Saturday, 6 August 2016

दहशत का सबब बनी मिस्र की 'ममी'

By: Secret On: 18:55
  • Share The Gag

  • दहशत का सबब बनी मिस्र की 'ममी'

    वैसे अब इसे मानव मस्तिष्क में उठने वाली लहर कह लीजिए या फिर सामान्य जिज्ञासा की पहचान लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि जब भी कहीं हॉरर, प्रेत या पिशाच से जुड़ी खबरें सुनते या पढ़ते हैं तो भले ही हम खुद को बेखौफ बताते हुए इन सब बातों को मनगढ़त करार दें लेकिन सच यही है कि कहीं ना कहीं हमारा दिमाग इन सब बातों पर अटक जाता है और हम यह सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि क्या वाकई ऐसा हो सकता हैया अगर ऐसा है तो क्या सच में प्रेत आत्माएं आसानी से इंसानी दुनिया में विचरण करती हैं?
    मिस्र के चर्चित पिरामिडों में कैद ममी के बारे में तो हम सभी जानते हैं. प्राचीन मिस्र में ऐसा माना था कि मरने के बाद भी आत्मा को हर उस चीज की जरूरत पड़ती है जो वह जीवित रहते हुए प्रयोग कर रही है. इसीलिए जब भी कोई मरता था तो उसके शरीर को केमिकल लगाकर कुछ इस तरह दफनाया जाता था कि उसके मृत शरीर में से बदबू ना आए और ना ही उसका शरीर सामान्य गति के साथ गलने लगे. इतना ही नहीं मरने के बाद भी जीवन के होने में यकीन रखने वाले मिस्र के लोग मृत शरीर के साथ जरूरी सामान भी रख दिया करते थे, ताकि आत्मा को किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ ना हो. मरने के बाद भी जीवन जैसी बात मिस्र के लोगों के साथ अन्य देशों के लोगों को आज बहुत दिलचस्प लगती है और यह सब वृत्तांत तब और ज्यादा आकर्षित करते हैं जब ममी के जिंदा होने की बात सुनाई देने लगे. ममी अलाइव, ममी रिटर्न जैसीहॉलिवुड फिल्में देखने वाले लोग ममी के खौफ से भली-भांति परिचित होंगे लेकिन हो सकता है उन्हें यह सब फिल्मी मसाला लगता हो. अगर ऐसा है तो हम आपको एक अजीबोगरीब घटना से अवगत करवाने जा रहे हैं जो ममी की दहशत और उसके जिन्दा होने जैसी बातों को स्वत: बयान करती है.
    मैनचेस्टर म्यूजियम (ब्रिटेन) में एक ऐसी प्राचीन मिस्र की मूर्ति को लाया गया है जोअपने आप घूमती है. दिनभर शांत और एक तरफ पड़ी रहने वाली यह मूर्ति दिन ढलते ही भयानक मंजर को आमंत्रित करती है. कार्बन डेटिंग प्रक्रिया के तहत इस 10 इंच ऊंची मूर्ति की उम्र लगभग 18,00 बी.सी. बताई जा रही है और इसे 1933 में ब्रिटेन के इस म्यूजियम में लाया गया था. लेकिन अब यह मूर्ति घूमने लगी है, वह अपनी जगह बदलने लगी है. यह मूर्ति एक पुरानी ममी की कब्रमें से निकाली गई है और अब जब यह मूर्ति अपनी दिशा बदलकर इधर-उधर घूमने लगीहै तो यह सामान्य लोगों के साथ-साथ संग्रहालयों से जुड़े लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय बन गई है. उल्लेखनीय है कि जब संग्रहालय से जुड़े लोगों ने अगले दिन मूर्ति की दिशा को बदला हुआ देखा तो उन्होंने इस मूर्ति के सामने सीसीटीवी लगा दिया और अगले दिन जब कैमरे की फुटेज में इस मूर्ति को घूमते हुए देखा तो किसी को भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ.!!

    हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं - भाग 2

    By: Secret On: 18:49
  • Share The Gag

  • हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं - भाग 2

    हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं - भाग 4 से आगे....
    सम्राट अशोक के 9 रहस्यमय रत्न : 9 रत्न रखने की परंपरा की शुरुआत सम्राट अशोक और राजा  विक्रमादित्य से मानी जाती है। उनके ही अनुसार बाद के राजाओं ने भी इस परंपरा को निभाया। अकबर ने अपने दबार में 9 रत्नों की नियुक्ति की थी। कुछ लोग कहते हैं कि अशोक के साथ ऐसे 9 लोग थे, जो उनको निर्देश देते थे जिनके निर्देश और सहयोग के बल पर ही अशोक ने महान कार्यों को अंजाम दिया। ये 9 लोग कौन थे इसका रहस्य आज भी बरकरार है। क्या वे मनुष्य थे या देवता?

    सम्राट अशोक को 'देवानांप्रिय' अशोक मौर्य सम्राट कहा जाता था। देवानांप्रिय का अर्थ देवताओं का प्रिय। ऐसी उपाधि भारत के किसी अन्य सम्राट के नाम के आगे नहीं लगाई गई। अब सवाल यह उठता है कि सम्राट अशोक के साथ वे कौन 9 लोग थे जिनके बारे में कहा जाता है कि उनमें से प्रत्येक के पास अपने-अपने ज्ञान की विशेषता थी अर्थात उनमें से प्रत्येक विशेष ज्ञान से युक्त था और अंत में सम्राट अशोक ने उनके ज्ञान को दुनिया से छुपाकर रखा। वे ही लोग थे जिन्होंने बड़े-बड़े स्तूप बनवाए और जिन्होंने विज्ञान और तकनालॉजी में भी भारत को समृद्ध बनाया। कहा जाता है कि उनके ज्ञान को एक पुस्तक के रूप से संग्रहीत किया गया था। जिस पुस्तक को किसी विशेष व्यक्ति को सुपुर्द किया गया, उसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस पुस्तक या उसके ज्ञान को आगे फैलाया। हालांकि यह रहस्य आज भी बरकरार है।

