Friday, 15 September 2017
प्राचीन भारतीय और आधुनिक ब्रम्हांड की परिकल्पना
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On: 16:56
महर्षि चित्र ने अपने गुरुकुल में यज्ञ-आयोजित किया था । ऋत्विक् के लिये उन्होंने महर्षि उद्दालक को आमंत्रित किया लेकिन उद्दालक कुछ समय के लिये समाधि लेकर अन्तरिक्ष के कुछ रहस्यों का अध्ययन करना चाहते थे इसलिये उन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतु को यज्ञ के ऋत्विक् के रूप में भेज दिया, अब महर्षि चित्र को हिचकिचाहट इस बात की थी कि बगैर योग्यता की परख किये महर्षि चित्र उन्हें यज्ञ का आचार्य कैसे बनाए इसलिए उन्होंने श्वेतकेतु से प्रश्न किया- ‘सवृत लोके यस्मित्राधास्य हो बोचदध्वा लोके वास्यसीति’ । अर्थात्-क्या इस लोक में कोई आवरण वाला ऐसा स्थान है जहाँ तुम मेरे प्राणों को स्थिर कर सकोगे अथवा कोई ऐसा आवरण रहित अद्भुत स्थान है जहाँ पहुँचा कर मुझे यज्ञ के फलस्वरूप दिव्य अक्षय लोक का भागी बनाओगे ?।
श्वेतकेतु ने इस प्रश्न का उत्तर देने में अपनी असमर्थता प्रकट की (यद्यपि श्वेतकेतु स्वयं एक उच्चकोटि के ऋषि थे) । वे लौटकर अपने पिता के पास गये और उनसे वही प्रश्न पूछा जो उनसे (श्वेतकेतु से) महर्षि चित्र ने पूछा था । महर्षि उद्दालक बड़े सूक्ष्मदर्शी थे उन्होंने सारी स्थिति समझ ली कि चित्र ने श्वेतकेतु से ऐसा प्रश्न क्यों पूछा | लेकिन सच्चाई तो ये थी कि, वे (महर्षि उद्दालक) स्वयं इसी रहस्य को जानने के लिए अविकल्प समाधि (जिस समाधि में चिन्तन, मनन, भावानुभूति चलती रहती है उसे सविकल्प समाधि कहते हैं) लेना चाहते थे ।
उन्होंने अपने ध्यान में ये अनुभव किया कि महर्षि चित्र यह रहस्य पहले से ही जानते हैं सो पिता पुत्र दोनों महर्षि चित्र के पास गये और उनके प्रश्न का उत्तर सविनय उन्हीं से बताने का आग्रह करने लगे । उनकी जिज्ञासा को समझकर महर्षि चित्र ने उन्हें मृत्यु की अवस्था और देवयान मार्ग द्वारा दिव्य उच्च लोकों की प्राप्ति का जो ज्ञान दिया है वह सारा का सारा ही आख्यान महान् वैज्ञानिक सत्यों ओर आश्चर्यों से ओत-प्रोत है और कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में उसका विस्तार से वर्णन है । उससे यह पता चलता है कि भारतीय मनीषा (ऋषि-मुनी) न केवल प्राण और जीवन के रहस्यों से विज्ञ थे वरन् उन्हें सूक्ष्म से सूक्ष्म भौगोलिक ओर ब्रह्माण्ड विज्ञान के रहस्यों का भी ज्ञान था । आज जब उस ज्ञान को हम आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं तो हमें यह मानना पड़ता है कि भारतीय साधनायें किसी भी भौतिक जगत के विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण हैं और जीवन से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं और समस्याओं का वही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है ।
महर्षि चित्र, महर्षि उद्दालक और श्वेतकेतु को बताते हैं- आर्य ! यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म करने वाले लोगों को उच्च लोकों की प्राप्ति जिस तरह होती है वह मैं आप लोगों को बताता हूँ, प्राणों के योग से चन्द्रमा को बल मिलता है, पर कृष्ण पक्ष में तथा दक्षिणायन सूर्यगति के समय स्वर्गादि उच्च लोकों का द्वार अवरुद्ध रहता है इसलिये योगीजन उस समय अपने प्राणों को अपने ध्यान में ही स्थिर कर लेते हैं । अपनी निष्काम भावना को दृढ़ रखते हुए वे जितेन्द्रिय, देवयान मार्ग से अपनी मानवेतर यात्रा प्रारम्भ करते हैं, और सबसे पहले अग्नि लोक को प्राप्त होते हैं, फिर वायुलोक और वहाँ से सूर्य लोक की ओर गमन करते हैं । सूर्य लोक से वरुण लोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक में पहुँचते हुए वे अंत में ब्रह्म लोक के अधिकारी बनते है |
