिद्रता निवारण, सुख, वैभव, सौभाग्य, अनायास धन, पुरूषार्थ, स्वर्ण, संपति, वाहन, भवन, व्यापार, मान-सम्मान प्राप्त होता है |

    9.  नवम नव रात्रि – सिद्धिदात्री माता
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    नवम नव रात्रि को सिद्धिदात्री माता की पूजा की जाती है | माता सिद्धिदात्री की उपासना से इस संसार की वास्तविकता का बोध होता है | वास्तविकता परम शांतिदायक अमृत पद की और ले जाने वाली होती है |
    लाभ : दुःख, कष्ट, शत्रु, बाधाओं की समाप्ति, अभय व पुरूषार्थ प्रदान करती है |
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