    क्या रावण के दस सिर थे? सचमुच यह एक रहस्यमय बात ही है कि किसी के 3, 4 या 10 सिर हों। भगवान दत्तात्रेय के 3, ब्रह्माजी के 4 और रावण के 10 सिर थे। 'रावण'... दुनिया में इस नाम का दूसरा कोई व्यक्ति नहीं है। राम तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन रावण नहीं। रावण तो सिर्फ रावण है। राजाधिराज लंकाधिपति महाराज रावण को 'दशानन' भी कहते हैं। कहते हैं कि रावण लंका का तमिल राजा था।

    जैन शास्त्रों में रावण को प्रति‍-नारायण माना गया है। जैन धर्म के 64 शलाका पुरुषों में रावण की गिनती की जाती है। जैन पुराणों के अनुसार महापंडित रावण आगामी चौबीसी में तीर्थंकर की सूची में भगवान महावीर की तरह 24वें तीर्थंकर के रूप में मान्य होंगे इसीलिए कुछ प्रसिद्ध प्राचीन जैन तीर्थस्थलों पर उनकी मूर्तियां भी प्रतिष्ठित हैं।
    क्या रावण के 10 सिर थे? : कहते हैं रावण के 10 सिर थे। क्या सचमुच यह सही है? कुछ विद्वान मानते हैं कि रावण के 10 सिर नहीं थे किंतु वह 10 सिर होने का भ्रम पैदा कर देता था इसी कारण लोग उसे दशानन कहते थे। कुछ विद्वानों के अनुसार रावण 6 दर्शन और चारों वेद का ज्ञाता था इसीलिए उसे दसकंठी भी कहा जाता था। दसकंठी कहे जाने के कारण प्रचलन में उसके 10 सिर मान लिए गए।
    जैन शास्त्रों में उल्लेख है कि रावण के गले में बड़ी-बड़ी गोलाकार 9 मणियां होती थीं। उक्त 9 मणियों में उसका सिर दिखाई देता था जिसके कारण उसके 10 सिर होने का भ्रम होता था।
    हालांकि ज्यादातर विद्वान और पुराणों के अनुसार तो यही सही है कि रावण एक मायावी व्यक्ति था, जो अपनी माया द्वारा 10 सिर होने का भ्रम पैदा कर सकता था। उसकी मायावी शक्ति और जादू के चर्चे जगप्रसिद्ध थे।
    रावण के 10 सिर होने की चर्चा रामचरित मानस में आती है। वह कृष्ण पक्ष की अमावस्या को युद्ध के लिए चला था तथा 1-1 दिन क्रमशः 1-1 सिर कटते थे। इस तरह 10वें दिन अर्थात शुक्ल पक्ष की दशमी को रावण का वध हुआ इसीलिए दशमी के दिन रावण दहन किया जाता है।
    रामचरित मानस में वर्णन आता है कि जिस सिर को राम अपने बाण से काट देते थे पुनः उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था। विचार करने की बात है कि क्या एक अंग के कट जाने पर वहां पुनः नया अंग उत्पन्न हो सकता है? वस्तुतः रावण के ये सिर कृत्रिम थे- आसुरी माया से बने हुए।
    मारीच का चांदी के बिन्दुओं से युक्त स्वर्ण मृग बन जाना, रावण का सीता के समक्ष राम का कटा हुआ सिर रखना आदि से सिद्ध होता है कि राक्षस मायावी थे। वे अनेक प्रकार के इन्द्रजाल (जादू) जानते थे। तो रावण के 10 सिर और 20 हाथों को भी मायावी या कृत्रिम माना जा सकता है।

    आत्मा या प्राण का कहीं और होना : वैसे कहा जाता है कि हमारी आत्मा का वास दोनों भोहों के बीच भृकुटी में रहता है। लेकिन हमने पुराणों और अन्य ग्रंथों में पढ़ा है कि कुछ लोगों, पशुओं या पक्षियों का प्राण या जीव अन्य कहीं होता था, जैसे किसी राक्षस की जान तोते में थी। अब जब तक तोते को नहीं मारो तो राक्षस को मारना असंभव था। उसी तरह रावण की जान नाभि में थी। क्या ऐसा भी संभव हो सकता है? 
    soul
    ऐसी मान्यता है कि रावण ने अमरत्व प्राप्ति के उद्देश्य से भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या कर वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा ने उसके इस वरदान को न मानते हुए कहा कि तुम्हारा जीवन नाभि में स्थित रहेगा। रावण की अजर-अमर रहने की इच्छा रह ही गई। यही कारण था कि जब भगवान राम से रावण का युद्ध चल रहा था तो रावण और उसकी सेना राम पर भारी पड़ने लगे थे। ऐसे में विभीषण ने राम को यह राज बताया कि रावण का जीवन उसकी नाभि में है। नाभि में ही अमृत है। तब राम ने रावण की नाभि में तीर मारा और रावण मारा गया। हालांकि रावण की जान तो नाभि में थी लेकिन हमने पढ़ा है कि कई दैत्यों, दानवों, राक्षसों आदि की जान उनके खुद के शरीर से बाहर कहीं ओर सुरक्षित रखी होती थी। राक्षस की जान तोते में थी। तोते की गर्दन मोड़ो तो राक्षस की गर्दन मुड़ जाती थी।

    यति : बिगफुट कर रहा है मानव की तबाही का इंतजार, क्योंकि वही है धरती की असली प्राकृतिक प्रजाति। आज का इंसान तो 'स्टार प्रॉडक्ट' है जबकि बिगफुट से इंसानों ने धरती को छीन लिया और उन्हें छुपने पर मजबूर कर दिया? आधुनिक जीव वैज्ञानिक तो यही मानते हैं। पूरे विश्व में इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। तिब्बत और नेपाल में इन्हें 'येती' का नाम दिया जाता है तो ऑस्ट्रेलिया में 'योवी' के नाम से जाना जाता है। भारत में इसे 'यति' कहते हैं।

    यति मानव का वर्णन पुराणों और अन्य भारतीय ग्रंथों में बहुत मिलता है। कहते हैं कि वे हिमालय में कहीं रहते हैं और बहुत कम ही लोगों को दिखाई देते हैं। हालांकि अब तक उनके होने की पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन कई लोग उनको देखे जाने का दावा करते हैं। भारत के कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल आदि राज्यों के लोग उनको देखे जाने का दावा करते आए हैं। नेपाल और तिब्बत के लोग भी यति मानव के होने में विश्वास करते हैं।