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् की इस आख्यायिका में आगे के वर्णन में बड़े विस्तार पूर्वक देवयान मार्ग की अनुभूतियों का वर्णन हैं | जीवात्मा को वहाँ से जैसे दृश्य दिखाई देते हैं जैसी-जैसी ध्वनियाँ और गन्ध की अनुभूति होती है उस सब का बड़ा ही अलंकारिक और मनोरम वर्णन किया गया है । पहली बार पढ़ने से ऐसा लग सकता है जैसे इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध न हो पर जब दर्शन और आज के आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतो पर हम उसे तौलते और उसका विश्लेषण करते हैं तब आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि इतनी विराट् अनुभूति प्राचीन ऋषियों को कैसे सम्भव हो सकी ।
जैसे–जैसे आधुनिक द्रव्य और ब्रह्माण्ड विज्ञान समय के पथ पर आगे बढ़ रहा है, उनकी अनुभूतियों को शतप्रतिशत सत्य प्रमाणित कर रहा है । इसका एक ज्वलंत प्रमाण अभी कुछ वर्षों पहले आई क्रिस्टोफ़र नोलेन द्वारा रचित फिल्म इन्टरस्टेलर थी जो विशुद्ध रूप से भारतीय ब्रह्माण्ड विज्ञान के सिद्धांतो से प्रेरित थी | यद्यपि अभी विज्ञान अपूर्णावस्था में है तथापि अभी तक उसने जो भी निष्कर्ष निकाले हैं वह भारतीय तत्वदर्शन से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ पाते।
Tuesday, 12 September 2017
शराब से नशा क्यों होता है?
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On: 10:00
आज कल के ज्यादातर यंगस्टर्स पूरी तरह से शराब के आदी हैं। शराब पीने वाले लोग भी बहुत अलग अलग प्रकार के होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, जिन्हें 7-8 ड्रिंक्स के बाद भी कुछ फर्क नहीं पड़ता, वहीं कुछ ऐेसे भी होते हैं, जिन्हें 2 ड्रिंक्स के बाद ही इतना नशा हो जाता है कि फिर उन्हें कुछ होश नहीं रहता है।
अक्सर आपने शराब के नशे में लोगो को मस्ती से झूमते और नाचते देखा होगा। तो आखिर ऐसा क्यों है कि अगर एक ड्रिंक आपको अच्छा महसूस कराती है, तो वहीं 5-6 ड्रिंक्स के बाद आपको नशा चढ़ने लगता है? तो बता दें कि इसका कारण है अल्कोहल, या यूं कहें कि अल्कोहल में बरसों से पाया जाने वाला में इथेनॉल।
दरअसल जब आप अल्कोहल पीते हैं, तो आपके शरीर में पानी में घुलनशील इथेनॉल स्वतंत्र रूप से पास होता है। यह आपके पाचन तंत्र में प्रवेश करने के बाद, आपके खून में जाता है। इसके बाद सेल मैमबरेंस से गुजरता हुआ यह आपके दिल के माध्यम से स्ट्रॉल करता है।
इसे विशेष रूप से मस्तिष्क में रहना पसंद होता है, जहां यह एक केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को अवसादग्रस्त कर देता है। मस्तिष्क में पहुंचने पर इथेनॉल भटकता रहता है और इसकी वजह से फीलगुड डोपामाइन रिलीज होते हैं और तंत्रिका रिसेप्टर्स के साथ लिंक हो जाते हैं। इन रिसेप्टर्स में से इथेनॉल विशेष रूप से ग्लूटामेट से जुड़ता है।