    हवाखोरी का रहस्य क्या है? : आज भी भारत की धरती पर ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने कई वर्षों से भोजन नहीं किया, लेकिन वे सूर्य योग के बल पर आज भी स्वस्थ और जिंदा हैं। भूख और प्यास से मुक्त सिर्फ सूर्य के प्रकाश के बल पर वे जिंदा हैं।

    प्राचीनकाल में ऐसे कई सूर्य साधक थे, जो सूर्य उपासना के बल पर भूख-प्यास से मुक्त ही नहीं रहते थे बल्कि सूर्य की शक्ति से इतनी ऊर्जा हासिल कर लेते थे कि वे किसी भी प्रकार का चमत्कार कर सकते थे। उनमें से ही एक सुग्रीव के भाई बालि का नाम भी लिया जाता है। बालि में ऐसी शक्ति थी कि वह जिससे भी लड़ता था तो उसकी आधी शक्ति छीन लेता था।
    वर्तमान युग में प्रहलाद जानी इस बाद का पुख्ता उदाहरण है कि बगैर खाए-पीए व्यक्ति जिंदगी गुजार सकता है। गुजरात में मेहसाणा जिले के प्रहलाद जानी एक ऐसा चमत्कार बन गए हैं जिसने विज्ञान को चौतरफा चक्कर में डाल दिया है। वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर ऐसा कैसे संभव हो रहा है?

    दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे।

    ये है हर साल बढ़ने वाला विश्व का एकमात्र शिवलिंग -

    By: Secret On: 18:46
  • Share The Gag

  • ये है हर साल बढ़ने वाला विश्व का एकमात्र शिवलिंग -

    छत्तीसगढ़ की राजधानी से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गरियाबंद जिला. जिला मुख्यालय से 3 किलोमीटर की दूरी पर बसे ग्राम मरौदा के जंगलों में प्राकृतिक शिवलिंग 'भूतेश्वर महादेव' स्थित है. पूरे विश्व में इसकी ख्याति हर वर्ष बढ़ने वाली इसकी ऊंचाई के लिए फैली हुई है. अर्धनारीश्वर इस शिवलिंग को 'भकुर्रा महादेव' भी कहा जाता हैI

    भूतेश्वर महादेव के स्थानीय पंडितों और मंदिर समिति के सदस्यों का कहना है कि हर महाशिवरात्रि को इसकी ऊंचाई और मोटाई मापी जाती है. सदस्यों का कहना है कि हर साल यह शिवलिंग एक इंच से पौन इंच तक बढ़ जाती है. भकुर्रा महादेव के संबंध में कहा जाता है कि कभी यहां हाथी पर बैठकर जमींदार अभिषेक किया करते थेI 
     भूतेश्वर महादेव के पुजारी केशव सोम का कहना है कि हर वर्ष सावन मास में दूर-दराज से कांवड़िये (भक्त) भूतेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करने आते हैं. उन्होंने बताया कि हर साल महाशिवरात्रि पर भूतेश्वर महादेव की ऊंचाई नापी जाती हैI

    वहीं 25 साल से भूतेश्वर महादेव संचालन समिति से जुड़े मनोहर लाल देवांगन ने बताया कि भूतेश्वर महादेव को भकुर्रा महादेव भी कहते हैं. यह संभवत: विश्व का पहला ऐसा शिवलिंग है, जिसकी ऊंचाई हर साल बढ़ती हैI
    आपको बता दें कि इसके सेवा कार्यो का संचालन 17 गांवों की समिति मिलकर करती हैंI

    भूतेश्वर महादेव की ऊंचाई का विवरण 1952 में प्रकाशित कल्याण तीर्थाक के पृष्ठ क्रमांक 408 पर मिलता हैI जहां इसकी ऊंचाई 35 फीट और व्यास 150 फीट उल्लेखित हैI

    1978 में इसकी ऊंचाई 40 फीट बताई गई. 1987 में 55 फीट और 1994 में फिर से थेडोलाइट मशीन से नाप करने पर 62 फीट और उसका व्यास 290 फीट मिला. वहीं वर्तमान में इस शिवलिंग की ऊंचाई 80 फीट बताई जा रही हैI


    छत्तीसगढ़ इतिहास के जानकार डॉ. दीपक शर्मा का कहना है कि शिवलिंग पर कभी छूरा क्षेत्र के जमींदार हाथी पर चढ़कर अभिषेक किया करते थेI

    शिवलिंग पर एक हल्की सी दरार भी है जिसे कई लोग इसे अर्धनारीश्वर का स्वरूप भी मानते हैं. मंदिर परिसर में छोटे-छोटे मंदिर बना दिए गए हैंI
     आप सभी आर्यजनोँ से अनुरोध है कि इस blog को आवस्य शेयर करे और हिन्दूत्व के प्रचार मे सहयोग प्रदान करेँ...!!!

    हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं - भाग 1

    By: Secret On: 18:41
  • Share The Gag

  • हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं - भाग 1

    क्या कल्पवृक्ष अभी भी है? : वेद और पुराणों में कल्पवृक्ष का उल्लेख मिलता है। कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा का भंडार होता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन से निकला था। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना 'सुरकानन वन' (हिमालय के उत्तर में) में कर दी थी।

    एक कल्प की आयु : कल्पवृक्ष का अर्थ होता है, जो एक कल्प तक जीवित रहे। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच ऐसा कोई वृक्ष था या है? यदि था तो आज भी उसे होना चाहिए था, क्योंकि उसे तो एक कल्प तक जीवित रहना है। यदि ऐसा कोई-सा वृक्ष है तो वह कैसा दिखता है? और उसके क्या फायदे हैं? हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि अपरिजात के वृक्ष को ही कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन अधिकतर इससे सहमत नहीं हैं।
    क्या कामधेनु गाय होती थी? : कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई थी। यह एक चमत्कारी गाय होती थी जिसके दर्शन मात्र से ही सभी तरह के दु:ख-दर्द दूर हो जाते थे। दैवीय शक्तियों से संपन्न यह गाय जिसके भी पास होती थी उससे चमत्कारिक लाभ मिलता था। इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था। 