यह एक न्यूरोट्रांसमीटर है, जो न्यूरॉन्स को उत्तेजित करता है। इथेनॉल ग्लूटामेट को सक्रिय बनाने की अनुमति नहीं देता है और यह उत्तेजनाओं का जवाब देने के लिए मस्तिष्क को धीमा कर देता है। इथेनॉल, गामा एमिनोब्युटिक एसिड (जीएबीए) को बांधता है। ग्लूटामेट के साथ अपनी कठोरता के विपरीत, इथेनॉल गाबा रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है।
ये रिसेप्टर्स एक व्यक्ति को शांत और निद्रा महसूस कराते हैं, जिससे मस्तिष्क की क्रिया भी आगे बढ़ती है। बेशक, किसी की शराबी की गंभीरता अन्य कारकों पर भी निर्भर है। आपको यकीन नहीं होगा लेकिन आपका लिंग, आयु, वजन, यहां तक कि आप जो खाते हैं, वो भी आपकी नशे की लत में कुछ भूमिका निभाते हैं।
अल्कोहल को अंत में लगभग 29 मिलीलीटर प्रति घंटे की दर से लिवर में एंजाइमों द्वारा मेटाबोलाइज किया जाता है, लेकिन इस प्रक्रिया से अंगों को लंबे समय तक के लिए नुकसान हो सकता है। शराब की ओवरडोज मस्तिष्क के कामों में इतनी ज्यादा कमी कर सकती है कि यह शरीर में महत्वपूर्ण सिग्नल भेजने में भी विफल रहता है।
Monday, 11 September 2017
क्या होगा अगर पृथ्वी 5 सेकण्ड के लिए अपना गुरुत्वाकर्षण खो दे!
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On: 10:00
अक्सर हमने पढ़ा है कि यह ग्रेविटी ही है, जिसकी वजह से हम जमीन पर चल पा रहे हैं, ग्राउंडेड रहते हैं। गुरुत्वाकर्षण , जो कि एक साथ पदार्थ खींचने वाली प्राकृतिक घटना है। लेकिन क्या हो अगर हमारे ग्रह को पाँच सेकेंड्स तक गुरुत्वाकर्षण खोना पड़ जाए? तो क्या यह वास्तव में पृथ्वी पर जीवन का अंत हो सकता है?
गुरुत्वाकर्षण किसी ऑब्जेक्ट को एक दूसरे की ओर खींचती है, कोई ऑब्जेक्ट जितना बड़ा हेगा, उसका ग्रेविटेशनल पुल भी उतना ही ज्यादा होगा। हम जानते हैं कि हमारी पृथ्वी बहुत बड़ी है और बहुत करीब है। इसकी गुरुत्वाकर्षण की वजह से जब हम कुछ हवा में भी फेंकते हैं तो वो ज़मीन पर आकर गिरता है।
सूर्य पृथ्वी से बहुत अधिक बड़ा है, इतना की हमारे ग्रह की करीब 1 मिलियन से अधिक कॉपीज़ इसके अंदर फिट हो सकती हैं। यह सूरज का गुरुत्वाकर्षण ही है, जिसकी वजह से हमारा ग्रह और अन्य इसके चारों ओर ऑर्बिट करते हैं। गुरुत्वाकर्षण के बिना, इंसान और अन्य वस्तुएं वजनहीन हो जाती हैं।
कभी फिल्में देखें जहां अंतरिक्ष यात्री चन्द्रमा पर अपने देश के झंडे लगाने की कोशिश कर रहे हैं? वे ऊपर और नीचे होते रहते हैं, क्योंकि चंद्रमा बहुत छोटा है और इसलिए वहां पृथ्वी की तुलना में बहुत कम गुरुत्व है। ऐसा ही कुछ अंतरिक्ष यान में वेटलेस होकर तैरते अंतरिक्ष यात्री के साथ भी होता है।
वहीं पृथ्वी पर वापस आते ही वो वापस ज़मीन पर आ जाते हैं, क्योंकि यहां का गुरूत्वाकर्षण उन्हें वापस खींच लेता है। अगर धरती अचानक अपना सारा गुरूत्वाकर्षण को खो देती है, तो हम सिर्फ फ्लोटिंग शुरू नहीं करेंगे, बल्कि यह मानवों के साथ-साथ कारों और इमारतों जैसे चीजों को भी फास्ट-मूविंग बना देगा।
इसका कारण यह है कि ग्रह गुरुत्वाकर्षण के बिना भी स्पिनिंग जारी रखेगा। गुरुत्वाकर्षण की हानि का मतलब होगा कि ग्रह हवा, पानी और पृथ्वी के वायुमंडल को भी नीचे खींचने से रोक देगा। शायद यही तबाही की वजह बन सकता है। अचानक और महत्वपूर्ण वायु दबाव के नुकसान से सभी के इनर ईयर को नुकसान पहुंचाएगा।
Sunday, 10 September 2017
हम सपने क्यों देखते है?