    गाय हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु है। इस धरती पर पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में एक ही प्रजाति थी। आज से लगभग 9,500 वर्ष पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के 100 पुत्र मारे गए थे।
    33 कोटि देवता : हिन्दू धर्म के अनुसार गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ 'करोड़' नहीं, 'प्रकार' होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं।
    गाय की सूर्यकेतु नाड़ी : गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोककर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है। दूसरी ओर, सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य के संपर्क में आने पर यह स्वर्ण का उत्पादन करती है। गाय के शरीर से उत्पन्न यह सोना गाय के दूध, मूत्र व गोबर में मिलता है। यह स्वर्ण दूध या मूत्र पीने से शरीर में जाता है और गोबर के माध्यम से खेतों में। कई रोगियों को स्वर्ण भस्म दिया जाता है।
    पंचगव्य : पंचगव्य कई रोगों में लाभदायक है। पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है। ऐसा कोई रोग नहीं है जिसका इलाज पंचगव्य से न किया जा सके।

    कैलाश पर्वत और देव आत्मस्थान : उत्तराखंड में एक ऐसा रहस्यमय स्थान है जिसे देवस्थान कहते हैं। मुण्डकोपनिषद के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केंद्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं।
    अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म - शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए वे पृथ्वी पर भी आती हैं। देवताओं, यक्षों, गंधर्वों, सिद्ध पुरुषों का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता रहा है।
    देवस्थान : प्राचीनकाल में हिमालय में ही देवता रहते थे। यहीं पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और यहीं पर नंदनकानन वन में इंद्र का राज्य था। इंद्र के राज्य के पास ही गंधर्वों और यक्षों का भी राज्य था। स्वर्ग की स्थिति 2 जगह बताई गई है- पहली हिमालय में और दूसरी कैलाश पर्वत के कई योजन ऊपर। यहीं पर मानसरोवर है और इसी हिमालय में अमरनाथ की गुफाएं हैं।
    अन्य रहस्यमय बातें : हिमालय में ही यति जैसे कई रहस्यमय प्राणी रहते हैं। इसके अलावा यहां चमत्कारिक और दुर्लभ जड़ी-बूटियां भी मिलती हैं। भारत और चीन की सेना ने हिमालय क्षेत्र में ही एलियन और यूएफओ को देखने का दावा किया है। हिमालय में ही एक रूपकुंड झील है। इसके तट पर मानव कंकाल पाए गए हैं। पिछले कई वर्षों से भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने इस रहस्य को सुलझाने के कई प्रयास किए, पर नाकाम रहे।

    सोमरस आखिर क्या था? सोमरस के बारे में अक्सर पढ़ने और सुनने को मिलता है। आखिर यह सोमरस क्या था? क्या यह शराब जैसा कोई पदार्थ था या कि यह व्यक्ति को युवा बनाए रखने वाला कोई रस था?

    ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है-
    ।।हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।।
    अर्थात : सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।
    हालांकि वेदों में शराब को बुराइयों की जड़ कहा गया है, ऐसे में वे देवताओं को कैसे शराब चढ़ा सकते हैं। सुरापान और सोमरस में फर्क था।
    अमृत कलश : समुद्र मंथन के दौरान क्या कोई ऐसा रस निकला था जिसे पीकर देवताओं ने अमरता को प्राप्त कर लिया था? यदि समुद्र से ऐसा कोई रस निकल सकता है तो क्या आज नहीं निकल सकता? जरूरी है कि समुद्र से ही निकले? अमृत कलश के लिए देव और दैत्यों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। सचमुच अमृत का निकलना एक रहस्य ही है। हालांकि वैज्ञानिक ऐसी दवा बनाने में लगे हैं जिसे पीकर व्यक्ति अधिक समय तक जवान बना रह सके।
    अमर होने का रहस्य : अमर कौन नहीं होना चाहता? समुद्र मंथन में अमृत निकला। इसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दानवों के साथ छल किया। देवता अमर हो गए। मतलब कि क्या समुद्र में ऐसा कुछ है कि उसमें से अमृत निकले? तो आज भी निकल सकता है? अभी अधिकतम 100 साल के जीवन में अनेकानेक रोग, कष्ट, संताप और झंझट हैं तो अमरता प्राप्त करने पर क्या होगा? 100 वर्ष बाद वैराग्य प्राप्त कर व्यक्ति हिमालय चला जाएगा। वहां क्या करेगा? बोर हो जाएगा तो फिर से संसार में आकर रहेगा। बस यही सिलसिला चलता रहेगा।
    महाभारत में 7 चिरंजीवियों का उल्लेख मिलता है। चिरंजीवी का मतलब अमर व्यक्ति। अमर का अर्थ, जो कभी मर नहीं सकते। ये 7 चिरंजीवी हैं- राजा बलि, परशुराम, विभीषण, हनुमानजी, वेदव्यास, अश्वत्थामा और कृपाचार्य। हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि मार्कंडेय ऋषि भी चिरंजीवी हैं।
    माना जाता है कि ये सातों पिछले कई हजार वर्षों से इस धरती पर रह रहे हैं, लेकिन क्या धरती पर रहकर इतने हजारों वर्ष तक जीवित रहना संभव है? हालांकि कई ऐसे ऋषि-मुनि थे, जो धरती के बाहर जाकर फिर लौट आते थे और इस तरह वे अपनी उम्र फ्रिज कर बढ़ते रहते थे। हालांकि हिमालय में रहने से भी उम्र बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में ऐसी कई कथाएं हैं जिसमें लिखा है कि अमरता प्राप्त करने के लिए फलां-फलां दैत्य या साधु ने घोर तप करके शिवजी को प्रसन्न कर लिया। बाद में उसे मारने के लिए भगवान के भी पसीने छूट गए। अमर होने के लिए कई ऐसे मंत्र हैं जिनके जपने से शरीर हमेशा युवा बना रहता है। 'महामृत्युंजय' मंत्र के बारे में कहा जाता है कि इसके माध्यम से अमरता पाई जा सकती है।
    वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, पुराण, योग और आयुर्वेद में अमरत्व प्राप्त करने के अनेक साधन बताए गए हैं। आयुर्वेद में कायाकल्प की विधि उसका ही एक हिस्सा है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि विज्ञान इस दिशा में क्या कर रहा है? विज्ञान भी इस दिशा में काम कर रहा है कि किस तरह व्यक्ति अमर हो जाए अर्थात कभी नहीं मरे।
    सावित्री-सत्यवान की कथा तो आपने सुनी ही होगी। सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। सावित्री और यमराज के बीच लंबा संवाद हुआ। इसके बाद भी यह पता नहीं चलता है कि सावित्री ने ऐसा क्या किया कि सत्यवान फिर से जीवित हो उठा। इस जीवित कर देने या हो जाने की प्रक्रिया के बारे में महाभारत भी मौन है। जरूर सावित्री के पास कोई प्रक्रिया रही होगी। जिस दिन यह प्रक्रिया वैज्ञानिक ढंग से ज्ञात हो जाएगी, हम अमरत्व प्राप्त कर लेंगे।
    आपने अमरबेल का नाम सुना होगा। विज्ञान चाहता है कि मनुष्य भी इसी तरह का बन जाए, कायापलट करता रहा और जिंदा बना रहे। वैज्ञानिकों का एक समूह चरणबद्ध ढंग से इंसान को अमर बनाने में लगा हुआ है। समुद्र में जेलीफिश (टयूल्रीटोप्सिस न्यूट्रीकुला) नामक मछली पाई जाती है। यह तकनीकी दृष्टि से कभी नहीं मरती है। हां, यदि आप इसकी हत्या कर दें या कोई अन्य जीव जेलीफिश का भक्षण कर ले, फिर तो उसे मरना ही है। इस कारण इसे इम्मोर्टल जेलीफिश भी कहा जाता है। जेलीफिश बुढ़ापे से बाल्यकाल की ओर लौटने की क्षमता रखती है। अगर वैज्ञानिक जेलीफिश के अमरता के रहस्य को सुलझा लें, तो मानव अमर हो सकता है।
    क्या कर रहे हैं वैज्ञानिक? : वैज्ञानिक अमरता के रहस्यों से पर्दा हटाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। बढ़ती उम्र के प्रभाव को रोकने के लिए कई तरह की दवाइयों और सर्जरी का विकास किया जा रहा है। अब इसमें योग और आयुर्वेद को भी महत्व दिया जाने लगा है। बढ़ती उम्र के प्रभाव को रोकने के बारे में आयोजित एक व्यापक सर्वे में पाया गया कि उम्र बढ़ाने वाली 'गोली' को बनाना संभव है। रूस के साइबेरिया के जंगलों में एक औषधि पाई जाती है जिसे जिंगसिंग कहते हैं। चीन के लोग इसका ज्यादा इस्तेमाल करके देर तक युवा बने रहते हैं।
    'जर्नल नेचर' में प्रकाशित 'पजल, प्रॉमिस एंड क्योर ऑफ एजिंग' नामक रिव्यू में कहा गया है कि आने वाले दशकों में इंसान का जीवनकाल बढ़ा पाना लगभग संभव हो पाएगा। अखबार 'डेली टेलीग्राफ' के अनुसार एज रिसर्च पर बक इंस्टीट्यूट, कैलिफॉर्निया के डॉक्टर जूडिथ कैंपिसी ने बताया कि सिंपल ऑर्गनिज्म के बारे में मौजूदा नतीजों से इसमें कोई शक नहीं कि जीवनकाल को बढ़ाया-घटाया जा सकता है। पहले भी कई स्टडीज में पाया जा चुका है कि अगर बढ़ती उम्र के असर को उजागर करने वाले जिनेटिक प्रोसेस को बंद कर दिया जाए, तो इंसान हमेशा जवान बना रह सकता है। जर्नल सेल के जुलाई के अंक में प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया कि बढ़ती उम्र का प्रभाव जिनेटिक प्लान का हिस्सा हो सकता है, शारीरिक गतिविधियों का नतीजा नहीं। खोज और रिसर्च जारी है...। 

    महान योद्धा बर्बरीक और घटोत्कच : बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री 'कामकंटकटा' के उदर से भी इनके जन्म होने की बात कही गई है। बर्बरीक और घटोत्कच के बारे में कहा जाता है कि ये दोनों ही विशालकाय मानव थे। घटोत्कच ने कौरवों की सेना में कोहराम मचा दिया था। आखिरकार कर्ण ने उस अस्त्र का उपयोग किया जिसे वह अर्जुन पर चलाना चाहते थे और घटोत्कच मारा गया।

    महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर 3 बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।
    बर्बरीक के लिए 3 बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह जानकर भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक उनका शीश मांग लिया।
    बर्बरीक ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे अंत तक युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर सबसे ऊंची जगह पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर रख दिया गया, जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।

    द्वारिका नगर : मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक नए नगर की स्थापना की थी। कहना चाहिए कि भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया था। प्राचीन इतिहास की खोज करने वाले इतिहासकारों के अनुसार द्वारिका विश्‍व का सबसे रहस्यमय शहर है। इस शहर पर अभी भी शोध जारी है।

    कई द्वारों का शहर होने के कारण 'द्वारिका' इसका नाम पड़ा। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका। ये 7 नगर हैं- द्वारिका, मथुरा, काशी, हरिद्वार, अवंतिका, कांची और अयोध्या। द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्य स्थान भी कहा जाता है।
    गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका। द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारिका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है।
    एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्‍पनिक नगर है, लेकिन इस कल्‍पना को सच साबित कर दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्‍ट प्रो. एसआर राव ने। प्रो. राव ने मैसूर विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद बड़ौदा में राज्‍य पुरातत्‍व विभाग ज्‍वॉइन कर लिया था। उसके बाद भारतीय पुरातत्‍व विभाग में काम किया। प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की। साथ में उन्‍हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्‍यता के भी कई अवशेष उन्‍होंने खोजे। उस जगह पर भी उन्‍होंने खुदाई में कई रहस्‍य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।

    कैलाश मंदिर : गुफाएं तो भारत में बहुत हैं, लेकिन अजंता-एलोरा की गुफाओं के बारे में वैज्ञानिक कहते हैं कि ये किसी एलियंस के समूह ने बनाई हैं। यहां पर एक विशालकाय कैलाश मंदिर है। आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार इसे कम से कम 4,000 वर्ष पूर्व बनाया गया था। 40 लाख टन की चट्टानों से बनाए गए इस मंदिर को किस तकनीक से बनाया गया होगा? यह आज की आधुनिक इंजीनियरिंग के बस की भी बात नहीं है।

    माना जाता है कि एलोरा की गुफाओं के अंदर नीचे एक सीक्रेट शहर है। आर्कियोलॉजिकल और जियोलॉजिस्ट की रिसर्च से यह पता चला कि ये कोई सामान्य गुफाएं नहीं हैं। इन गुफाओं को कोई आम इंसान या आज की आधुनिक तकनीक नहीं बना सकती। यहां एक ऐसी सुरंग है, जो इसे अंडरग्राउंड शहर में ले जाती है।
    क्या सचमुच ही कर्ण के कवच और कुंड आज भी बनाए जा सकते हैं? 
    भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल हैं, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, वह युद्ध में अजेय रहेगा।

    तब कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय बताया और फिर देवराज इन्द्र एक ब्राह्मण के वेश में पहुंच गए कर्ण के द्वार। देवराज भी सभी के साथ लाइन में खड़े हो गए। कर्ण सभी को कुछ न कुछ दान देते जा रहे थे। बाद में जब देवराज का नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! किस वस्तु की अभिलाषा लेकर आए हैं? तब देवराज इंद्र ने छल से उनके कवच और कुंडल दान में ले लिए थे।
    कहां से आया सुदर्शन चक्र? कहते हैं कि सुदर्शन चक्र एक ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और उसका काम तमाम करके वापस छोड़े गए स्थान पर आ जाता था। इस चक्र को विष्णु की तर्जनी अंगुली में घूमते हुए बताया जाता है। सबसे पहले यह चक्र उन्हीं के पास था।

    पुराणों के अनुसार विभिन्न देवताओं के पास अपने-अपने चक्र हुआ करते थे। सभी चक्रों की अलग-अलग क्षमता होती थी और सभी के चक्रों के नाम भी होते थे। महाभारत युद्ध में भगवान कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र था। यह सुदर्शन चक्र कहां से आया था और चक्रों का जन्मदाता कौन था? क्या आज भी इस तरह का अस्त्र बनाया जा सकता है? या कि यह एक चमत्कारिक शक्ति से ही संचालित होता था किसी मशीन द्वारा नहीं? ऐसे कई सवाल हैं जिनका रहस्य अभी भी बरकरार है। हालांकि आजकल ऐसी मिसाइलें बनने लगी हैं, जो लक्ष्य को भेदकर आपस लौट आती हैं, लेकिन चक्र जैसा अस्त्र तो सचमुच ही अद्भुत है।

    रस्सी का जादू : आज पश्‍चिमी देशों में तरह-तरह की जादू-विद्या लोकप्रिय है और समाज में हर वर्ग के लोग इसका अभ्यास करते हैं। एक समय था, जब भारत में जादूगरों की भरमार थी। इस देश में एक से एक जादूगर, सम्मोहनविद, इंद्रजाल, नट, सपेरे और करतब दिखाने वाले होते थे। बंगाल का काला जादू तो विश्वप्रसिद्ध था। 

    यूरोप की कल्पना में भारत सदा से बेहिसाब संपत्ति और अलौकिक घटनाओं का एक अविश्वसनीय देश रहा है, जहां बुद्धिमान, जादूगर, सिद्ध आदि व्यक्तियों की संख्या सामान्य से कुछ अधिक थी। विदेशी भ्रमणकर्ताओं और व्यापारियों ने भारत से कई तरह का जादू सीखा और उसे अपने देश में ले जाकर विकसित किया। बाद में इसी तरह के जादू का इस्तेमाल धर्म प्रचार के लिए किया गया। आजकल भारत जादू के मामले में पिछड़ गया है। एक समय था, जब सोवियत संघ और रोम में जादूगरों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और हजारों जादूगरों का कत्ल कर दिया गया था, लेकिन आजकल अमेरिका और योरप के कई देशों में आज भी जादूगरों की धूम है।
    भारत में सड़क या चौराहे पर जादूगर एक जादू दिखाते थे जिसे रस्सी का जादू या करतब कहा जाता था। बीन या पुंगी की धुन पर वह रस्सी सांप के पिटारे से निकलकर आसमान में चली जाती थी और जादूगर उस हवा में झूलती रस्सी पर चढ़कर आसमान में कहीं गायब हो जाता था।
    अंग्रजों के काल में किसी ने यह जादू दिखाया था, उसके बाद से इस जादू के बारे में सुना ही जाता है। अब इसे दिखाने वाला कोई नहीं है। यही कारण है कि इस जादू को दिखाना अब किसी भी जादूगर के बस की बात नहीं रही। यह विद्या लगभग खो-सी गई है। इसके खो जाने के कारण अब यह संदेह किया जाता है कि कहीं ऐसा जादू दिखाया भी जाता था या नहीं? हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं - भाग 3
    दोस्तों  आपको ये ब्लॉग कैसा लगता है। कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा। जिससे मुझे प्रोत्साहन मिलता रहे।

    हिमालय के चमत्कारिक महात्मा की रहस्यमय दास्तां - पौराणिक कथा

    By: Secret On: 18:36
  • Share The Gag

  • हिमालय के चमत्कारिक महात्मा की रहस्यमय दास्तां - पौराणिक कथा

    प्राकृतिक व्यतिक्रम से ही रोग उत्पन्न होते हैं। तथा समानुपातन से उनका निदान भी हो जाता है। यह एक शाश्वत एवं स्वयं सिद्ध नियम है। यह केवल शास्त्र या पुराणों का ही कथन नहीं है। जब भी नैसर्गिक संचरण में भेद पैदा होगा, कोई न कोई अनपेक्षित या कृत्रिम घटना-दुर्घटना जन्म लेगी ही। इसी बात या तह को कोई बहुत पढ़कर समझता है। तथा कोई प्रकृति की गोद में बैठ निरंतर अनुभव के द्वारा संग्रहीत करता है।