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On: 10:00
मानव मस्तिष्क ग्रे पदार्थ की रहस्यमय छोटी गेंद है। शोधकर्ता अभी भी कई पहलुओं से चकित हैं कि यह कैसे और क्यों संचालित होता है। कई दशकों से वैज्ञानिक नींद और सपने की स्टडीज का अभ्यास कर रहे हैं, और हम अभी भी स्लपिंग के बारे में 100 प्रतिशत नहीं जानते हैं। हम यह नहीं जानते हैं कि वास्तव में हम कैसे और क्यों हम सपने देखते हैं। हम यह जानते हैं कि हमारे सपने का चक्र आम तौर पर नींद के आरईएम चरण के दौरान आता है।
यह भी वैज्ञानिक समुदाय के बीच काफी सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है कि हम सभी सपने देखते हैं, हालांकि हर आवृत्ति में देखे गए सपने अलग-अलग होते हैं। सपने वास्तव में कोई शारीरिक, जैविक या मनोवैज्ञानिक फंक्शन होते हैं या नहीं, इसका पता लगाना अभी बाकी है। कई सिद्धांत हैं कि हम सपने क्यों देखते हैं। एक यह है कि सपने हमारी नींद के साथ-साथ काम करते हैं।
जिससे कि हमारे वेकिंग आवर्स के दौरान इकट्ठा हुई हर चीज के माध्यम से मस्तिष्क को सॉर्ट किया जा सके। आपका मस्तिष्क एक दिन में सैकड़ों हजारों चीजों से मिलता है और हर दिन लाखों इनपुट हमारे ब्रेन में सैट होते हैं। नींद के दौरान, मस्तिष्क इस सारी जानकारी को सॉर्ट करने के लिए काम करता है, यह तय करता है कि क्या रखना है और क्या भूलना है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इस प्रक्रिया में सपने एक भूमिका निभाते हैं।
ऐसे विचारों का समर्थन करने के लिए कुछ शोध भी हैं। अध्ययन से पता चलता है कि हम अपने जागने के समय में नई चीजें सीख रहे होते हैं, तो जब हम सोते हैं तो सपने बढ़ते हैं। एक अध्ययन में भाग लेने वाले जो लोग एक लैंग्वेज कोर्स कर रहे थे, वो उन लोगों की तुलना में अधिक सपना देखते हैं, जो कोर्स नहीं कर रहे थे। इस तरह के अध्ययनों में विचार है कि हम अपने सपनों का इस्तेमाल करते हैं और अल्पकालीन यादों को दीर्घकालिक यादों में परिवर्तित करते हैं।
एक और सिद्धांत यह है कि सपनों को आम तौर पर हमारी भावनाओं को दर्शाता हैं। दिन के दौरान, हमारे दिमाग कुछ कार्यों को प्राप्त करने के लिए कनेक्शन बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। मस्तिष्क केवल मानसिक कार्य ही नहीं करता है यह सही संबंध बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। कुछ ने प्रस्ताव किया है कि रात में सब कुछ धीमा हो जाता है। हमें नींद के दौरान कुछ भी ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए हमारे दिमाग बहुत ढीले कनेक्शन बनाते हैं।
नींद के दौरान है कि दिन की भावनाएं हमारे सपनों के चक्र में युद्ध करती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप अपनी नौकरी खोने के बारे में चिंतित हैं, तो आप सपने देख सकते हैं कि आप दिग्गजों की दुनिया में रहने वाले एक सिकुड़े हुए व्यक्ति हैं, या आप एक महान रेगिस्तानी खाई के माध्यम से निशाना बना रहे हैं। एक सिद्धांत यह है कि सपने सचमुच किसी भी फंक्शन में काम नहीं करते हैं, कि जब हमें नींद आती है तो वे मस्तिष्क की फायरिंग का सिर्फ एक बेकार उप-उत्पाद है।
हम जानते हैं कि आरईएम की नींद के दौरान हमारे दिमाग का पीछे वाला भाग बहुत सक्रिय हो जाता है, इस दौरान सबसे ज्यादा सपना देखा जाता है। यह है कि जब तक मस्तिष्क ऐसे रहस्य रखता है, तब तक हम निश्चित रूप से बिल्कुल नहीं कह सकते कि हम सपने क्यों देखते हैं।