    ऊधमपुर (जम्मू) से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक स्थान है जिसे शिवखेरी के नाम से जाना जाता है। यहां पर भगवान शिव का एक बहुत पुराना स्थान है। यह बहुत ही दुर्गम स्थान पर है। इसमें जाना सबके बस की बात नहीं है। फिर भी यहां पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है। जम्मू से सीधे यहां के लिए बस सेवा है। चाहे जो भी हो, यह एक अति मनोरम स्थान है। 

    शिवखेरी से लगभग सात किलोमीटर पहले मुख्य रास्ते से पश्चिमोत्तर दिशा में एक स्थान है देवजल। बिल्कुल संकरी चतुर्दिक सघन पहाड़ियों से घिरा चीड़ एवं देवदार के घने वृक्षों से ढका यह स्थान बड़ा ही डरावना दीख पड़ता है। वैसे भी यहां पर घूमने जाना वर्जित है। क्योकि यहां बड़े बड़े बाघ एवं भालू जैसे हिंसक जीव पाए जाते हैं।

    इन पहाड़ियों के बीच में एक बिल्कुल खाली एवं साफ सुथरा लगभग पचासों एकड़ में फैला स्थान है। बिल्कुल सपाट एवं समतल स्थान है। यहां तक पहुंचने के लिए एक अति संकरी पगडंडी जो पहाड़ियों के बीच से होकर पेड़ो एवं घनी झाड़ियों से गुजराती है, उसी से आना होता है।

    सुगंध से ही पता चलता है इस स्थान पर महात्मा जी आने वाले हैं,कौन है वह चमत्कारिक महात्मा... 
    प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की दशमी एवं कृष्ण पक्ष की अष्टमी को एक महात्मा जी यहां आते हैं। कभी कभी नहीं भी आते हैं। मैंने कई बार कोशिश की, लोगों के साथ जाता था लेकिन निराश होकर लौटना पड़ता था। किन्तु एक बार दर्शन हो ही गए।

    नाम मात्र के वस्त्र शरीर पर, रंग बिल्कुल काला, आंखे बड़ी-बड़ी बहुत ही चमकदार एवं तीव्र वेधन क्षमता वाली रोशनी से भरी हुई, बड़ी बड़ी दाढी मूंछें, लगभग सात फिट से भी ज्यादा लम्बाई, पूरे शरीर पर कोई बहुत ही खुशबूदार भस्म लपेटे हुए, बहुत ही भद्दी-मोटी शरीर की चमड़ी किन्तु चेहरे पर साहस, सफलता एवं खुशी का ओज।

    एक सफेद चट्टान जो मैदान के एक किनारे पर एक बड़े चिनार जैसे बड़े चपटे पत्तों वाले पेड़ के नीचे था, उसी पर बैठ जाते थे। किसी से डोगरी भाषा में, किसी से पश्तों तथा किसी से हिंदी में बाते बड़ी आसानी से करते हैं।

    एक चमड़े की झोली उनके कंधे पर लटकी रहती है। लोग कहते थे कि हर बार उनकी झोली बदल जाती है। मुझे लगता था कि वह किसी जानवर के ताजा चमड़े से बनी झोली थी। वह कहां से और किस रास्ते से आते हैं, किसी ने नहीं देखा है।

    ऐसा सुनने में आया है कि उसी मैदान में किसी किनारे से एक सुरंग निकलती है जो जम्मू में बड़ीब्रह्मणा नामक जगह पर खुलती है। मान्यता है कि जाम्बवंत जी इसी सुरंग से आते जाते थे।

    खैर मैंने सुरंग नहीं देखी, किन्तु उनके आने जाने को कोई नहीं देख पाता है। केवल सुगंध से ही पता लगता है कि अब महात्मा जी आने वाले हैं। वहां पर लाइन लगाने की जरूरत नहीं है। चाहे आप कहीं भी बैठे, वह जरूरतमंद को दूर से भी बुला लेते हैं। 

    पूरे जम्मू में क्यों नहीं है सांस, दमा और हड्डी के रोगी.... 
    लेकिन एक बात आज भी प्रत्यक्ष है कि उस सौ किलोमीटर की दूरी में कोई भी व्यक्ति दमा, टीबी, गठिया, संधिवात, कुष्ठ, आमवात या किसी अस्थि रोग से पीड़ित नहीं है। महात्मा बहुत ही अचूक औषधि वह प्रदान करते हैं। एक रोग के लिए एक दिन में वह मात्र तीन या चार रोगी को ही दवा देते हैं। अर्थात गठिया के चार रोगी, कुष्ठ के चार रोगी आदि।

    मैंने पूछा भी था, किन्तु उन्होंने बड़ी सौम्यता से उत्तर दिया कि इतनी ही औषधि वह एकत्र ही कर पाते हैं। उनको यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि कौन दूर से आया है तथा कौन फिर दोबारा या तिबारा भी आ सकता है। इसीलिए लोग परस्पर झगड़ा भी नहीं करते हैं। क्योंकि चाहे कितना भी परस्पर वाद विवाद कर लो, उन्हें जिसको औषधि देनी होगी, उसे ही वह देंगे। चाहे कोई कुछ भी कर लें। 

    पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला को क्यों नहीं मिला बाबा का आशीर्वाद...
    लोग बताते हैं कि एक बार शेख अब्दुल्ला जो वहां के मुख्यमंत्री थे, अपने किसी रिश्तेदार को लेकर आए। उस दिन वह महात्मा आए ही नहीं। लगभग चार-पांच बार ऐसा हुआ, किन्तु वह महात्मा नहीं आए। 

    लोगों को लगा कि शायद उन्हें किसी हिंसक जानवर ने मार डाला। सात महीने बाद वह फिर दिखाई दिए। लोग आने-जाने लगे। फिर शेख अब्दुल्ला पहुंचे। किन्तु वह उस दिन नहीं आए। ऐसा कई बार हुआ। अंत में लोगों ने महात्मा जी से इसका कारण पूछा। 

    उन्होंने बताया कि यदि कोई लाव लस्कर के साथ उनके पास आएगा तो वह नहीं आएंगे। कुछ आतंकवादियों ने वहां अपना डेरा बनाना चाहा। किन्तु सभी बारी-बारी मरते रहे। इसीलिए डर के मारे उस पहाड़ी की तरफ आतंकवादी भी नहीं जाते हैं। अंत में शेख अब्दुल्ला की रिश्तेदार वह महिला अन्य लोगों के साथ पैदल चलकर वहां पहुंची तथा औषधि लेकर गई।

    एक चमत्कार से बदल गई महिला द्वारा महात्माजी को दी गई भेंट....
    उस महिला ने महात्माजी के उस बैठने वाले चट्टान को हटवा कर वहां पर ग्यारह कुंतल वजन के चांदी का बहुत ही नक्काशीदार आसन बनवा कर रखवाया। किन्तु महात्मा जी के बैठते ही वह काले मिट्टी में बदल गया।

    उन्होंने लोगों से उसे हटाने को कहा। लोग हटाने लगे तो वह टूटकर रेत की तरह बिखर गया। फिर महात्माजी ने अकेले उतने बड़े भारी पत्थर को जिस पर वह बैठते थे, धकेल कर वही पर लाए जहां पर वह पहले बैठते थे और फिर उसी पर बैठने लगे।

    संभवतः अभी भी वह आते हैं, लेकिन किस महीने आएंगे, यह ठीक पता नहीं है। मैंने उनसे इसका भी कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी औषधियां बहुत कम मिल रही है तथा लोग अब दुर्लभ औषधियों की काला बाजारी भी करने लगे हैं। उन्होंने यह बात अच्छी तरह समझ ली थी कि मैं कोई मरीज नहीं बल्कि उत्सुकतावश केवल जानकारी लेने के लिए गया हुआ था।

    ऐसे कौन-सी जड़ी है जिससे हड्डी जुड़ जाती थी...
    महात्माजी झोली में ढेर सारी जड़ी-बूटियां भर कर लाते थे। किन्तु उन्होंने बता रखा था कि उनके पास श्वसन तथा अस्थि तंत्र के अलावा अन्य किसी भी व्याधि की औषधि नहीं है। फिर भी लोग अंधश्रद्धा एवं विश्वास के कारण नई व्याधियों से ग्रसित होने पर भी जाते ही थे।

    आपको संभवतः यह जानकर और आश्चर्य होगा कि जम्मू तथा जम्मू से सटे किसी भी शहर या नगर के किसी भी अस्पताल में श्वसन या हड्डी के रोग से संबधित कोई भी मरीज नहीं मिलेगा। मैंने तो बहुत खोजा। किन्तु कहीं कोई मरीज नहीं मिला। बस वही आदमी भूले भटके इन अस्पतालों में चला जाएगा जो इस महात्मा के बारे में नहीं जानता हो। या फिर उस बीहड़ में जाने से डरता हो। या फिर वातानुकूलित जगह को छोड़ना नहीं चाहता हो। 

    महात्मा जी ने जो जडी-बूटियां कुछ मरीजों को दी थी, उन्हें मैंने देखा तो बहुत ज्यादा तो नहीं पहचान सका किन्तु ऐसा लगा कि भावार्थ रत्नाकर एवं शारंगधर संहिता में जो जड़ी-बूटियां बताई गई है, वे ही है। थोड़ा-बहुत अंतर दिखाई दे रहा था।

    जैसे डिडबेहडा- कहा जाता है कि यदि घोड़े की भी टांग टूट गई हो, तथा एक दिन से ज्यादा का विलंब नहीं हुआ हो तो इसे हल्दी के साथ पीस कर लगा देने से वह हड्डी तो जुड़ ही जाती है। अगले दिन वह घोड़ा फिर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार होता है। 

    फिर दूसरा बघमकोय- सुश्रुत ने बघमकोय को रक्त रोग के लिए रामबाण बताया है। उन्होंने तो इसके बारे में यहां तक कह दिया है कि यदि बघमकोय से कुष्ठ रोग ठीक नहीं हुआ तो चाहे शुक्राचार्य या अश्विनीकुमार ही क्यों न चिकित्सा करें, वह ठीक नहीं हो सकता।

    फिर तीसरा शीतलपाटी- बृहतसंहिता में कहा गया है कि जिस किसी कन्या को कुंडली में विषघात, विषकन्या या वैधव्य योग हो, या आर्द्रोपेत कणिकाओं जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान संभवतः अनुमान के सहारे स्यूडाफेड्रीलरी सेल्स कहता है, बेतरतीब अनियमित हो गई हो, या देहातों या ग्रामीण आंचल में कहते हैं कि किसी दुर्योग के कारण जब किसी लड़की की शादी नहीं हो पाती है तो इस झाड़ी के मूल, छिलके एवं पत्तियों के रस के विविध प्रयोग से अचूक सफलता मिलती है।

    इसी शीतल पाटी वनस्पति से वर्तमान समय में 'साराभाई केमिकल्स' नाम की गुजरात स्थित दवा कंपनी अत्यंत महंगा कैप्सूल संभवतः उसका नाम 'ब्लेंटाडीन' है बनाती है। जो एक कैप्सूल लगभग सात हजार रुपए से भी ज्यादा का मिलता है। 

    मैंने महात्माजी से यह प्रार्थना की कि यदि यह औषधि सरकार बनाए तो इस पर और ज्यादा शोध होकर ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए प्रयुक्त हो सकती है। बहुत ही सोच कर एवं गंभीर मुद्रा में उन्होंने उत्तर दिया कि यदि इसे आज सरकार जान जाए तो इन गरीबों का क्या होगा जो सरकारी या बड़े-बड़े चिकित्सालयों का भारी-भरकम खर्च न उठा सकते हो? मैं निरूत्तर हो गया।

    क्यों कैमरे में कैद नहीं हो पाता था महात्माजी का फोटो...
    आश्चर्य तब हुआ जब मैंने उनसे उनका फोटो खींचने का आग्रह किया। तो उन्होंने मंजूरी तो दे दी, किन्तु यह बता दिया कि शरीर पर लगे खुशबूदार भस्म पदार्थ के कारण उनका फोटो नहीं आ सकता। और बात भी सही थी, कोई फोटो नहीं आया।