Saturday, 9 September 2017
Neanderthals और आधुुनिक मानव के बीच क्या कुछ संबंध रहा, जानिए यहां
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On: 08:24
शोधकर्ताओं का कहना है कि Neanderthals पहले की तुलना में मर चुके हैं। हाल ही के अध्ययन के निष्कर्ष में ये संकेत सामने आए हैं कि Neanderthals आधुनिक मानवों के साथ भी नहीं रहते थे, जैसा पहले माना गया था।
एक अंतरराष्ट्रीय टीम के शोधकर्ताओं ने 215 हड्डियों की जांच की है, जो पहले स्पेन में स्थित क्षेत्र में दक्षिणी इबेरिया में 11 साइटों से खुदाई की गई के दौरान मिली थी। उनके आंकड़े बताते हैं कि आधुनिक मानव और Neanderthals वास्तव में इस क्षेत्र में पूरी तरह से अलग-अलग समय पर रहते थे, कभी भी मार्गों को पार नहीं कर सकते थे। इन निष्कर्षों में यह सवाल भी आया कि क्या आधुनिक इंसान और Neanderthals एक बार सेक्स करते थे। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि आधुनिक मानव में प्रवेश करने से पहल ही अंतर-प्रजनन पहले हो चुका होगा।
इंटरब्रीड से आनुवंशिक सबूत वर्तमान आधुनिक मनुष्यों में 1 से 4 प्रतिशत हैं Neanderthals के डीएनए से पता चलता है । वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार की तकनीकों का उपयोग करके कलाकृतियों और जीवाश्मों की आयु का पता लगाया है। उदाहरण के लिए, रेडियोगारबन डेटिंग कार्बन आइसोटोप कार्बन -12 और कार्बन -14 के बीच के अनुपात के आधार पर जैविक अवशेषों की आयु निर्धारित की गई ।
जैफ़ोरैया गुफा में एक समान परत में Neanderthals जीवाश्म के रूप में पाया गया था। हड्डियों का अनुमान पहले 33,300 वर्ष की आयु में का था। हालांकि, एक अल्ट्राफिल्टरेशन तकनीक का उपयोग करके पता चला कि ये 46,700 साल से अधिक पुरानी थी।
हमारे परिणाम 1990 के दशक के शुरूआती दिनों से स्वीकार किए गए एक अनुमान पर संदेह करते हैं जो Neanderthals जीवित रहने के लिए अंतिम स्थान दक्षिणी Iberian प्रायद्वीप में था। वैसे ज्यादातर सबूत ने इस विचार को समर्थन दिया है। ये निष्कर्ष बताते हैं कि आधुनिक इंसानों और Neanderthals ने इस क्षेत्र में बातचीत नहीं की है। पिछले अनुसंधान ने सुझाव दिया कि आधुनिक इंसान केवल 42,000 साल पहले शुरू हुए थे।
Friday, 8 September 2017
हिन्दू धर्म के 10 ऐसे रहस्य, जो अब तक अनसुलझे हैं
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Om Tiwari
On: 19:17
1.क्या कल्पवृक्ष अभी भी है?
वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना 'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में) में कर दी थी।
एक कल्प की आयु- कल्पवृक्ष का अर्थ होता है, जो एक कल्प तक जीवित रहे। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच ऐसा कोई वृक्ष था या है? यदि था तो आज भी उसे होना चाहिए था, क्योंकि उसे तो एक कल्प तक जीवित रहना है। यदि ऐसा कोई-सा वृक्ष है तो वह कैसा दिखता है? और उसके क्या फायदे हैं? हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि अपरिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन अधिकतर इससे सहमत नहीं हैं।
3. क्या कामधेनु गाय होती थी?
कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी तरह के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।
गाय हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु है। इस धरती पर पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में एक ही प्रजाति थी। आज से लगभग 9,500 वर्ष पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के 100 पुत्र मारे गए थे।
4. 33 कोटि देवता-
हिन्दू धर्म के अनुसार गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं।
गाय की सूर्यकेतु नाड़ी : गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोककर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है। दूसरी ओर, सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य के संपर्क में आने पर यह स्वर्ण का उत्पादन करती है। गाय के शरीर से उत्पन्न यह सोना गाय के दूध, मूत्र व गोबर में मिलता है। यह स्वर्ण दूध या मूत्र पीने से शरीर में जाता है और गोबर के माध्यम से खेतों में। कई रोगियों को स्वर्ण भस्म दिया जाता है।
5. पंचगव्य-
पंचगव्य कई रोगों में लाभदायक है। पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है। ऐसा कोई रोग नहीं है जिसका इलाज पंचगव्य से न किया जा सके।
6. कैलाश पर्वत और देव आत्मस्थान-
उत्तराखंड में एक ऐसा रहस्यमय स्थान है जिसे देवस्थान कहते हैं। मुण्डकोपनिषद के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केंद्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं।
7. अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-
शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए वे पृथ्वी पर भी आती हैं। देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सिद्ध पुरुषों का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता रहा है।
8. देवस्था-
प्राचीनकाल में हिमालय में ही देवता रहते थे। यहीं पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और यहीं पर नंदनकानन वन में इंद्र का राज्य था। इंद्र के राज्य के पास ही गंधर्वों और यक्षों का भी राज्य था। स्वर्ग की स्थिति 2 जगह बताई गई है- पहली हिमालय में और दूसरी कैलाश पर्वत के कई योजन ऊपर। यहीं पर मानसरोवर है और इसी हिमालय में अमरनाथ की गुफाएं हैं।
9. अन्य रहस्यमय बातें-
हिमालय में ही यति जैसे कई रहस्यमय प्राणी रहते हैं। इसके अलावा यहां चमत्कारिक और दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी मिलती हैं। भारत और चीन की सेना ने हिमालय क्षेत्र में ही एलियन और यूएफओ को देखने का का दावा किया है। हिमालय में ही एक रूपकुंड झील है। इसके तट पर मानव कंकाल पाए गए हैं। पिछले कई वर्षों से भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने इस रहस्य को सुलझाने के कई प्रयास किए, पर नाकाम रहे।
10. सोमरस आखिर क्या था?
सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। आखिर यह सोमरस क्या था? क्या यह शराब जैसा कोई पदार्थ था या कि यह व्यक्ति को युवा बनाए रखने वाला कोई रस था?
ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है-
।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।
अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।
हालांकि वेदों में शराब को बुराइयों की जड़ कहा गया है, ऐसे में वे देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। सुरापान और सोमरस में फर्क था।
वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना 'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में) में कर दी थी।
3. क्या कामधेनु गाय होती थी?
कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी तरह के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था।
गाय हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु है। इस धरती पर पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में एक ही प्रजाति थी। आज से लगभग 9,500 वर्ष पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के 100 पुत्र मारे गए थे।
4. 33 कोटि देवता-
हिन्दू धर्म के अनुसार गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं।
गाय की सूर्यकेतु नाड़ी : गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोककर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है। दूसरी ओर, सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य के संपर्क में आने पर यह स्वर्ण का उत्पादन करती है। गाय के शरीर से उत्पन्न यह सोना गाय के दूध, मूत्र व गोबर में मिलता है। यह स्वर्ण दूध या मूत्र पीने से शरीर में जाता है और गोबर के माध्यम से खेतों में। कई रोगियों को स्वर्ण भस्म दिया जाता है।
5. पंचगव्य-
पंचगव्य कई रोगों में लाभदायक है। पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है। ऐसा कोई रोग नहीं है जिसका इलाज पंचगव्य से न किया जा सके।
6. कैलाश पर्वत और देव आत्मस्थान-
उत्तराखंड में एक ऐसा रहस्यमय स्थान है जिसे देवस्थान कहते हैं। मुण्डकोपनिषद के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केंद्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं।
7. अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-
शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए वे पृथ्वी पर भी आती हैं। देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सिद्ध पुरुषों का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता रहा है।
8. देवस्था-
प्राचीनकाल में हिमालय में ही देवता रहते थे। यहीं पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और यहीं पर नंदनकानन वन में इंद्र का राज्य था। इंद्र के राज्य के पास ही गंधर्वों और यक्षों का भी राज्य था। स्वर्ग की स्थिति 2 जगह बताई गई है- पहली हिमालय में और दूसरी कैलाश पर्वत के कई योजन ऊपर। यहीं पर मानसरोवर है और इसी हिमालय में अमरनाथ की गुफाएं हैं।
9. अन्य रहस्यमय बातें-
हिमालय में ही यति जैसे कई रहस्यमय प्राणी रहते हैं। इसके अलावा यहां चमत्कारिक और दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी मिलती हैं। भारत और चीन की सेना ने हिमालय क्षेत्र में ही एलियन और यूएफओ को देखने का का दावा किया है। हिमालय में ही एक रूपकुंड झील है। इसके तट पर मानव कंकाल पाए गए हैं। पिछले कई वर्षों से भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने इस रहस्य को सुलझाने के कई प्रयास किए, पर नाकाम रहे।
10. सोमरस आखिर क्या था?
सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। आखिर यह सोमरस क्या था? क्या यह शराब जैसा कोई पदार्थ था या कि यह व्यक्ति को युवा बनाए रखने वाला कोई रस था?
ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है-
।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।
अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।
हालांकि वेदों में शराब को बुराइयों की जड़ कहा गया है, ऐसे में वे देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। सुरापान और सोमरस में फर्क था।
अजगर की तरह उड़ने वाले जानवर।
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On: 08:21
एक विशाल प्राचीन उड़ने वाले सरीसर्प अजगर की तरह दिखते थे जिन्हें फिल्म "अवतार" में " ikran" नामक हवाई शिकारी के रुप में दिखाया गया है । शोधकर्ताओं ने कहा कि pterosaur जिसे अब Ikrandraco (लैटिन में "ड्रैको" का अर्थ है ड्रैगन) कहा जाता है, पर ऐसा माना जा सकता pterosaur(ये उड़ने वाले सरीसृपों की एक श्रेणी ) उड़ने के लिए पंखों के झुंड के पहले पीठों वाले जानवर थे। डायनासोर के अंत में pterosaur के विलुप्त होने से पहले ही वे सबसे बड़े जानवर थे, जो कभी पंछी थीं, जिसकी पंख 39 फीट (12 मीटर) तक थी। हालांकि डायनासोर के साथ pterosaur रहते थे, इन उड़ाने वाले सरीसर्प (Ikrandraco) डायनासोर नहीं थे पर इन्हें डायनासोर की प्रजाति ही माना जाता है।।
वैज्ञानिकों ने लगभग 120 मिलियन वर्ष पहले सरीसर्प के दो आंशिक कंकाल की जांच की थी, जो कि शुरुआती क्रेटासियस अवधि में था। उन्होंने इन जीवाश्मों को पूर्वोत्तर चीन के लिओनिंग प्रांत में शुष्क पहाड़ियों में की जो कि पिछले दशक में वहां पंख वाले डायनासोरों की खोज के लिए प्रसिद्ध रहा है।
पहले जब सरीसृप जीवित था, उस क्षेत्र में जहां यह पाया गया था एक मीठे पानी की झील थी जो गर्म जलवायु के साथ कई प्रकार के जानवरों जैसे मछली, कछुए, अन्य pterosaurs, पंख वाले डायनासोर, पक्षियों और स्तनधारियों के लिए घर हुआ करता था ।
pterosaur लगभग 2.3 फीट (0.7 मीटर) लंबा था और इसके लगभग 4.9 फीट (1.5 मीटर) की पंख होते थे। इसकी लम्बी खोपड़ी और एक निचली जबड़े की चोटी पर एक अनोखा शिखा या हड्डी पर उभार था। Ikrandraco के जबड़े के शिखर के पीछे थोड़ा हुकुआ संरचना थी शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि इस पायदान ने मुलायम ऊतकों के लिए एक लंगर के रूप में काम किया होगा ।साथ ही यह भी सामने आया है कि Ikrandraco के पास गले की थैली थी जैसे कि पोलिकन भोजन का भंडार करने का उपयोग करता है
शोधकर्ताओं ने कहा कि Ikrandraco को कभी-कभी पानी के ऊपर घूमते हुए और सतह के पास शिकार किया करते थे। हालांकि, Ikrandraco आधुनिक स्कीमिंग पक्षियों की तुलना में बड़ा है, इसलिए यह नियमित रूप से skimmed नहीं हो सकता है, बल्कि आमतौर पर शिकार के लिए उथले पानी में खड़ा होता था।
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